Kaise Bhoolen Aapatkal Ka Dansh
Author:
Dr. Ashok Garg, Subhash Ahuja, Dr. Chandra TrikhaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 960
₹
1200
Available
1971 के भारत-पाक युद्ध एवं बांग्लादेश के नाम से नए राष्ट्र के निर्माण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की छवि को एक नया शिखर प्रदान किया था। एक ऐसा शिखर, जहाँ पहुँचकर, संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता। ये वे दिन थे, जब सरकारी तंत्र एवं सत्ता तंत्र भ्रष्टाचार के मामले में निरंकुश हो चुका था। सामान्य जनों का धैर्य जवाब देने लगा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री उन दिनों भ्रष्टाचार की संरक्षक समझी जा रही थीं। वह अपने संगठन में फैले भीतरी असंतोष को भी कुचल रही थीं और प्रतिपक्षी आवाजों की भी घोर उपेक्षा कर रही थीं।
इसके विरुद्ध संघर्ष में सर्वोदय समाज व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कुछ पुराने निष्ठावान एवं गांधीवादी कांग्रेसियों और समाजवादियों की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रही। अपने समर्पित नेताओं व कार्यकर्ताओं के बल पर संघ ने देश भर में भूमिगत आंदोलन, जन-जागरण एवं अहिंसक सत्याग्रह की जो इबारत दर्ज की, वह ऐतिहासिक थी।
उस समय की सरकार के खिलाफ समाज में गंभीर वैचारिक आक्रोश जाग्रत् करने और बाद में चुनाव की सारी व्यवस्था सँभालने में भी संघ के स्वयंसेवकों ने प्रमुख भूमिका निभाई। इस सारे घटनाक्रम में कई ऐसे गुमनाम कार्यकर्ताओं को अपने जीवन तक गँवाने पड़े। उनके अमूल्य बलिदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। यह शुभ्र ज्योत्स्ना उन सब हुतात्माओं को विनम्र श्रद्धासुमन अर्पित करती है। आपातकाल के काले दिनों का सिलसिलेवार देखा-भोगा जीवंत सच है यह पुस्तक।
ISBN: 9789352664610
Pages: 328
Avg Reading Time: 11 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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आज भारतीय जन-गण के लिए यह जानना भी बहुत ज़रूरी हो गया है कि एक राष्ट्र के रूप में हम एक संगठित राजनीतिक और सांस्कृतिक परम्परा के वारिस हैं। इस अर्थ में भी अकबर का राजनीतिक और सांस्कृतिक विज़न फ़ौरी तौर पर हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी साबित हो सकता है।
Yashpal Ka Viplav-Vol. 4
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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Description:
‘यशपाल का विप्लव’-4 में संकलित लेख स्वातंत्र्योत्तर भारत के लगभग सभी पहलुओं पर मंत्रणा करते दिखते है। फिर चाहे मुद्दा साहित्य, संस्कृति और भाषा का हो, कांग्रेसवाद बनाम मार्क्सवाद का हो, या एक नयी वैश्विक व्यवस्था में भारत की छवि और कर्तव्यों का हो। यहाँ एक ऐसी विस्तृत और समावेशी तस्वीर उभरती है जिसे किसी एक उपन्यास या कई कहानियों में भी समेटना नामुमकिन है। इस लिहाज़ से 'विप्लव' का चौथा भाग भारत के बौद्धिक इतिहास की प्रस्तावना उकेरता है—एक ऐसी पृष्ठभूमि जो आजादी से लेकर अबतक हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित-पोषित करता आई है।
इन लेखों में यशपाल एक दुस्साहसी संपादक के रूप में निखरते हैं जो अपनी लेखनी में तटस्थ पत्रकारिता, तथ्यपरक विवेचना और साहित्यिक स्वायत्तता की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है। शैली और भाषा का एक ऐसा नमूना जो आज के दौर में बेहद प्रासंगिक है। यह कहना उचित होगा कि यशपाल का साहित्य और उनकी पत्रकारिता, दोनों क्रांतिकारी संघर्ष की बौद्धिक उपज हैं। और एक दूसरे के पूरक भी हैं। इसलिए यह किताब हिंदी साहित्य और भारतीय इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए अनिवार्य है।
Pracheen Bharat Mein Rajneetik Vichar Evam Sansthayen
- Author Name:
Ramsharan Sharma
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Description:
प्राचीन भारतीय इतिहास को वैज्ञानिक खोजों के आलोक में व्याख्यायित-विश्लेषित करनेवाले इतिहासकारों में प्रो. रामशरण शर्मा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी इस पुस्तक में उन्होंने प्राचीन भारत की राजनीतिक विचारधाराओं और संस्थाओं के साम्राज्यवादी और राष्ट्रवादी स्वरूप का सर्वेक्षण किया है। इस क्रम में उन्होंने गण, सभा, समिति, परिषद जैसी वैदिक संस्थाओं के जनजातीय स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए ‘विदथ’ नामक लोक-संस्था पर विस्तार से विचार किया है और उत्तर-वैदिक संस्थाओं के अध्ययन में वर्ण और धर्म का महत्त्व दिखाया है। उन्होंने यह भी बताया है कि सातवाहन राज्यव्यवस्था मौर्य और गुप्त व्यवस्थाओं तथा उत्तर और दक्षिण भारत को मिलानेवाली कड़ी का काम करती है।
साथ ही, कुषाण तथा सातवाहन राज्यतंत्रों के विश्लेषण में बाह्य, स्थानीय और सामंतवादी तत्त्वों पर भी प्रो. शर्मा की दृष्टि गई है। कुल मिलाकर, प्रो. शर्मा ने वैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक राज्यव्यवस्था के प्रमुख चरणों का बदलते हुए आर्थिक और सामाजिक संदर्भों में अध्ययन किया है।
उपरोक्त अध्ययन के क्रम में प्रो. शर्मा ने कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं और उनका यथासंभव समाधान भी इस पुस्तक में दिया है। उनका मानना है कि इस काल में जिन राजनीतिक विचारों का जन्म हुआ, उनके पीछे जाति, वर्ण, धर्म और अर्थव्यवस्था की भूमिका को समझे बिना इन विचारों की तह तक पहुँचना संभव नहीं है। इस पुस्तक के प्रकाशन के पूर्व इन मुद्दों पर व्यापक रूप से विचार नहीं किया गया था।
प्राचीन भारतीय इतिहास के छात्रों, शोधार्थियों और अध्यापकों के लिए यह एक आवश्यक ग्रंथ है।
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