Yashpal Ka Viplav
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“स्वाधीनता आन्दोलन के अन्तिम दशक में ‘विप्लव’ का प्रकाशन हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया में एक विस्फोट सरीखा था। यशपाल ने अपने क्रान्तिकारी दौर की वैचारिक सम्पदा को इस पत्रिका के मंच से व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भ प्रदान किए। ‘विप्लव’ की विशिष्टता एक आन्दोलन सरीखी थी! ब्रिटिश साम्राज्यवाद को नेस्तनाबूद किए जाने के सारे प्रयत्नों के साथ सहभागिता दर्ज करते हुए भी यशपाल ने ‘विप्लव’ को स्वाधीनता आन्दोलन के वर्चस्वशाली नेतृत्व के प्रतिपक्षी की भूमिका में ढाल रखा था। ‘विप्लव’ के सम्पादकीयों का स्वरूप प्रायः राजनीतिक व सामाजिक हुआ करता था। ‘विप्लव’ को समय-समय पर ब्रिटिश शासन के कोप का शिकार होना पड़ा। दरअसल ‘विप्लव’ के सम्पादकीय अग्रलेखों के माध्यम से स्वाधीनता-संग्राम की उस दौर की उन हलचलों और बहसों का भी पता चलता है जो प्रायः मुख्यधारा की इतिहास में अनुपस्थित हैं। कहना न होगा कि यशपाल एक व्यक्ति नहीं, आन्दोलन थे और ‘विप्लव’ इस आन्दोलन का उद्घोष।”
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“स्वाधीनता आन्दोलन के अन्तिम दशक में ‘विप्लव’ का प्रकाशन हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया में एक विस्फोट सरीखा था। यशपाल ने अपने क्रान्तिकारी दौर की वैचारिक सम्पदा को इस पत्रिका के मंच से व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भ प्रदान किए। ‘विप्लव’ की विशिष्टता एक आन्दोलन सरीखी थी! ब्रिटिश साम्राज्यवाद को नेस्तनाबूद किए जाने के सारे प्रयत्नों के साथ सहभागिता दर्ज करते हुए भी यशपाल ने ‘विप्लव’ को स्वाधीनता आन्दोलन के वर्चस्वशाली नेतृत्व के प्रतिपक्षी की भूमिका में ढाल रखा था। ‘विप्लव’ के सम्पादकीयों का स्वरूप प्रायः राजनीतिक व सामाजिक हुआ करता था। ‘विप्लव’ को समय-समय पर ब्रिटिश शासन के कोप का शिकार होना पड़ा। दरअसल ‘विप्लव’ के सम्पादकीय अग्रलेखों के माध्यम से स्वाधीनता-संग्राम की उस दौर की उन हलचलों और बहसों का भी पता चलता है जो प्रायः मुख्यधारा की इतिहास में अनुपस्थित हैं। कहना न होगा कि यशपाल एक व्यक्ति नहीं, आन्दोलन थे और ‘विप्लव’ इस आन्दोलन का उद्घोष।”
Book Details
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ISBN9788180318528
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Pages280
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Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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आजकल मीडिया में क्रिकेट इस क़दर छाया हुआ है कि वह खेल का पर्याय-सा बन गया है। सौभाग्यवश इस देश के कुछ हिस्सों में, कुछ व्यक्तियों में, और दुनिया के बहुत से देशों में दूसरे खेलों की लोकप्रियता खेल के व्यापक फलक को सही ढंग से उजागर करती है। खेल पत्रकारिता के लिए आप में एक अच्छे पत्रकार के सभी गुण होने चाहिए, परन्तु उसके अलावा खेल के क्षेत्र की विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए कुछ और बातें भी ज़रूरी हैं। खेल पत्रकारिता केवल वर्णनात्मक नहीं है, उसमें विश्लेषण और मौलिकता के लिए भी एक बड़ा दायरा उपलब्ध रहता है। खेल अपने आप में तो दिलचस्प होता ही है, परन्तु समाचार-पत्रों में उसकी प्रस्तुति उसे और अधिक दिलचस्प बना देती है। खेल के रस और आनन्द को शब्दों के माध्यम से ऐसे पेश करना जिसमें खेल देखने से अधिक उसका समाचार पढ़ने में रस और आनन्द आए सफल खेल पत्रकारिता का मापदंड है।
