Samachar Evam Praroop Lekhan
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Author:
Dinesh Kumar Gupta, Ramprakash, Ramprakash 'Prakash'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Media₹
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इस पुस्तक के उद्देश्य और स्वरूप को लेकर लेखकीय टिप्पणी इस प्रकार है—“प्रशासनिक, व्यावसायिक एवं कार्यालयी स्तर पर हिन्दी प्रयोग के प्रयास विभिन्न स्तरों पर किए जा रहे हैं, किन्तु उनमें विभिन्न कारणों से एकरूपता और एकसूत्रता का अभाव है। प्रस्तुत पुस्तक में इन अभावों के आधारभूत कारणों को तलाशते हुए, प्रायोगिक स्तर पर हिन्दी के व्यावहारिक स्वरूप का एक सुस्पष्ट प्रतिमान सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।” निश्चय ही लेखक–द्वय के इस प्रयास को यहाँ सार्थक हुआ देखा जा सकता है। उन्होंने इस पुस्तक को तीन अध्यायों में विभाजित कर विषय–विवेचन को एक सुसंगति प्रदान की है, ख़ासकर ‘समाचार–लेखन’ और ‘प्रारूप– लेखन’ नामक अध्यायों में। इनके अतिरिक्त तीसरे अध्याय ‘अशुद्धि–शोधन’ में अशुद्धि के विभिन्न स्तरों का गम्भीरतापूर्वक विवेचन किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने संक्षिप्त कलेवर में भी अपने विषय की यह एक संग्रहणीय पुस्तक है।
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इस पुस्तक के उद्देश्य और स्वरूप को लेकर लेखकीय टिप्पणी इस प्रकार है—“प्रशासनिक, व्यावसायिक एवं कार्यालयी स्तर पर हिन्दी प्रयोग के प्रयास विभिन्न स्तरों पर किए जा रहे हैं, किन्तु उनमें विभिन्न कारणों से एकरूपता और एकसूत्रता का अभाव है। प्रस्तुत पुस्तक में इन अभावों के आधारभूत कारणों को तलाशते हुए, प्रायोगिक स्तर पर हिन्दी के व्यावहारिक स्वरूप का एक सुस्पष्ट प्रतिमान सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।”
निश्चय ही लेखक–द्वय के इस प्रयास को यहाँ सार्थक हुआ देखा जा सकता है। उन्होंने इस पुस्तक को तीन अध्यायों में विभाजित कर विषय–विवेचन को एक सुसंगति प्रदान की है, ख़ासकर ‘समाचार–लेखन’ और ‘प्रारूप– लेखन’ नामक अध्यायों में। इनके अतिरिक्त तीसरे अध्याय ‘अशुद्धि–शोधन’ में अशुद्धि के विभिन्न स्तरों का गम्भीरतापूर्वक विवेचन किया है।
कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने संक्षिप्त कलेवर में भी अपने विषय की यह एक संग्रहणीय पुस्तक है।
Book Details
-
ISBN9788171191604
-
Pages88
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Prabhash Joshi +1
- Book Type:

- Description:
प्रभाष जोशी ने ‘जीने के बहाने’ में अपने समय के चर्चित व्यक्तित्वों के चरित्र और विचार का दो टूक विश्लेषण किया है। जिन व्यक्तित्वों ने इतिहास की धारा को सही दिशा में ले जाने की कोशिश की है, प्रभाष जोशी ने ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के अवदान का रेखांकन किया है। कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने अपनी वैचारिक विसंगतियों से इतिहास के प्रवाह में गतिरोध पैदा करने का प्रयास किया है, प्रभाष जी ने उनकी ख़बर ली है।
