Yanosh Bahadur
(0)
Author:
Sándor PetőfiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
995
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2023 में शान्दोर पैतोफ़ी की 200वीं जयंती मनाने की विश्वव्यापी तैयारी हो रही है। उनकी 43 कविताओं के संग्रह स्वाधीनता, प्यार की कविताओं पर प्रसिद्ध कवि यानोश हाय और संगीतज्ञ तॉमॉश रोज़ ने संगीतबद्ध प्रस्तुतियाँ दीं और इन कविताओं ने श्रोताओं को ख़ूब प्रभावित किया। जैसा कि मारिया नेज्यैशी लिखती हैं, इस काव्यात्मक कथा यानोश बहादुर का संग-साथ उन्हें तब से प्राप्त है जब वे 5-6 साल की थीं और पढ़ना-लिखना भी नहीं जानती थीं। यानोश हाय लिखते हैं कि यानोश बहादुर के रचनाकार शान्दोर पैतोफ़ी उन आरम्भिक चार-पाँच शब्दों में से एक हैं, जिन्हें उनके देश के बच्चे पहली बार अपनी भाषा सीखते समय ही याद कर लेते हैं। यानोश बहादुर किस विधा की रचना है? 1845 में इसके प्रकाशन के बाद से इसे विभिन्न खाँचों में रखने की कोशिश होती रही है। यह लोकगीत है या महाकाव्य है? कुछ लोगों ने इसे हल्की-फुल्की ‘कहानी’ भी कहा है। लेकिन इसने एक अनाथ लघु मानव के संघर्ष की, उत्कर्ष की, साहसिक यात्रा की, और शायद सबसे अधिक एक अटूट प्रेम की अनोखी कहानी दी है। यहाँ तक कि यह भी कहा जाता है कि इसे पढ़कर हर नौजवान यानोश बहादुर, और युवती इलुश्का बनना चाहती है।
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2023 में शान्दोर पैतोफ़ी की 200वीं जयंती मनाने की विश्वव्यापी तैयारी हो रही है। उनकी 43 कविताओं के संग्रह स्वाधीनता, प्यार की कविताओं पर प्रसिद्ध कवि यानोश हाय और संगीतज्ञ तॉमॉश रोज़ ने संगीतबद्ध प्रस्तुतियाँ दीं और इन कविताओं ने श्रोताओं को ख़ूब प्रभावित किया।
जैसा कि मारिया नेज्यैशी लिखती हैं, इस काव्यात्मक कथा यानोश बहादुर का संग-साथ उन्हें तब से प्राप्त है जब वे 5-6 साल की थीं और पढ़ना-लिखना भी नहीं जानती थीं।
यानोश हाय लिखते हैं कि यानोश बहादुर के रचनाकार शान्दोर पैतोफ़ी उन आरम्भिक चार-पाँच शब्दों में से एक हैं, जिन्हें उनके देश के बच्चे पहली बार अपनी भाषा सीखते समय ही याद कर लेते हैं।
यानोश बहादुर किस विधा की रचना है? 1845 में इसके प्रकाशन के बाद से इसे विभिन्न खाँचों में रखने की कोशिश होती रही है। यह लोकगीत है या महाकाव्य है? कुछ लोगों ने इसे हल्की-फुल्की ‘कहानी’ भी कहा है। लेकिन इसने एक अनाथ लघु मानव के संघर्ष की, उत्कर्ष की, साहसिक यात्रा की, और शायद सबसे अधिक एक अटूट प्रेम की अनोखी कहानी दी है। यहाँ तक कि यह भी कहा जाता है कि इसे पढ़कर हर नौजवान यानोश बहादुर, और युवती इलुश्का बनना चाहती है।
Book Details
-
ISBN9789395737210
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हमारी ही चेतना में संचित है हमारा काल-आयाम। हम हैं, क्योंकि धरती है, हवा है, धूप है, जल है और यह आकाश। इसीलिए हम जीवित हैं।
भीतर और बाहर—सब कहीं—सब कुछ को अपने में सँजोए। विलीन हो जाने को पल-पल अनन्त में...।