अच्छी खेल पत्रकारिता के लिए ज़रूरी ज्ञान और कौशल देनेवाली यह पुस्तक उन सबके लिए उपयोगी है जो खेल के निरन्तर लोकप्रिय हो रहे क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।
Maine Danga Dekha
- Author Name:
Manoj Mishra
- Book Type:

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बीसवीं सदी के आख़िरी वर्ष भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में साम्प्रदायिकता और जाति के उभार के वर्ष भी रहे हैं। समय के इस मोड़ पर हमने अचानक पाया कि जैसे आधुनिकता और प्रगतिशीलता के मूल्य सहसा हमारा साथ छोड़ गए और हम विकल होकर धर्मों और जातियों की शरण ढूँढ़ने लगे। इसी प्रक्रिया में हमने असहिष्णुता और हिंसा के अनेक रूप भी देखे।
यह पुस्तक 1989 से 1996 तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों, क़स्बों और गाँवों में हुए साम्प्रदायिक और जातीय दंगों की रिपोर्टिंग का संकलन है। ये उस दौर के दंगे हैं जब मंडल और कमंडल (अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण और राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद) आन्दोलन अपने चरम पर थे। इसके परिणामस्वरूप पहले साम्प्रदायिक दंगे हुए, फिर जातीय दंगे।
यह पुस्तक पत्रकारिता में रुचि रखनेवाले सामान्य पाठकों और पत्रकारिता के छात्रों के लिए भी उपयोगी है, क्योंकि लेखक ने दंगों की रिपोर्टिंग कैसे की जाती है, इसका वर्णन इसमें किया है।
Jeene Ke Bahaane
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

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प्रभाष जोशी ने ‘जीने के बहाने’ में अपने समय के चर्चित व्यक्तित्वों के चरित्र और विचार का दो टूक विश्लेषण किया है। जिन व्यक्तित्वों ने इतिहास की धारा को सही दिशा में ले जाने की कोशिश की है, प्रभाष जोशी ने ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के अवदान का रेखांकन किया है। कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने अपनी वैचारिक विसंगतियों से इतिहास के प्रवाह में गतिरोध पैदा करने का प्रयास किया है, प्रभाष जी ने उनकी ख़बर ली है।
प्रभाष जोशी लिखते हैं : “ये व्यक्तिचित्र नहीं हैं। जीवनियाँ भी नहीं हैं, और तो और, संस्मरण भी नहीं हैं। जैसे गांधी के साथ मेरे क्या संस्मरण हो सकते हैं। दिल्ली में जब नाथूराम गोडसे ने उनको गोली मारी तो मैं इन्दौर में दस बरस का था। माताराम कहती हैं कि उन्होंने मुझे गांधी जी को दिखाया था। तब वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने इन्दौर आए थे। लेकिन तब मैं साल-भर का था और कहना कि उन्हें मैंने देखा, गप्प लगाना होगा। लेकिन इस पुस्तक की शुरुआत ही गांधी पर लिखे लेख से होती है। और तीन निबन्ध हैं जिन पर लिखा है, वे सार्वजनिक जीवन के लोग हैं।...जिन-जिन रूपों और तरीक़ों से कोई हमारे जीवन में जा सकता है, उन्हीं रूपों और तरीक़ों, में मैंने उनको जिया और याद रखा है। ये बहाने हैं जिनके कारण मैं जीता हूँ।”
