Janvasa
(0)
₹
495
396 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘जनवासा’ की प्रस्तुति देखकर भूदान के भ्रष्टाचार, स्वयंसेवियों की स्वयं की सेवा और क्रान्तिकारी धारा की पतनशीलता की समकालीनता का दर्शन हुआ। समय के सच पर भारती की अद्भुत पकड़ है।</p> <p>—अरुण कुमार, ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’, पटना</p> <p>सच कहा जाए तो ‘जनवासा’ मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा कोलाज है जिसका हर रंग सामाजिक सरोकार के ताने-बाने में समाया है। नाटक नक्सलवादी विचारधाराओं के टकराव, भूदान आन्दोलन, वर्णव्यवस्था की बढ़ती खाई, अन्धविश्वास से मुक्ति के द्वार की खोज और अशिक्षा के बीच सम्भ्रान्त वर्गों की स्वार्थलोलुपता के छद्म रूपों को नग्न करता है। बल्कि समाज की अन्धी सुरंग में रोशनी भी दिखाता है, जैसे अब भी बहुत कुछ समाप्त नहीं हुआ है।</p> <p>—‘दैनिक जागरण’, पटना</p> <p>मेहनतकश भारतीय जनमानस में उपजे अनेक प्रश्नों की पृष्ठभूमि में आज की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति का आईना है ‘जनवासा’। इस नाटक में सुधारवादी एवं तथाकथित क्रान्तिकारी, दोनों ही अपनी सूरत पहचान सकते हैं।</p> <p>—कामरेड डी. प्रकाश</p> <p>‘जनवासा’ में क्रान्ति और कल्याण की दुकानदारी करनेवालों के असली स्वरूप को उजागर किया गया है। सत्य के पक्ष में खड़ा होने पर कौन मित्र बनेंगे, कौन दुश्मन—इसकी परवाह किए बग़ैर रवीन्द्र भारती ने साहित्यिक ईमानदारी का परिचय दिया है।</p> <p>—सुरेश भट्ट, एक्टिविस्ट</p> <p>एक तीख़ा एवं विचारोत्तेजक नाटक है ‘जनवासा’। भाषा, शिल्प, संगीत एवं कथन, उपकथन हृदयग्राही है। बेहद रोचक यह नाटक सिर्फ़ राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों की सच्चाई का न सिर्फ़ दर्शन कराता है, बल्कि भारतीय लोक-परम्परा के बहुरंग को भी उजागर करता है। बहुत दिनों के बाद एक बढ़िया प्ले देखने को मिला।</p> <p>—डॉ. खालिक चौधरी (समाजशास्त्री)
Read moreAbout the Book
‘जनवासा’ की प्रस्तुति देखकर भूदान के भ्रष्टाचार, स्वयंसेवियों की स्वयं की सेवा और क्रान्तिकारी धारा की पतनशीलता की समकालीनता का दर्शन हुआ। समय के सच पर भारती की अद्भुत पकड़ है।</p>
<p>—अरुण कुमार, ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’, पटना</p>
<p>सच कहा जाए तो ‘जनवासा’ मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा कोलाज है जिसका हर रंग सामाजिक सरोकार के ताने-बाने में समाया है। नाटक नक्सलवादी विचारधाराओं के टकराव, भूदान आन्दोलन, वर्णव्यवस्था की बढ़ती खाई, अन्धविश्वास से मुक्ति के द्वार की खोज और अशिक्षा के बीच सम्भ्रान्त वर्गों की स्वार्थलोलुपता के छद्म रूपों को नग्न करता है। बल्कि समाज की अन्धी सुरंग में रोशनी भी दिखाता है, जैसे अब भी बहुत कुछ समाप्त नहीं हुआ है।</p>
<p>—‘दैनिक जागरण’, पटना</p>
<p>मेहनतकश भारतीय जनमानस में उपजे अनेक प्रश्नों की पृष्ठभूमि में आज की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति का आईना है ‘जनवासा’। इस नाटक में सुधारवादी एवं तथाकथित क्रान्तिकारी, दोनों ही अपनी सूरत पहचान सकते हैं।</p>
<p>—कामरेड डी. प्रकाश</p>
<p>‘जनवासा’ में क्रान्ति और कल्याण की दुकानदारी करनेवालों के असली स्वरूप को उजागर किया गया है। सत्य के पक्ष में खड़ा होने पर कौन मित्र बनेंगे, कौन दुश्मन—इसकी परवाह किए बग़ैर रवीन्द्र भारती ने साहित्यिक ईमानदारी का परिचय दिया है।</p>
<p>—सुरेश भट्ट, एक्टिविस्ट</p>
<p>एक तीख़ा एवं विचारोत्तेजक नाटक है ‘जनवासा’। भाषा, शिल्प, संगीत एवं कथन, उपकथन हृदयग्राही है। बेहद रोचक यह नाटक सिर्फ़ राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों की सच्चाई का न सिर्फ़ दर्शन कराता है, बल्कि भारतीय लोक-परम्परा के बहुरंग को भी उजागर करता है। बहुत दिनों के बाद एक बढ़िया प्ले देखने को मिला।</p>
<p>—डॉ. खालिक चौधरी (समाजशास्त्री)
Book Details
-
ISBN9788171199839
-
Pages100
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Khana Thanda Ho Raha Hai
- Author Name:
Shivshankari
- Book Type:

-
Description:
इसे शिवशंकरी का दुस्साहस ही कहा जाना चाहिए कि लगातार असंवेदनशील होती दुनिया में उनकी कहानियाँ मूलत: संवेदना की कहानियाँ हैं। मुख्य बात यह है कि उनकी संवेदना का कहीं अन्त नहीं होता बल्कि उनकी संवेदना इस समाज के अत्यधिक असंवेदनशील हो गए आदमी का हृदय-परिवर्तन करने का जोखिम उठाती है। ‘खाना ठंडा हो रहा है’ का बदचलन नायक नटराजन का यूँ बदलना नाटकीय भले ही लगे, मगर मानवता की यह ज़रूरी आवश्यकता है।
उनकी संवेदना प्रेम और ममता का जड़ रूप नहीं है। वे नक़ली और दिखावटी संवेदना के जाल में न फँसकर शाश्वत संवेदना रचती हैं। उनका मानना है कि ‘स्टेप्ती’ भावशून्य यंत्रों के काम आ सकती है, मानव के नहीं। लेखिका की संवेदना अपनी अलग ज़मीन तलाशती है। अर्थात् किसी ख़ास बने-बनाए ढर्रे पर केन्द्रित न होकर उनकी संवेदना मानवीय सम्बन्धों के विभिन्न पहलुओं की गहरी पड़ताल करती है। वे कहीं माँ-बेटी के सम्बन्धों को अर्थ देती हैं तो कहीं समाज द्वारा तिरस्कृत नारी को हौसला। वक़्त के इस दौर में उनकी कहानियों से गुज़रना सही मायने में अपना और अपने होने का अर्थ खोजना है।
Rakta Kalyan
- Author Name:
Girish Karnad
- Book Type:

-
Description:
सुविख्यात रंगकर्मी और कन्नड़ लेखक गिरीश कारनाड की यह नाट्यकृति एक ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। बसवण्णा नाम का एक कवि और समाज-सुधारक इसका केन्द्रीय चरित्र है। ईस्वी सन् 1106-1168 के बीच मौजूद बसवण्णा को एक अल्पजीवी ‘वीरशैव सम्प्रदाय' का जनक माना जाता है।
लेकिन बसवण्णा के जीवन-मूल्यों, कार्यों और उसके द्वारा रचित पदों की जितनी प्रासंगिकता तब रही होगी, उससे कम आज भी नहीं है, बल्कि अधिक है; और इसी से गिरीश कारनाड जैसे सजग लेखक की इतिहास-दृष्टि और उनके लेखन के महत्त्व को समझा जा सकता है। बसवण्णा के जीवन-मूल्य हैं—सामाजिक असमानता का विरोध, धर्म-जाति, लिंग-भेद आदि से जुड़ी रूढ़ियों का त्याग, और ईश्वर-भक्ति के रूप में अपने-अपने ‘कायक’ यानी कर्म का निर्वाह। आकस्मिक नहीं कि उसके जीवनादर्शों में यदि गीता के कर्मवाद की अनुगूँज है तो परवर्ती कबीर भी सुनाई पड़ते हैं। लेकिन राजा का भंडारी और उसके निकट होने के बावजूद रूढ़िवादी ब्राह्मणों अथवा वर्णाश्रम धर्म के पक्ष में खड़ी राजसत्ता की भयावह हिंसा से अपने ‘शरणाओं’ की रक्षा वह नहीं कर पाता और न उन्हें प्रतिहिंसा से ही रोक पाता है।
लेखक के इस समूचे घटनाक्रम को—बसवण्णा के जीवन से जुड़े तमाम अत्कर्य लोकविश्वासों को झटकते हुए एक सांस्कृतिक जनान्दोलन की तरह रचा है। विचार के साथ-साथ एक गहरी संवेदनशील छुअन और अनेक दृश्यबन्धों में समायोजित सुगठित नाट्यशिल्प।
ज़ाहिर है कि इस सबका श्रेय जितना लेखक को है, उतना ही अनुवादक को है। अतीत के कुहासे से वर्तमान की तर्कसंगत तलाश और उसकी एक नई भाषिक सर्जना—हिन्दी रंगमंच के लिए ये दोनों ही चीज़ें समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
Sabase Bada Sawal
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

-
Description:
हरिशंकर परसाई की कई कहानियों का मंचन विभिन्न रंग-मंडलियाँ और निर्देशक करते रहे हैं। नाटकीयता उनकी कहानियों के प्रमुख तत्त्वों में से एक है जिसके चलते वे आसानी से बेहतरीन नाट्य-प्रस्तुतियों में ढल जाती हैं।
लेकिन ‘सबसे बड़ा सवाल’ नाटक ही है, और सम्भवत: परसाई जी की एकमात्र नाट्य-रचना। दृश्य-योजना, पात्रों की संकल्पना, परिस्थितियों के ‘कंस्ट्रास्ट’ और दृश्यों के कम्पोजीशन में यह नाटक श्रेष्ठ नाटकों की कोटि में ठहरता है जिसे पढ़ना जितना दिलचस्प है, मंच पर देखना उससे भी ज्यादा उत्तेजक होगा।
नाटक की कथावस्तु राजनीतिक है, और पृष्ठभूमि है एक चुनाव की जिसमें चार पार्टियाँ हिस्सा ले रही हैं—काली पार्टी, सफेद पार्टी, पीली पार्टी और विजय पार्टी।
सुसंगत दृश्यों, संवादों और समाज व राजनीति के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले पात्रों के माध्यम से यह नाटक भ्रष्टाचार, राजनेताओं के पाखंड और आम जनता के भीड़ में बदल जाने की प्रवृत्ति के साथ-साथ युवा वर्ग की दिशाहीन समझौतापरस्ती को भी उजागर करता है। नाटक में कई मोड़ ऐसे भी आते हैं जहाँ से हमें अपना वर्तमान झाँकता दिखाई देता है।
Sakharam Binder
- Author Name:
Vijay Tendulkar
- Book Type:

