Yashpal Ka Viplav-Vol. 4
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‘यशपाल का विप्लव’-4 में संकलित लेख स्वातंत्र्योत्तर भारत के लगभग सभी पहलुओं पर मंत्रणा करते दिखते है। फिर चाहे मुद्दा साहित्य, संस्कृति और भाषा का हो, कांग्रेसवाद बनाम मार्क्सवाद का हो, या एक नयी वैश्विक व्यवस्था में भारत की छवि और कर्तव्यों का हो। यहाँ एक ऐसी विस्तृत और समावेशी तस्वीर उभरती है जिसे किसी एक उपन्यास या कई कहानियों में भी समेटना नामुमकिन है। इस लिहाज़ से 'विप्लव' का चौथा भाग भारत के बौद्धिक इतिहास की प्रस्तावना उकेरता है—एक ऐसी पृष्ठभूमि जो आजादी से लेकर अबतक हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित-पोषित करता आई है।</p> <p>इन लेखों में यशपाल एक दुस्साहसी संपादक के रूप में निखरते हैं जो अपनी लेखनी में तटस्थ पत्रकारिता, तथ्यपरक विवेचना और साहित्यिक स्वायत्तता की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है। शैली और भाषा का एक ऐसा नमूना जो आज के दौर में बेहद प्रासंगिक है। यह कहना उचित होगा कि यशपाल का साहित्य और उनकी पत्रकारिता, दोनों क्रांतिकारी संघर्ष की बौद्धिक उपज हैं। और एक दूसरे के पूरक भी हैं। इसलिए यह किताब हिंदी साहित्य और भारतीय इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए अनिवार्य है।
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‘यशपाल का विप्लव’-4 में संकलित लेख स्वातंत्र्योत्तर भारत के लगभग सभी पहलुओं पर मंत्रणा करते दिखते है। फिर चाहे मुद्दा साहित्य, संस्कृति और भाषा का हो, कांग्रेसवाद बनाम मार्क्सवाद का हो, या एक नयी वैश्विक व्यवस्था में भारत की छवि और कर्तव्यों का हो। यहाँ एक ऐसी विस्तृत और समावेशी तस्वीर उभरती है जिसे किसी एक उपन्यास या कई कहानियों में भी समेटना नामुमकिन है। इस लिहाज़ से 'विप्लव' का चौथा भाग भारत के बौद्धिक इतिहास की प्रस्तावना उकेरता है—एक ऐसी पृष्ठभूमि जो आजादी से लेकर अबतक हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित-पोषित करता आई है।</p> <p>इन लेखों में यशपाल एक दुस्साहसी संपादक के रूप में निखरते हैं जो अपनी लेखनी में तटस्थ पत्रकारिता, तथ्यपरक विवेचना और साहित्यिक स्वायत्तता की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है। शैली और भाषा का एक ऐसा नमूना जो आज के दौर में बेहद प्रासंगिक है। यह कहना उचित होगा कि यशपाल का साहित्य और उनकी पत्रकारिता, दोनों क्रांतिकारी संघर्ष की बौद्धिक उपज हैं। और एक दूसरे के पूरक भी हैं। इसलिए यह किताब हिंदी साहित्य और भारतीय इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए अनिवार्य है।
Book Details
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ISBN9789393603074
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Pages356
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Avg Reading Time12 hrs
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Age18-100 yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: Tarot is a divination tool that not only shows the current situation of the person concerned but also gives an idea of what steps should be taken. This clarity is obtained through the pictorial presentation of the cards. Once the cards are held in the hands and are concentrated upon, the answers appear automatically in the cards. Through this book one can quickly and easily learn the meanings of the cards along with a few spreads that would help in day to day readings. The tarot cards are 56 in number and for ease are divided into 4 suits namely � Wands, Cups, Swords and Coins. Seems Tough? Do not worry! For making it simple, a grid between numerology and the archetypes of the four suits has been provided which would help a novice to easily remember the meanings. Thus instead of 56 cards only 18 cards have to be understood. The tricks and shortcuts further simplify the cards and make it easy to memorize them. The main aim of writing this book is to equip one with a reference book to guide those interested in learning this mystical science. Easy keywords have been given to memorize the cards, and short descriptions provided for reference.
Kashmir : Itihas Aur Parampara
- Author Name:
Kumar Nirmalendu
- Book Type:

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Description:
'नीलमत पुराण' में कहा गया है कि कश्मीर स्वाध्याय एवं ध्यान में मग्न रहनेवाले और निरन्तर यज्ञ करनेवालों की भूमि रही है। यह हिमालय-पर्वतमाला की गोद में बसा एक सुरम्य प्रदेश है। लेकिन अपनी दुर्गम भौगोलिकता के कारण यह बाह्य-जगत् की पहुँच से दूर रहा है।
प्राचीन काल में कश्मीर प्रदेश गन्धार जनपद के अन्तर्गत आता था। सातवीं शताब्दी ई. के प्रारम्भ में यहाँ नाग जाति के कर्कोटक राजवंश का उदय हुआ; जिसके संस्थापक दुर्लभवर्द्धन के समय से कश्मीर का व्यवस्थित इतिहास मिलता है। उनके पौत्र ललितादित्य ने गुप्तोत्तर काल में एक साम्राज्य खड़ा किया; और प्रसिद्ध मार्तण्ड-मन्दिर का निर्माण भी कराया।
1339 ई. तक कश्मीर एक स्वशासित हिन्दू राज्य था। परन्तु मध्यकालीन हिन्दू राजाओं की दुर्बलता और उनके सामन्तों के षड्यन्त्रों के कारण वहाँ का वातावरण अराजक हो गया, जिसका लाभ उठाते हुए 1339 ई. में शाहमीर नामक एक मुसलमान ने कश्मीर के सिंहासन पर कब्जा कर लिया।
कल्हण ने 'राजतरंगिणी' में ललितादित्य से कहलवाया है कि ''इस देश को सुशासित तथा प्रगतिशील बनाये रखने के लिए अन्तर्कलह से बचना आवश्यक है।'' इसके कारण कश्मीर ने भारी कीमत चुकाई है। 'नीलमत पुराण' साक्षी है कि महर्षि कश्यप के समय से ही कश्मीर के स्थानीय लोगों ने विस्थापन की गहरी पीड़ा को महसूस किया है और आधुनिक काल में कश्मीरी हिन्दुओं को विस्थापन ने जितने दर्द दिये हैं, वह तो अकथनीय है।
Mughal Kaleen Bharat (Babar)
- Author Name:
Saiyad Athar Abbas Rizvi
- Book Type:

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Description:
यह ग्रन्थ बाबर के हिन्दुस्तान के इतिहास से सम्बन्धित है। इस कारण कि काबुल की विजय के उपरान्त उसका हिन्दुस्तान से सम्पर्क प्रारम्भ हो गया था। 910 हि. से अन्त तक के पूरे ‘बाबरनामा’ का अनुवाद भाग ‘अ’ में प्रस्तुत किया जा रहा है, किन्तु बाबर के व्यक्तित्व को समझने के लिए उसकी प्रारम्भिक आत्मकथा का भी ज्ञान परमावश्यक है; अत: भाग ‘द’ में इसका भी अनुवाद कर दिया गया है। केवल कुछ थोड़े से ऐसे पृष्ठों का जो पूर्ण रूप से उज्बेगों के इतिहास से सम्बन्धित थे, अनुवाद नहीं किया गया है। ऐसे अंशों के विषय में उचित स्थान पर उल्लेख कर दिया गया है। भाग ‘ब’ में ‘नफ़ायसुल मआसिर’, गुलबदन बेगम के ‘हुमायूँनामा’, ‘अकबरनामा’ तथा ‘तबक़ाते अकबरी’ के बाबर से सम्बन्धित सभी पृष्ठों का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। बाबर को समझने के लिए अफ़ग़ानों के दृष्टिकोण का ज्ञान भी परमावश्यक है; अत: भाग ‘स’ में अफ़ग़ानों के इतिहास से सम्बन्धित ‘वाक़ेआते मुश्ताक़ी’, ‘तारीख़े दाऊदी’ तथा ‘तारीख़े शाही’ का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। परिशिष्ट में ‘हबीबुस् सियर’, ‘तारीख़े रशीदी’, ‘तारीख़े अलफ़ी’ तथा ‘तारीख़े सिन्ध’ के आवश्यक उद्धरणों का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। प्रोफ़ेसर रश ब्रुक विलियम्स द्वारा प्रसिद्धि-प्राप्त ‘एहसनुस् सियर’ नामक ग्रन्थ का मिथ्या-खंडन भी परिशिष्ट ही में किया गया है।
बाबर के इतिहास के लिए उसकी आत्मकथा हमारी जानकारी का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण साधन है। प्रस्तुत अनुवाद अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना द्वारा किए गए फ़ारसी भाषान्तर से किया गया है, किन्तु मूल तुर्की तथा मिसेज़ बेवरिज एवं ल्युकस किंग के अनुवादों से भी सहायता ली गई है। नाम तो सब के सब तुर्की ग्रन्थ से लिए गए हैं और उनके हिज्जे में तुर्की उच्चारण का ध्यान रखा गया है।
उम्मीद है कि यह ग्रन्थ शोधार्थियों और जिज्ञासु पाठकों के लिए उपयोगी साबित होगा।
Lohia Ke Sapno Ka Bharat : Bhartiya Samajwad Ki Ruprekha
- Author Name:
Ashok Pankaj
- Book Type:

- Description: भारत की आजादी के 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। संविधान के उच्च आदर्शों, मूल्यों तथा प्रगतिशील प्रावधानों के बावजूद समतामूलक समाज की स्थापना लक्ष्य से मीलों दूर है। नर-नारी की असमानता, जाति-बिरादरी की गैर-बराबरी, धार्मिक समूहों का आपसी द्वेष एवं कटुता, अमीर-गरीब की गहराती खाईं, शिक्षा, स्वास्थ्य, भुखमरी एवं बेरोजगारी की समस्या बनी हुई है। नौकरशाही राज्य एवं जनता के द्वारा चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों का सामन्तवादी एवं राजशाही सोच, तौर-तरीका एवं व्यवहार बना हुआ है। संविधान के 73वें एवं 74वें संशोधनों के बावजूद भी लोकतंत्र का चौथा खम्भा, पंचायती राज, एक नकली टाँग की तरह लटका दिया गया मालूम पड़ता है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में विकास की गति तेज हुई है, लेकिन किसानों, मजदूरों, एवं औद्योगिक श्रमिकों को उसका समुचित लाभ नहीं मिला है। सामाजिक असमानता के छुआछूत जैसे अभिशाप तो मिट रहे हैं, लेकिन आर्थिक असमानता एक नये जातिवाद को पैदा कर रही है, जिससे लोकतंत्र को सचेत रहने की आवश्यकता है। चुनावों में धन का प्रभाव तथा तदनुसार राजनीतिक दलों की पूँजीपतियों पर चुनावी खर्च के लिए निर्भरता लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं है। एक प्रकार से, लोकतंत्र की कोख में राजनीतिक-आर्थिक कुलीनतंत्र का भ्रूण विकसित हो रहा है जिसके लोहिया जन्मजात विरोधी थे।
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