Kahte Hain Jisko Pyar
Author:
Krishna Baldev VaidPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 316
₹
395
Available
कृष्ण बलदेव वैद के कथा साहित्य से जिन पाठकों का परिचय है, वे जानते हैं कि उन्हें मनुष्य-जीवन के नाटकीय सन्दर्भों की गहरी पहचान है। यहाँ भी वैद जीवनगत घटनाओं को सायास नाटकीय बनाने के बजाय जीवन में निहित नाटक को पकड़ते हैं। यहाँ तक कि सामान्य लगते रंग-संकेतों को भी नाटकीय प्रसंग के रूप में विन्यस्त करने का सामर्थ्य उन्होंने प्रदर्शित किया है।</p>
<p>वैद बख़ूबी समझते हैं कि नाटक की सम्पूर्णता उसके मंचन में है। इस नाटक को पढ़ते ही पाठक को नाटक अपने सामने घटित होते दिखता है। हालाँकि इसकी विषयवस्तु जटिल है लेकिन सरल-सहज प्रस्तुति के कारण ऐसा मुमकिन हुआ है। गीता, अखिल, सुजाता जैसे चिर-परिचित चरित्रों के माध्यम से लेखक ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का ऐसा रचनात्मक विमर्श इस रचना में सम्भव किया कि ये थोड़े से पात्र, अपने मित कथनों में ही बड़े मानवीय मूल्यों को पुनर्परिभाषित कर देते हैं। अपनी बात रखने का दार्शनिक लहज़ा पात्रों के चरित्र रचने के साथ ही अर्थ के धरातल पर जिस ‘वर्बल आइरनी’ का निर्माण करता है, वह अद्भुत है।
ISBN: 9788126708277
Pages: 79
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘बटोही’ एक नए भिखारी ठाकुर की खोज है, जो हर समय और हर देश में एक सृजनशील रचनाकार के बनने और विकसित होने की गाथा बनकर सार्वभौमिक विस्तार पाता है...जो इक्कीसवीं सदी के आरम्भिक उत्तर-आधुनिक ग्लोबल समय में संस्कृति के वैश्विक उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ स्थानीय अस्मिताओं की लड़ाई लड़ रहा है। ‘बटोही’ के इस नए भिखारी ठाकुर की लड़ाई ब्रिटिशकालीन भारत में जन्मे भिखारी ठाकुर की लड़ाई से ज़्यादा कठिन है।...‘बटोही’ अपनी प्रस्तुति-भाषा के स्तर पर भी एक सशक्त प्रयोग है। यह लोकभाषाओं की शक्ति को स्थापित करता है।...भिखारी एक ऐसे बटोही हैं जो एक सदी बाद की यात्रा तय करके हमारे सामने इक्कीसवीं सदी में कला का आधुनिक पाठ गढ़ते हैं।
—अजित राय (‘हंस’ मासिक और दैनिक ‘हिन्दुस्तान’)
भिखारी ठाकुर गाँव-समाज में स्त्रियों की दशा देखकर बार-बार विचलित होते हैं। हृषीकेश सुलभ इस बहाने स्त्री की पीड़ा का एक विमर्शमूलक आख्यान अपने नाटक में बुनते हैं। सुलभ तत्कालीन ग्राम्य यथार्थ के कुछ उपपाठ भी अपने नाटक में बुनते हैं। जातिवाद का प्रसंग एक ऐसा ही उपपाठ है। नाई जाति के भिखारी ठाकुर की परवर्ती ख्याति के बरक्स जाति के सन्दर्भ में ख़ुद उनके पीड़ादायी अनुभवों का बेहतर समावेश हृषीकेश सुलभ ने अपने नाटक में किया है।...एक आधुनिक लोकगायक पर लिखते हुए सुलभ आख्यान की पुरबिया पद्धति को ही चुनते हैं। वे चरित्र का कोई विमर्श नहीं बनाते, रिश्तों की एक दुनिया बनाते हैं। विचार का प्रत्यक्ष न होना हृषीकेश सुलभ के नाटक की एक प्रमुख विशेषता है। विचार अक्सर नामालूम-सा उनके नाटक में मौजूद है।
—संगम पाण्डेय (‘जनसत्ता’)
