R.U.R.
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क़रीब एक सदी पूर्व लिखित ‘आर.यू.आर.’ ही वह पुस्तक है जिसमें ‘रोबोट’ शब्द पहली बार आया था। चेक भाषा के ‘रोबोटा’ से गढ़े गए इस शब्द का अर्थ बेगार या बँधुआ मज़दूरों से कराया गया काम होता है। लेखक ने इस नाटक में वैज्ञानिक विकास और मानवीय भविष्य के जटिल सम्बन्धों को लेकर जो भविष्यवाणी थी, वह कल्पना के दायरे को पार कर आज यथार्थ बन चुकी है—मानवीय मेधा के समक्ष ज़बरदस्त चुनौती के रूप में रोबोट आज एक वास्तविकता है।
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क़रीब एक सदी पूर्व लिखित ‘आर.यू.आर.’ ही वह पुस्तक है जिसमें ‘रोबोट’ शब्द पहली बार आया था। चेक भाषा के ‘रोबोटा’ से गढ़े गए इस शब्द का अर्थ बेगार या बँधुआ मज़दूरों से कराया गया काम होता है। लेखक ने इस नाटक में वैज्ञानिक विकास और मानवीय भविष्य के जटिल सम्बन्धों को लेकर जो भविष्यवाणी थी, वह कल्पना के दायरे को पार कर आज यथार्थ बन चुकी है—मानवीय मेधा के समक्ष ज़बरदस्त चुनौती के रूप में रोबोट आज एक वास्तविकता है।
Book Details
-
ISBN9789360869908
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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जगदीशचन्द्र माथुर का ‘कोणार्क’ अत्यन्त सफल कृति है। नाट्यकला की ऐसी सर्वांगपूर्ण सृष्टि अन्यत्र देखने को नहीं मिली। विषय-निर्वाचन, कथा-वस्तु, क्रम-विकास, संवाद, ध्वनि, मितव्ययिता आदि दृष्टियों से ‘कोणार्क’ अद्भुत कला-कृति है।
छोटे-छोटे अंकों के भीतर एक विराट युग का स्पन्दन गागर में सागर की तरह छलक उठता है। उपक्रम तथा उपसंहार लेखक के अत्यन्त मौलिक प्रयोग हैं, जिनमें नाटक की सीमाएँ एक रहस्य-विस्तार में खो-सी गई हैं। उपक्रम में आँखों के सामने एक विस्मृत ऐतिहासिक युग का ध्वंस-शेष, कल्पना में समुद्र ही तरह आर-पार उद्वेलित होकर साकार हो उठता है।
कलाकार का बदला जीवन-सौन्दर्य ही चुनौती नहीं देता, वह अत्याचारी को भी जैसे अतल अन्धकार में डाल देता है। सहनशील ‘विशु’ तथा विद्रोही ‘धर्मपद’ में कला के प्राचीन और नवीन युग मूर्तिमान हो उठते हैं। ‘विशु’ और ‘धर्मपद’ का पिता-पुत्र का नाता और तत्सम्बन्धी करुण-कथा इतिहास के गर्जन में घुल-मिलकर नाटक को मार्मिकता प्रदान करती है।
आज के संघर्ष के जर्ज युग में ‘कोणार्क’ द्वारा ‘कला और संस्कृति’ अपनी चिरन्तन उपेक्षा का विद्रोहपूर्ण सन्देश मनुष्य के पास पहुँचा रही है।
— सुमित्रानंदन पंत
‘सन् 1950 में लिखित’
Cheri Ka Bageecha
- Author Name:
Anton Chekhav
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एंतोन चेख़व ने इस एक नाटक में जिस विराट ऐतिहासिक सचाई को पकड़ा है, वह शायद बहुत बड़े उपन्यास का विषय था। इसी सचाई के रेशों से बुना चेरी का बगीचा समूचे देश का प्रतीक बन उठा है।
चेरी के बगीचे की मालकिन ‘श्रीमती रैनिकव्स्काया अपने आप में ही डूबी है। आशा, निराशा, सुख-दु:ख की यह निजी दुनिया बाहरी दबावों में और भी सिकुड़ती चली जाती है, लेकिन इस क़ैद से छूटकर बाहर आया एक छोटे-से दुकानदार का बेटा लोपाखिन समय को पहचानता है। औद्योगिक संस्कृति के उदय का यह नया-नया सम्पन्न व्यवसायी व्यक्ति, क्रूर और सख़्त हाथों से नया समाज बना रहा है।
इस सन्दर्भ में अनुवादक राजेन्द्र यादव का कथन है : ‘चेख़व की रचनाओं की आत्मीयता, करुणा और ख़ास क़िस्म की निराश उदासी (लगभग आत्मदया जैसी) मुझे बहुत छूती है। मैं उसके प्रभाव से लगभग मोहाच्छन्न था। उसी श्रद्धा से मैंने इन नाटकों को हाथ लगाया था। रूसी भाषा नहीं जानता था, मगर अधिक से अधिक ईमानदारी से उसके नाटकों की मौलिक शक्ति तक पहुँचाना चाहता था। इसलिए तीन अंग्रेज़ी अनुवादों को सामने रखकर एक-एक वाक्य पढ़ता और मूल को पकड़ने की कोशिश करता। आधार बनाया मॉस्को के अनुवाद को। बाद में सुना, अनुवादों को पाठकों ने पसन्द किया, अनेक रंग-संस्थानों और रेडियो इत्यादि ने इन्हें अपनाया, पाठ्यक्रम में भी लिया गया।
Skandgupt
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- Description: Awating description for this book
Karbala
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Premchand
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- Description: प्रेमचन्द का यह नाटक कर्बला की इतिहास-प्रसिद्ध घटना पर आधारित है जिसमें पैगम्बर हज़रत मुहम्मद के नवासे हज़रत हुसैन अपने कई परिजनों और समर्थकों के साथ शहीद हो गए थे। कर्बला की लड़ाई मुसलमानों के लिए ऐतिहासिक रूप से जितनी महत्त्वपूर्ण है उतनी ही धार्मिक रूप से भी, इसलिए अनगिनत लेखकों-कवियों ने अपनी रचनाओं में इसका बयान किया है, विशेषकर फ़ारसी-उर्दू साहित्य में काफ़ी कुछ लिखा गया है। लेकिन प्रेमचन्द से पहले इस घटना को विषय बनाकर नाटक सम्भवतः नहीं लिखा गया। हज़रत हुसैन सचाई और इनसानियत की रक्षा के लिए लड़े थे। इस लड़ाई में बहुत से हिन्दुओं ने भी उनका साथ दिया था। उनके साथ कुछ हिन्दू भी शहीद हुए थे। प्रेमचन्द ने इस ऐतिहासिक तथ्य का समावेश इस नाटक में किया है। उनका मकसद स्पष्ट है, वे न केवल मेलजोल की संस्कृति की एक अनुपम ऐतिहासिक मिसाल की याद दिलाते हैं बल्कि समाज में मेलजोल की संस्कृति को सुदृढ़ करने की वर्तमान आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं।
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