प्रभाष जोशी लिखते हैं : “ये व्यक्तिचित्र नहीं हैं। जीवनियाँ भी नहीं हैं, और तो और, संस्मरण भी नहीं हैं। जैसे गांधी के साथ मेरे क्या संस्मरण हो सकते हैं। दिल्ली में जब नाथूराम गोडसे ने उनको गोली मारी तो मैं इन्दौर में दस बरस का था। माताराम कहती हैं कि उन्होंने मुझे गांधी जी को दिखाया था। तब वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने इन्दौर आए थे। लेकिन तब मैं साल-भर का था और कहना कि उन्हें मैंने देखा, गप्प लगाना होगा। लेकिन इस पुस्तक की शुरुआत ही गांधी पर लिखे लेख से होती है। और तीन निबन्ध हैं जिन पर लिखा है, वे सार्वजनिक जीवन के लोग हैं।...जिन-जिन रूपों और तरीक़ों से कोई हमारे जीवन में जा सकता है, उन्हीं रूपों और तरीक़ों, में मैंने उनको जिया और याद रखा है। ये बहाने हैं जिनके कारण मैं जीता हूँ।”
पुस्तक में जिन व्यक्तित्वों पर प्रभाष जी ने लिखा है, वे जीवन और समाज के विविध क्षेत्रों के लोग हैं। उनमें कुछ अन्य प्रमुख नाम हैं : विनोबा, जेपी, ज्ञानी जैलसिंह, के.आर. नारायणन, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, सोनिया गांधी, रामनाथ गोयनका, राहुल बारपुते, एस. मुलगावकर, रामविलास शर्मा, त्रिलोचन, गिरिजा कुमार माथुर, धर्मवीर भारती, हरिशंकर परसाई, वी.एस. नॉयपाल, अरुंधती राय, सत्यजित राय, लता मंगेशकर, जे.आर.डी. टाटा, राधाकृष्ण, सिद्धराज ढड्ढा, सी.के. नायडू, गावसकर, तेंदुलकर, नवरातिलोवा आदि।
Media Ka Underworld
- Author Name:
Dilip Mandal
- Book Type:

- Description:
पेड न्यूज़ वर्तमान मीडिया विमर्श का सबसे चर्चित विषय है। ख़बरें पहले भी बिकती थीं। सरकारों और नेताओं से लेकर कम्पनियाँ और फ़िल्में बनानेवाले तक ख़बरें ख़रीदते रहे हैं। न्यूज़ के स्पेस में विज्ञापन की घुसपैठ नई नहीं है। बदलाव सिर्फ़ इतना है कि पहले खेल पर्दे के पीछे था, अब मीडिया अपना माल दुकान खोलकर और रेट कार्ड लगाकर बेचने लगा है। विलेन के रूप में किसी ख़ास मीडिया हाउस को चिह्नित करना काफ़ी नहीं है। सारा कॉरपोरेट मीडिया ही बाज़ार में बिकने के लिए खड़ा है। समाचार को लेकर जिस पवित्रता, निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और ईमानदारी की शास्त्रीय कल्पना है, उसका विखंडन हम सब अपनी आँखों के सामने देख रहे हैं। मीडिया छवि बनाता और बिगाड़ता है। इस ताक़त के बावजूद भारतीय मीडिया अपनी ही छवि का नाश होना नहीं रोक सका। देखते–ही–देखते पत्रकार आदरणीय नहीं रहे। लोकतंत्र का चैथा खम्भा आज धूल–धूसरित गिरा पड़ा है। मीडिया की बन्द मुट्ठी क्या खुली, एक मूर्ति टूटकर बिखर गई। यह पुस्तक इसी विखंडन को दर्ज करने की कोशिश है।
देश–काल की बड़ी समस्याओं पर लिखी गई पुस्तकों में आम तौर पर समाधान की भी बात होती है। समस्या का विश्लेषण करने के साथ ही अक्सर यह भी बताया जाता है कि समाधान का रास्ता किस ओर है। इस मायने में यह पुस्तक आपको निराश करेगी। हाल के वर्षों में जनसंचार के क्षेत्र के सबसे विवादित और चर्चित विषय पेड न्यूज़ को केन्द्र में रखकर लिखी गई यह पुस्तक समस्या का कोई समान नहीं सुझाती ।
पुस्तक यह समझने की कोशिश भर है कि पेड न्यूज़ ख़ुद एक बीमारी है, या फिर किसी बड़ी और गम्भीर बीमारी का लक्षण मात्र। पुस्तक में मीडिया अर्थशास्त्र और व्यवसाय की समीक्षा के ज़रिए यह बताने की कोशिश की गई है कि अपनी वर्तमान संरचना की वजह से मीडिया के लिए ख़बरें बेचना अस्वाभाविक नहीं है। मीडिया के लिए कमाई के मुक़ाबले छवि की क़ुर्बानी कोई बड़ी क़ीमत नहीं है।
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