पुरानी और नई सदी के दो-दो छोरों को समेटता ‘समय सरगम’ जिए हुए अनुभव की तटस्थता और सामाजिक परिवर्तन से उभरा, उपजा एक अनूठा उपन्यास है; और फिर भारत की बुज़ुर्ग पीढ़ियों का एक ही साथ नया-पुराना आख्यान और प्रत्याख्यान। संयुक्त परिवारों के भीतर और बाहर वरिष्ठ नागरिकों के प्रति उपेक्षा और उदासीनता ‘समय सरगम’ की बन्दिश में अन्तर्निहित है। आज के बदलते भारतीय परिदृश्य में यह उपन्यास व्यक्ति की विश्वव्यापी स्वाधीनता, उसके वैचारिक विस्तार और कुछ नए संस्कार-सन्दर्भों को प्रतिध्वनित करता है। दूसरे शब्दों में, इससे उत्तर-आधुनिक काल की सम्भावनाओं को भी चीन्हा जा सकता है; और उन मूल्यों को भी जो मानवीय विकास को सार्थकता प्रदान करते हैं। ईशान और आरण्या जैसे बुज़ुर्ग परस्परविरोधी विश्वास और निजी आस्थाओं के बावजूद साथ होने के लिए जिस पर्यावरण की रचना करते हैं, वहाँ न पारिवारिक या सामाजिक उदासीनता है और न किसी प्रकार का मानसिक उत्पीड़न।
कृष्णा सोबती की प्रख्यात क़लम ने इस कथाकृति में अपने समय और समाज को जिस आन्तरिकता से रचा है, वह वर्तमान सामाजिक यथार्थ को तात्त्विक ऊँचाइयों तक ले जाता है, और ऐसा करते हुए वे जिस भविष्य की परिकल्पना या उसका संकेत करती हैं, उसी में निहित है एक उद्भास्वर आलोक-पुंज।
An Angel : Once In Lifetime
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Soumya Srikant Pandhy
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- Description: An Angel By Soumya Srikant Pandhy
Asha Kalindi Aur Rambha
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Bhairavprasad Gupt
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Description:
‘आशा कालिन्दी और रम्भा’ नामक उपन्यासों की त्रयी क्रमशः सामन्तवादी, पूँजीवादी और गांधीवादी व्यवस्था में स्त्री की स्थिति पर एक टिप्पणी है।
‘आशा’ उपन्यास की नायिका स्वयं अपनी कहानी सुनाती है। सेठ कालिन्दी प्रसाद आशा अर्थात् जानकी बाई को अपनी रखैल बनाना चाहता है। निर्धन दुकानदार बाप की बेटी होने के कारण ही नवाब के हरम में पहुँचा दी जाती है और बाद में वहाँ से मुक्त होने पर जानकी बाई के रूप में नाचने-गाने का धन्धा करने लगती है। आशा नवाब और सेठ कालिन्दी प्रसाद दोनों के लिए ही स्त्री भोग की सामग्री है।
अगली कड़ी में सेठ कालिन्दी अपनी कहानी कहता है। उसका सबसे बड़ा कष्ट यह है कि रुपए के लालच में उसका पिता उसका विवाह बड़े घर की फूहड़ लड़की से कर देता है। पैसा उसके पास कितना ही हो, श्वसुर की सहायता से दूसरे विश्वयुद्ध में वह और भी कमाई करता है। लेकिन उसका पारिवारिक जीवन नरक बना हुआ है। अंग्रेज़ों और कांग्रेस दोनों के बीच सन्तुलन साधकर वह व्यापार में ख़ूब उन्नति करता है। असफल दाम्पत्य जीवन के कारण वह एक वेश्या से सम्बन्ध बनाता है और उसी से उत्पन्न बेटी का नाम वह रम्भा रखता है।
रम्भा, इसकी नियति भी बहुत भिन्न नहीं है। अलग कोठी में पाली-पोसी जाने के बावजूद उसे सोलह साल की उम्र में चालीस साल के सेठ सोनेलाल की रखैल बनने को बाध्य होना पड़ता है, क्योंकि उसके पिता सेठ कालिंदी चरण में यह साहस नहीं है कि समाज में यह कह सके कि वह उसकी बेटी है। सेठ सोनेलाल की रखैल बन जाने के बाद भी रम्भा अपने विकास के लिए संघर्ष करती है। पढ़कर एम.ए. करने के दौरान आनन्द के सम्पर्क में आती है। सोनेलाल का गर्भ धारण करके भी वह उससे घृणा करती है। आनन्द के सम्पर्क में आकर वह जनसेवा की ओर प्रवृत्त होती है और एक स्कूल चलाने लगती है।
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