-
Description:
सरोजिनी वर्मा द्वारा मराठी के प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर की अत्यन्त विवादास्पद और बहुचर्चित कृति ‘सखाराम बाइंडर’ का सशक्त और प्राणवान अनुवाद, जिसने रंगमंच पर दाम्पत्य जीवन की गोपनीय नैतिकता का साहसपूर्ण ढंग से पर्दाफ़ाश किया है। सरकारी नियंत्रण को चुनौती देकर उच्चतम न्यायालय से लेखकीय अभिव्यक्ति के आधार पर मान्यता पानेवाला यह अपने ढंग का अकेला और अनूठा नाटक है।
‘सखाराम बाइंडर’ को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वह ग़लाज़त से भरी दिखावटी सम्भ्रान्तता को पहली बार इतने सक्षम ढंग से चुनौती देता है। रटे-रटाए मूल्यों को सखाराम ही नहीं, इस नाटक के सारे पात्र अपनी पात्रता की खोज में ध्वस्त करते चले जाते हैं। जिन नक़ली मूल्यों को हम अपने ऊपर आडम्बर की तरह थोपकर चिकने-चुपड़े बने रहना चाहते हैं, उसे सही-सही इस आईने में निर्ममता से उघड़ता हुआ देखते हैं। ‘सखाराम बाइंडर’ वही आईना है।
भाषा के स्तर पर सारे पात्र बड़ी खुली और ऐसी बाज़ारूपन से संयुक्त भाषा का प्रयोग करते हैं जिन्हें हमने अकेले-दुकेले कभी सुना ज़रूर होगा, किन्तु उसे अपने संस्कारिता का अंश मानने में सदैव कतराते रहे हैं।
पूरे नाटक में कथावस्तु की विलक्षणता न होते हुए भी पात्रों का आपसी संयोजन भाषा के जिस स्तर पर नाटककार ने किया है, वही नाटकीयता को उभारने में अद्भुत रूप से सफल हुआ है।
Parsi Theater : Udbhav Evam Vikash
- Author Name:
Somnath Gupta
- Book Type:

- Description: डॉ. सोमनाथ गुज ने सन् 1947 में हिन्दी नाटक साहित्य का इतिहास लिखा था । प्रस्तुत रचना में यथास्थान यह बताया गया है कि विक्टोरिया थियोट्रिकल मण्डली की स्थापना से पहले भी पारसियों और गैर-पारसियों की मण्डलियाँ नाटक किया करती थीं परन्तु बड़े और सुदृढस्तर पर नाट्यकला को प्रतिष्ठित करने का श्रेय विक्टोरिया, एलफिनस्टन और जोरास्ट्रियन नाटक मण्डलियों को ही था । इनके सम्बन्ध में गुजराती के साप्ताहिक पत्र ' रास्तगोफ्तार ', में थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती है । इसके सम्पादक कैखुसरो कावराजी स्वयं नाटककार, निर्देशक और अभिनेता थे । अंग्रेजी के ' बाम्बे टाइम्स ' और ' बाम्बे कूरियर एण्ड टेलिग्राफ ' की पुरानी फाइलें अनेकों सूचनाओं से भरी पड़ी हैं । महाराष्ट्र सरकार के ' आलेख और पुरातत्व विभाग' की सामग्री जीर्ण-शीर्ण है । सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण गुजराती साप्ताहिक ' कैसरेहिन्द ' है । इसी पत्र में धनजी भाई नसरवानजी पटेल के पारसी नाटक सम्बन्धी अनेकों लेख निरन्तर रूप से प्रकाशित हुए थे । इन लेखों में अधिकांशत: पारसी अभिनेताओं की चर्चा है । कुछ नाटक मण्डलियों, उनके मालिकों और निर्देशकों का विवरण भी आ गया है । जहाँगीर खम्बाता की रचना ' मारो नाटकी अनुभव ' भी बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई है । सभी नाटक मण्डलियाँ जहाँगीर की अभिनय-कला और निर्देशन शक्ति का लोहा मानती थी । सबसे अधिक उपयोगी और प्रमाणित वे दीबाचे (भूमिकाएँ) है जो किसी-किसी नाटक के आदि में मिलते हैं । इन दीबाचों से यह पता चलता है कि नाटक किसने लिखा? किस नाटक मण्डली के लिए लिखा? कब उसका प्रकाशन हुआ? तथा नाटककार का नाटक-विशेष के लिए क्या दृष्टिकोण है? प्रस्तुत कृति में सभी प्राप्य और दुधार सामग्री का उपयोग किया गया है । ऐसा ग्रंथ हिन्दी में पारसी थियेटर पर नहीं लिखा गया जिसमें मूलभूत स्रोतों पर अवलम्बित इतनी अधिक सामग्री मिलती हो ।
Umang
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
यह शायद पहली बार हो रहा है कि हिन्दी के कई पीढ़ियों के मूर्धन्य और महत्त्पूर्ण लेखकों में बच्चों के लिए कुछ लिखने का उत्साह जागा है। उनमें हिन्दी के कथाकार, कवि, नाटककार—कृष्णा सोबती, श्रीलाल शुक्ल, कमलेश्वर, रमेशचन्द्र शाह, मृदुला गर्ग, गिरिराज किशोर, राजेश जोशी, उदय प्रकाश, सुधा अरोड़ा, दिविक रमेश, राजेश जैन तथा रंगकर्मी कमल वसिष्ठ जैसे लेखक शामिल हैं।
दिल्ली में पिछले कई वर्षों से सक्रीय बालरंग संस्था 'उमंग' के रजतपर्व पर विशेष रूप से प्रकाशित इस संकलन में नाटक, कहानियाँ और एक पटकथा हैं : जैसे बच्चों की दुनिया रंगारंग और विविध होती है, वैसे ही यह संकलन किसी एक विधा तक महदूद नहीं है। इसमें उल्लास, उमंग, खेल के साथ-साथ समझ और आनन्द का मेल है। हमें उम्मीद है कि हिन्दी में अपने ढंग का यह प्रकाशन बच्चों के लिए हमारे बड़े और महत्त्पूर्ण लेखकों द्वारा आगे भी लिखने की उत्साहजनक शुरुआत है।
बच्चे इन नाटकों को खेलकर, इन कहानियों का पाठ कर उन्हें अपने लिए जीवन्त बनाएँगे। वे खेल-खेल में इन इबारतों में मनचाहे परिवर्द्धन और संशोधन भी करते चलेंगे। उनकी सृजनात्मकता को यह सामग्री उकसाए और सक्रीय करे, इसी में इस प्रयत्न की सच्ची सार्थकता होगी।
Lakshagrih Evam Anya Natak
- Author Name:
Vratya Basu
- Book Type:

-
Description:
बांग्ला के प्रख्यात नाटककार और रंगकर्मी व्रात्य बसु से हिन्दी के पाठक अपरिचित नहीं हैं। वर्षों पहले ‘चतुष्कोण' शीर्षक से उनके चार नाटकों का संग्रह हिन्दी में अनूदित होकर आ चुका है, जिसे नाटक-प्रेमी पाठकों के साथ-साथ रंगकर्मियों ने भी बहुत उत्साह के साथ स्वीकार किया।
इस संग्रह में उनके तीन नाटक संकलित हैं—‘लाक्षागृह’, ‘संध्या की आरजू में भोर का सरसों फूल’ और ‘बम’ (बोमा)। व्रात्य बसु का नाटककार अपने समय को लक्षित होता है लेकिन जहाँ से वे अपने वर्तमान को देखते हैं, वह एक वृहत् दृष्टि-बिन्दु है। इस संग्रह में शामिल नाटक भी इसके अपवाद नहीं हैं। ‘लाक्षागृह’ में यदि वे महाभारत की एक घटना को आधार बनाकर मनुष्य की चिरन्तन प्रवृत्तियों की पड़ताल करते हैं तो, ‘संध्या की आरजू...’ के अपने पात्रों को आज के कॉरपोरेट तंत्र में स्थित करते हैं और इधर उभरी नई विडम्बनाओं पर प्रकाश डालते हैं। समय के इस बड़े अन्तराल के बीच ‘बम' की पृष्ठभूमि आज़़ादी के पहले का अविभाजित बंगाल है जिसमें हमें अरविन्द घोष मिलेंगे—ऋषि के रूप में नहीं, क्रन्तिकारी के रूप में...!
इसके अलावा इन नाटकों का सबसे बड़ा आकर्षण इनका भाषा-सौष्ठव और मंचीयता है जो इन्हें एक तरफ़ अभिनेय बनाती है तो दूसरी तरफ़ पठनीय भी। कथ्य स्वयं एक तत्त्व है जिसके लिए इन्हें पढ़ा ही जाना चाहिए।
Chaar Natak
- Author Name:
Shyam Manohar
- Book Type:

- Description: “मराठी की रंगपरम्परा बहुत समृद्ध और सजीव रही है और उसका प्रभाव हिन्दी पर भी पड़ा है। मराठी और हिन्दी के बीच रंगमंच और नाटक के क्षेत्र में लगातार आदान-प्रदान होता रहा है। मराठी के प्राय: सभी बड़े आधुनिक नाटककारों के नाटक हिन्दी में अनूदित हुए और अनेक निर्देशकों द्वारा कई शहरों में खेले जाते रहे हैं। श्याम मनोहर के ‘चार नाटक’ मराठी-हिन्दी के विद्वान् निशिकान्त ठकार द्वारा अनूदित होकर यहाँ पहली बार हिन्दी में प्रकाशित हो रहे हैं। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत अन्य भारतीय भाषाओं से अच्छी और प्रासंगिक सामग्री हिन्दी में लाने के हमारे प्रयत्न का यह हिस्सा है।”
Saroj Ka Sannipat
- Author Name:
Vidya Sagar Nautiyal
- Book Type:

- Description: Drama
Aap Na Badlenge
- Author Name:
Mamta Kaliya
- Book Type:

-
Description:
मैंने तुम्हारा नाटक पढ़ लिया था। सबसे पहली बात तो यह कि इसमें एक बहुत ही सामयिक और महत्त्वपूर्ण थीम को उठाया गया है। दहेज के सवाल पर हर स्तर पर कुछ न कुछ लिखा जाना चाहिए और मुझे ख़ुशी है कि तुमने इस समस्या पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए नाटक का सहारा लिया। दूसरे तुम्हारी भाषा में बहुत कसावट है और नाटकीयता भी है। प्रारम्भिक दृश्य बड़े सघन लगते हैं और कार्य-व्यापार में भी एक तरह की नाटकीय क्रूरता का अहसास होता है जो ज़रूरी है।
—नेमिचन्द्र जैन, प्रख्यात रंग-आलोचक
इधर मैंने अपने विद्यार्थियों को 'यहाँ रोना मना है' एकांकी पढ़ाया। एकांकी सबको बहुत अच्छा लगा।
—के.एम. मालती; अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, गवर्नमेंट आर्ट्स एवं साइंस कॉलेज, कालीकट, केरल
Nyayapriya
- Author Name:
Albert Camus
- Book Type:

-
Description:
सुविख्यात फ्रेंच लेखक अल्बैर कामू का यह ऐतिहासिक नाटक सन् 1903 के क्रान्तिकालीन रूस में आतंकवादियों के एक गुट द्वारा आयोजित एक बम कांड का यथातथ्य चित्रण करता है। जैसा कि लेखक ने स्वयं कहा है कि ‘इस नाटक की कुछ स्थितियाँ यथार्थतः ऐतिहासिक हैं। इसके सभी पात्र वास्तविक हैं और उन्होंने उसी तरह का आचरण किया था, जैसा कि मैंने बताया है।’ यहाँ तक कि ‘न्यायप्रिय’ के नायक का नाम कलियायेव भी वास्तविक है।
अतिवादियों के इस गुट ने, जो क्रान्तिकारी समाजवादी पार्टी का ही हिस्सा था, रूसी सम्राट के चाचा प्रधान ड्यूक सार्ज की हत्या की योजना बनाई थी, जिसे कलियायेव ने पूरा किया। लेकिन लेखक के लिए इस समूचे घटनाक्रम में ड्यूक की हत्या के बजाय वह महान उद्देश्य और उसे पूरा करते हुए बचाए गए वे मानवीय मूल्य महत्त्वपूर्ण हैं, जो आतंकवाद को क्रान्तिकारिता के उच्चादर्श तक ले जाते हैं। कामू ने इस मुद्दे पर कलियायेव और दूसरे साथियों के बीच होनेवाली बहस को सर्वाधिक महत्त्व और विस्तार दिया है। सामाजिक अन्याय पर खड़ी एक दमनकारी राज्य-व्यवस्था से नाभिनालबद्ध दोषी व्यक्ति को खत्म करते हुए भी मानवीय करुणा, न्याय-भावना और आत्म-गौरव को बचाये रखने का संकल्प एक सच्चा क्रान्तिकारी ही साध सकता है। कलियायेव इन्हीं मूल्यों के लिए अपना बलिदान देता है और संसार के क्रान्तिकारी इतिहास में एक और अविस्मरणीय अध्याय जोड़ जाता है।
Balrang
- Author Name:
Rekha Jain
- Book Type:

-
Description:
भारत के कई प्रदेशों और हिन्दी अंचल में पिछले कुछ बरसों में बाल रंगमंच का तेज़ी से विस्तार हुआ है। इस विस्तार का पर्याप्त वैचारिक और तथ्यपरक सर्वेक्षण अभी तक नहीं हो पाया है। दिल्ली की नाट्यसंस्था ‘उमंग’ की रजत जयंती पर ऐसा आकलन करने का एक प्रयत्न है यह पुस्तक। हिन्दी में पहली बार बाल रंगमंच को लेकर वैचारिक विमर्श, रंगपद्धतियों और गतिविधियों, बाल रंग संस्थाओं और ‘उमंग’ के पच्चीस वर्ष पर सामग्री एकत्र की गई है। इसमें हिन्दी अंचल के अलावा पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और मणिपुर के भी बाल रंगमंच पर उपयोगी जानकारी संकलित की गई है।
विष्णु प्रभाकर, नेमिचन्द्र जैन, ब.व. कारंत, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, नरेन्द्र शर्मा, बंसी कौल, भानुशंकर मेहता, गिरीश रस्तोगी, ललित मोहन थपलियाल, देवेन्द्रराज अंकुर, प्रेमा कारंत, हरेकृष्ण देवसरे, अलखनन्दन, महेश आनन्द, सुषमा सेठ, मलयश्री हाशमी आदि को बाल रंगमंच के सिलसिले में एक पुस्तक में पाने का यह शायद पहला अवसर है...दुर्लभ तो है ही।
Dhruvswamini
- Author Name:
Jaishankar Prasad
- Book Type:

- Description: गुप्त काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचा गया नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ जयशंकर प्रसाद की अन्तिम नाट्य-कृति है जिसे उनकी श्रेष्ठतम नाट्य-रचना भी माना जाता है। मंचन की दृष्टि से भी अत्यन्त सफल रहे इस नाटक की घटनाओं का इतिहास-सम्मत तथ्यों की रोशनी में विवेचन भी प्रसाद ने इस पुस्तक में किया है। नाटक की कथा गुप्तवंश के शासक रामगुप्त की पत्नी ध्रुवस्वामिनी के इर्द-गिर्द घूमती है और प्राचीन भारत में स्त्री के आत्मसम्मान तथा साहस को रेखांकित करती है। रामगुप्त की उपेक्षा और सन्देह की शिकार ध्रुवस्वामिनी कायर राजा के निर्णय का सशक्त प्रतिरोध कर अपने सम्मान की रक्षा करती है तथा चन्द्रगुप्त के साथ मिलकर राज्य के शत्रु शकराज से भी मुक्ति पाती है। यह नाटक भारतीय स्त्री का एक अनूठा चित्र प्रस्तुत करता है जिसमें नारीसुलभ कोमल भावनाओं के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम तथा अपने निजी सम्मान का अद् भुत सम्मेल देखने को मिलता है। नाटक की भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी इतनी प्रवहमान है कि हर पात्र तथा हर परिस्थिति का जैसे एक चित्र हमारे सामने उभरता चलता है। बहुत ज़्यादा पात्र का न होना इसे मंच-संयोजन के लिहाज़ से भी एक अच्छे नाटक का रूप देता है।
Ek Kanth Vishpai
- Author Name:
Dushyant Kumar
- Book Type:

-
Description:
शिव-सती प्रसंग को आधार बनाकर लिखी गई इस काव्य-नाटिका में दुष्यन्त कुमार ने बड़ी बेबाकी से कई ऐसे प्रसंगों को उठाया है जो हमारे समय में प्रासंगिक हैं। देवताओं में शिव ऐसे मिथक हैं जो औरों से बिलकुल अलग आभावाले हैं। इस शिव की ख़ासियत यही है कि अगर इनका तीसरा नेत्र खुल गया तो फिर दुनिया को ख़ाक होते देर नहीं लगेगी। सभी प्रार्थना करते हैं कि यह नेत्र यूँ ही बन्द रहे। क्या यह शिव उस आम आदमी की शक्ति का पर्याय नहीं जिसके जगने पर सत्ताधीशों को ज़मींदो़ज़ होते देर नहीं लगती। ये सत्ताधीश अपनी भलाई इसी में समझते हैं कि शिव अपना नेत्र बन्द रखें। अर्थात् जनता अपनी शक्ति अपने सामर्थ्य को भूली रहे। वह सोयी ही रहे, किसी भी क़ीमत पर जगने न पाए। यह शिव जो कि एक जन-प्रतीक है, दुनिया भर के विष को अपने कण्ठ में समाहित किए हुए है। चार अंकों में फैला काव्य-नाट्य ‘एक कण्ठ विषपायी’ का वितान कुछ ऐसा ही है।
काव्य-नाटिका ‘एक कण्ठ विषपायी’ में एक पात्र है ‘सर्वहत’ जो अनायास ही उभरकर आधुनिक प्रजा का प्रतीक बन गया। दरअसल यह सर्वहत उस सर्वहारा वर्ग का ही प्रतिनिधि है जो हर जगह उपेक्षित रहता है। एक जगह यह सर्वहत कहता है—‘मैं सुनता हूँ...मैं सब कुछ सुनता हूँ, सुनता ही रहता हूँ, देख नहीं सकता हूँ, सोच नहीं सकता हूँ और सोचना मेरा काम नहीं है। उससे मुझे लाभ क्या मुझको तो आदेश चाहिए। मैं तो शासक नहीं प्रजा हूँ। मात्र भृत्य हूँ केवल सुनना मेरा स्वभाव है।’ क्या आज भी जनता की यही स्थिति नहीं है? वह मूकद्रष्टा की भूमिका में होती है। जनता के सेवक के नाम पर शासन करनेवाले नेता और नौकरशाह अपने को अधिनायक समझने लगते हैं। लोकतंत्र भी आज महज़ एक मज़ाक़ बनकर रह गया है। वंशवाद, परिवारवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद से आज सभी दल आप्लावित हैं। एक जगह सर्वहत कहता भी है—‘शासन के ग़लत-सलत झोंकों के आगे भी फ़सलों-से विनयी हम बिछे रहे। निर्विवाद हमारे व्यक्तित्व के लहलहाते हुए खेतों से होकर दक्ष ने बहुत-सी पगडंडियाँ बनाईं, कर दीं सब फ़सलें बर्बाद।’
Ajatshatru
- Author Name:
Jaishankar Prasad
- Book Type:

-
Description:
प्रसाद के नाटकों की दीवारें प्राय: इतिहास की नींव पर ही खड़ी हैं। लेकिन अजातशत्रु में उन्होंने ऐतिहासिक परम्परा और कल्पना का सजग सम्मिश्रण किया है। अधिकांश पात्र, घटना-क्रम और कथा-विस्तार भी इतिहास सम्मत है।
अन्तर्द्वन्द्व इस नाटक का मूलाधार है। मगध, कौशल और कौशम्बी में प्रज्वलित विरोधाग्नि इस पूरे नाटक में फैली हुई है। उत्साह और शौर्य से परिपूर्ण इस नाटक में वीर-रस की ही प्रधानता है।
Kamla
- Author Name:
Vijay Tendulkar
- Book Type:

-
Description:
कमला इस पुरुष प्रधान समाज में शताब्दियों से जिन्दा है। कहीं उसे बाजार हाट से पशुओं की तरह खरीद लिया जाता है तो कहीं दान-दहेज में लिपटी चीज की तरह प्राप्त किया जाता है। नाम चाहे उसका सरिता हो या कुछ और, रहती वह कमला ही है। लेकिन इस मुर्दा समाज में शताब्दियों से जिन्दा यह नारी-देह आखिर कब तक रूह-विहीन रखी जाएगी, यह सवाल कमला में पूरी गम्भीरता से उठाया गया है।
सुविख्यात मराठी नाटककार विजय तेन्दुलकर की यह नाट्यकृति हिन्दी रंगमंच और साहित्यिक हलकों में विशेष चर्चित रही है। विशेषकर इसलिए भी कि पत्रकारिता के कैरियरिस्ट दिमाग से अखबारी पन्नों पर उछाली गई कमला जिस समाज-व्यवस्था और मानसिक सड़ाँध का परिणाम है, उसकी ओर भी सार्थक संकेत किया गया है। हमारे समाज के तथाकथित आभिजात्य, उसके आयातित सांस्कृतिक मिजाज और जगमग सभ्यता का यह ढोंग ही होगा कि वह अपनी मानवीय संवेदना और सामाजिक जागरूकता का ढोल पीटता फिरे तथा अधिसंख्य अनपढ़ आम भारतीय को बड़े घरानों के अंग्रेजी अखबारों के जरिये सचेत करने की डींग हाँके। काका के माध्यम से इस अखबारी प्रवृत्ति पर तेन्दुलकर ने गहरी चोट की है। नारी की खरीद- फरोख्त और उसकी गुलामी को सप्रमाण पेश करने- वाले पत्रकार जयसिंह जाधव का असली नारी-दर्शन क्या है, इसे सरिता के प्रति उसके व्यवहार से जाना जा सकता है । साथ ही एक अर्थपूर्ण संकेत इसमें यह भी है कि पत्नी के रूप में सरिता को अपनी परतंत्रता का बोध अपने स्वतंत्रचेता पति के बजाय उसी कमला से हुआ जो गुलाम और गुलामी के प्रमाणस्वरूप इस नाटक के केन्द्र में है। वास्तव में विजय तेन्दुलकर की यह नाट्यरचना नारी-मुक्ति आन्दोलन के इस युग में उन बुनियादी सवालों तक ले जाती है, जहाँ से इस विषय पर एक कारगर बहस शुरू हो सकती है।
Jati Hi Puchho Sadhu ki
- Author Name:
Vijay Tendulkar
- Book Type:

-
Description:
जीवन के स्याह पक्षों को निर्मम पर्यवेक्षण से उजागर करने के लिए प्रसिद्ध रहे विजय तेन्दुलकर का यह नाटक समकालीन सामाजिक विद्रूप को थोड़ा व्यंग्यात्मक नज़रिए से खोलता है।
एम.ए. की डिग्री से लैस होकर महीपत नौकरी की जिस खोज-यात्रा से गुज़रता है, वह शिक्षा की वर्तमान दशा, समाज के विभिन्न शैक्षिक स्तरों के परस्पर संघर्ष और स्थानीय स्तर पर सत्ता के विभिन्न केन्द्रों के टकराव की अनेक परतों को खोलती जाती है।
इस नाटक को पढ़ते-देखते हुए हमें स्वातंत्र्योत्तर भारत की कई ऐसी छवियों का साक्षात्कार होता है जो धीरे-धीरे हमारे सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन का हिस्सा हो चुकी हैं। वे हमें स्वीकार्य लगती हैं लेकिन उन्हीं के चलते धीरे-धीरे हमारा सामूहिक चरित्र खोखला होता जा रहा है।
अपने दो-टूकपन, सामाजिक सरोकार और व्यंग्य की तीव्रता के कारण अनेक निर्देशकों, अभिनेताओं और असंख्य दर्शकों की पसन्द रहे इस नाटक के दिल्ली में ही शताधिक मंचन हो चुके हैं। मूल मराठी से वसन्त देव द्वारा किए गए इस अनुवाद की गुणवत्ता तो इसी तथ्य से साबित हो जाती है कि पुस्तक रूप में इस नाटक के पाठ और मंच पर उसके प्रदर्शन में कोई बिन्दु ऐसा नहीं आता, जहाँ हिन्दी पाठक किसी अभिव्यक्ति या व्यंजना को अपने लिए अपरिचित महसूस करता हो।
Sampurna Natak : Mrinal Pandey
- Author Name:
Mrinal Pande
- Book Type:

-
Description:
विख्यात कथाकार, पत्रकार और समाज-चिन्तक मृणाल पाण्डे के नाटकों का यह संग्रह उनके एक और महत्त्वपूर्ण रचना-पक्ष को सामने लाता है। नाटककार के रूप में उनकी यात्रा अस्सी के दशक से शुरू हुई और अपनी तमाम कार्यकारी तथा रचनात्मक व्यस्तताओं के बीच समय-समय पर उन्होंने इसे बरक़रार रखा। उनका पहला नाटक ‘मौजूदा हालात को देखते हुए’ था जिसका प्रकाशन ‘नटरंग’ में और भोपाल में मंचन भी हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से उसकी कोई प्रतिलिपि अब प्राप्य नहीं है। यही स्थिति उनके रेडियो नाटकों की भी है, जिनमें से अधिकांश आकाशवाणी के आर्काइव्ज़ में गुम हैं। सो इस संग्रह में दो ही रेडियो नाटक शामिल हो सके हैं, ‘सुपर मैन की वापसी’ और ‘धीरे-धीरे रे मना’।
पुस्तक के मुख्य भाग में मृणाल जी के पाँच पूर्णकालिक नाटक हैं जो न केवल नाटककार के रूप में उनकी प्रतिभा के परिचायक हैं बल्कि उनकी वैचारिक आत्मनिर्भरता को भी रेखांकित करते हैं। संग्रह का पहला नाटक ‘जो राम रचि राखा’ उस दौर में लिखा गया था जब हिन्दी में जनवादी तर्ज की ‘प्रतिबद्धता’ धार्मिक आस्था की तरह स्थापित थी। उस दौर में उन्होंने इस नाटक के पात्र मन्ना सेठ के हास्यास्पद क्रान्ति-स्वप्नों के माध्यम से अपने समाज से अपरिचित और निरर्थक प्रतीकों से भरी तत्कालीन वैचारिक दुनिया की तरफ़ इशारा किया। इस पर उनको आलोचना भी सहनी पड़ी।
आलोचना उन्हें अपने नवीनतम नाटक ‘शर्मा जी की मुक्तिकथा’ (2002) पर भी मिली जिसको आलोचकों ने जटिल और ‘बहुत प्रयोगधर्मी’ कहा। लेकिन इस सबके बावजूद मृणाल पाण्डे का नाटककार अपने समय की जटिलताओं का सामना करता रहा। उनका मानना है कि “अपनी सच्ची स्थिति को, वह चाहे जितनी भी जटिल क्यों न हो, परिभाषित करना हर लेखक की लेखकीय अनिवार्यता है।” उनके एक पहले नाटक ‘आदमी जो मछुआरा नहीं था’ का फोकस ही यह है कि मनुष्य के लिए उसकी स्वतंत्रता और नियति अन्तत: एक निजी सवाल है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि मृणाल पाण्डे के ये सभी नाटक मंच की कसौटी पर भी खरे उतर चुके हैं। इसलिए सिर्फ़ पाठक ही नहीं, रंगकर्मी भी इस संकलन को उपयोगी पाएँगे और हमें उम्मीद है कि इससे उनकी यह शिकायत काफ़ी हद तक दूर हो जाएगी कि हिन्दी में मंचन करने लायक मौलिक नाटक नहीं लिखे जा रहे।
Raat Beetane Tak Tatha Anya Dhwani Natak
- Author Name:
Mohan Rakesh
- Book Type:

-
Description:
मोहन राकेश की प्रति भा कहानी के क्षेत्र में जगमगाने के बाद नाटक के क्षेत्र में विशेष रूप से चमकी थी । चार-तीन पूर्ण तथा एक अपूर्ण-नाटकों के प्रणयन के अलावा उन्होंने अनेक एकांकी, बीज-नाटक तथा ध्वनि-नाटक लिखे जो रेडियो से समय-समय पर प्रचारित हुए । उनके सभी नाटक साहित्य के उसी तरह अंग हैं जैसे कि रंगमंच के, और यहीं उन्होंने हिंदी की परंपरागत नाटक-विधा का नया मार्ग-दर्शन किया ।
रात बीतने तक शीर्षक एकांकी में बाद में प्रकाशित 'लहरों के राजहंस' की पूर्व झलक मिलती है । उनके प्रथम और सफल नाटक 'आषाढ का एक दिन का रेडियो-रूपांतरण भी इसी संग्रह में है और उनकी प्रसिद्ध कहानी 'उसकी रोटी.' का भी, जिसे नये सिनेमा-दोलन में सबसे पहले फिल्माया गया । उनके मनोहारी यात्रा-वृत्तांत 'आखिरी चट्टान तक' का रेडियो-रूपांतर भी इस संकलन में संगृहीत है ।
संस्कृत की अमर नाट्य-कृतियों के प्रति उनका आकर्षण उनके लिए नाटक-विधा में दिलचस्पी और प्रेरणा का कारण बना-इसका एक और प्रमाण यहीं संगृहीत 'स्वप्नवासवदत्तम्' के रेडियो-रूपांत रण में मिलेगा ।
Gandhi Ki Mrityu
- Author Name:
Nemeth Laszlo
- Book Type:

-
Description:
“महात्मा गाँधी अपने समय में ही नहीं हमारे समय में भी एक प्रतिरोधक उपस्थिति हैं : उनका बीसवीं शताब्दी के विचार, राजनीति और सामाजिक कर्म पर गहरा प्रभाव पड़ा। इन दिनों उनका बहुत बारीक़ पर अचूक अवमूल्यन करने का एक अभियान ही चला हुआ है। इस सन्दर्भ में उनकी मृत्यु पर लिखा गया यह हंगेरियन नाटक, जो सीधे हिन्दी में अनूदित किए जाने का एक बिरला उदाहरण भी है, प्रस्तुत करते हुए हमें उम्मीद है कि गाँधी-विचार और कर्म को ताज़ा नज़र से देखने के प्रयत्न में सहायक होगा।"
—अशोक वाजपेयी
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book