राजनीतिक रूप में अम्बेडकर ने वर्णवादी व्यवस्था के जो दुष्परिणाम देखे थे, भिखारी ठाकुर ने रंगकर्म के क्षेत्र में इसे काफ़ी क़रीब से महसूस किया था। नाटक में यह बात जीवन्त रूप से उभरकर आती है।...हृषीकेश सुलभ अपने नए नाटक ‘बटोही’ के माध्यम से भिखारी ठाकुर के रचनात्मक संघर्ष के विभिन्न पक्षों से दर्शकों को रू-ब-रू कराते हैं, जिससे आज भी लोकधर्मिता से जुड़ा हर रंगकर्मी जूझता है।
—राजेश कुमार (‘कथादेश’)
Bina Deewaron Ke Ghar
- Author Name:
Mannu Bhandari
- Book Type:

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Description:
‘बिना दीवारों के घर’ का जो घर है उसकी दीवारें हैं, लेकिन लगभग ‘न-हुईं’ सी ही। एक स्त्री के ‘अपने’ व्यक्तित्व की आँच वे नहीं सँभाल पातीं, और पुरुष, जिसको परम्परा ने घर का रक्षक, घर का स्थपति नियुक्त किया है, वह उन पिघलती दीवारों के सामने पूरी तरह असहाय! यह समझ पाने में क़तई अक्षम कि पत्नी की परिभाषित भूमिका से बाहर खिल और खुल रही इस स्त्री से क्या सम्बन्ध बने! कैसा व्यवहार किया जाए! और यह सारा असमंजस, सारी दुविधा और असुरक्षा एक निराधार सन्देह के रूप में फूट पड़ती है। आत्म और परपीड़न का एक अनन्त दुश्चक्र, जिसमें घर की दीवारें अन्ततः भहरा जाती हैं।
स्त्री-स्वातंत्र्य के संक्रमण काल का यह नाटक ख़ास तौर पर पुरुष को सम्बोधित है और उससे एक सतत सावधानी की माँग करता है कि बदलते हुए परिदृश्य से बौरा कर वह किसी विनाशकारी संभ्रम का शिकार न हो जाए, जैसे कि इस नाटक का ‘अजित’ होता है।
Teen Ekant
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

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तीन एकान्त निर्मल वर्मा की तीन कहानियों (‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ और ‘वीक-एंड’) का नाट्य-पाठ है जिसका मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रेपर्टरी कम्पनी ने 1975 में किया था। ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रणेता देवेन्द्र राज अंकुर इस चर्चित प्रस्तुति के निर्देशक थे।
इन कहानियों और उनके इस नाट्य-पाठ के सम्बन्ध में उल्लेखनीय यह है कि यह उन कहानियों का नाट्य-रूपान्तर नहीं है, कहानियों के मूल पाठ की तस-की-तस प्रस्तुति है जिसमें मंच पर कहानी की नाटकीयता को सामने लाने के लिए निर्देशकीय संकेत और मंच-विवरण जोड़ दिए गए हैं।
तीनों ही कहानियाँ ‘मोनोलॉग’ हैं जो स्मृति में आकार ग्रहण करती हैं और एक व्यक्ति के एक लम्बे संवाद के रूप में खुलती हैं। निर्मल जी के शब्दों में ‘उनके बीच एकमात्र समानता यह थी कि वे मोनोलॉग स्वर में रची गई थीं, जब अकेलेपन के क्षणों में व्यक्ति अपने से ही बोलने लगता है। ...परम्परागत अर्थ में इसे नाटकीय संवाद नहीं कहा जा सकता। किन्तु जो शब्द अपने से कहे जाते हैं, वहाँ ‘स्व’ ही लड़ाई का मैदान बन जाता है...।’
अपने समय के समर्थ अभिनेताओं ने इस आत्मसंघर्ष को जिस सम्पूर्णता में साकार किया था, वह इस पाठ में भी दिखाई देता है। अपने निर्देशकीय वक्तव्य में देवेन्द्र राज अंकुर इन्हें ‘अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं से साक्षात्कार की कहानियाँ’ कहते हैं। इसी को रेखांकित करने के लिए प्रस्तुतियों को एक सम्मिलित नाम ‘थ्री टेक्स्ट्स इन सॉलिट्यूड’ दिया गया था।
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