पुस्तक में जिन व्यक्तित्वों पर प्रभाष जी ने लिखा है, वे जीवन और समाज के विविध क्षेत्रों के लोग हैं। उनमें कुछ अन्य प्रमुख नाम हैं : विनोबा, जेपी, ज्ञानी जैलसिंह, के.आर. नारायणन, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, सोनिया गांधी, रामनाथ गोयनका, राहुल बारपुते, एस. मुलगावकर, रामविलास शर्मा, त्रिलोचन, गिरिजा कुमार माथुर, धर्मवीर भारती, हरिशंकर परसाई, वी.एस. नॉयपाल, अरुंधती राय, सत्यजित राय, लता मंगेशकर, जे.आर.डी. टाटा, राधाकृष्ण, सिद्धराज ढड्ढा, सी.के. नायडू, गावसकर, तेंदुलकर, नवरातिलोवा आदि।
Prabhash Parv
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

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‘प्रभाष पर्व' पुस्तक प्रभाष जोशी पर अब तक लिखे गए महत्त्वपूर्ण लेखों का प्रतिनिधि संग्रह है। इसमें उनके समकालीन और बाद की पीढ़ी के पत्रकारों, लेखकों तथा नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करनेवाले लोगों ने उनका मूल्यांकन किया है। उनको लेकर संस्मरण लिखे हैं।
इन लेखों में अपने समय और समाज के साथ प्रभाष जोशी की रचनात्मक रिश्ता विस्तार से परिभाषित हुआ है। समकालीन राजनैतिक और सामाजिक समस्याओं को लेकर उनके विचार और सक्रियता को नए सिरे से समझने की कोशिश की गई है। इसलिए यह पुस्तक प्रभाष जोशी की ज़िन्दगी के साथ ही उनके समय का भी दस्तावेज़ है। पुस्तक के अध्याय हैं : ‘धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रֺ’, ‘पत्रकारिता की नई ज़मीन’, ‘जनसत्ता की दुनिया’, ‘क़रीब से प्रभाष जोशी’ तथा ‘प्रभाष जोशी घर में’। इन्हीं के तहत विभिन्न कोणों से प्रभाष जी की भीतरी-बाहरी दुनिया को बारीकी से समझने की कोशिश की गई है।
पुस्तक के अन्त में प्रभाष जी के कुछ व्याख्यान भी दिए गए हैं जो सुव्यवस्थित ढंग से कहीं प्रकाशित नहीं हुए थे। ‘नई दुनिया’ में 50 साल पहले प्रकाशित उनकी दो कविताएँ और कहानियाँ भी दी गई हैं। इन कहानियों में प्रभाष जोशी के श्रेष्ठ कथाकार व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। पत्रकरिता की व्यस्तताओं के बीच वे ज़्यादा कहानियाँ लिख नहीं पाए। उनकी कविताओं में नैराश्य के साथ जीवन संकल्प है। गीतात्मकता की अनुगूँज है।
यह पुस्तक पत्रकार प्रभाष जोशी की समाज-सम्बन्ध, मानवीय और संवेदनात्मक दुनिया में प्रवेश का पारपत्र है।
Patrakarita : Naya Daur, Naye Pratiman
- Author Name:
Santosh Bhartiya
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संतोष भारतीय ने महत्त्वपूर्ण पत्रकारिता की है। वे कुशल संवाददाता रहे हैं और ‘चौथी दुनिया’ से सम्पादन की निपुणता भी दिखा चुके हैं। मगर फ़ैज़ के भाव में ‘कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया’ की उधेड़बुन के चलते शायद वे कहीं ठहर-से गए। राजनीति की तरफ़ वे ज़्यादा न झुकते तो और सार्थक काम करते। बहरहाल, उनकी किताब ‘पत्रकारिता : नया दौर, नए प्रतिमान’ सिरे से पढ़ने के क़ाबिल है। इसमें उनके ‘रविवार’ और ‘चौथी दुनिया’ के दिनों के संस्मरण हैं, अपने रपट-रिपोर्ताज हैं और साथ में सम्पादक-उपसम्पादक और संवाददाता आदि की ज़िम्मेवारियों का विवेचन है। इस तरह एक मायने में किताब पत्रकारिता की पाठ्य-पुस्तक बन गई है। साफ़गोई और बेबाक टिप्पणियों के लिए यह किताब अलग से जानी जाएगी। हालाँकि उनके कुछ निष्कर्ष भावुकता-भरे हैं, कुछ से आप शायद सहमत न हों। पर वे बहुत दिलचस्प हैं और हमें हिन्दी पत्रकारिता के एक अहम दौर की घटनाओं पर फिर से सोचने को उकसाते हैं।
—ओम थानवी
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