Gayasur Sandhan
(0)
Author:
Vikas Kumar JhaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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विश्व आस्था के जुड़वाँ नगर गया-बोधगया पर केन्द्रित 'गयासुर संधान’ कथ्य और शैली में युगान्तरकारी ध्वनि का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें कल्पना, इतिहास, लोककथा, दन्तकथा, मिथक और यथार्थ का अद्भुत रोमांचक मिश्रण है। रहस्यमय और संक्रामक!</p> <p>'गयासुर संधान’ की कथा बताती है कि अनैतिक कामनाएँ-एषणाएँ अन्तत: कैसे भस्म होती हैं। गयासुर के शरीर पर बसे होने की मान्यतावाली इस प्राचीन नगरी में सदैव से यह अटल आस्था है कि कामनामुक्त व्यक्ति के लिए ही यहाँ आश्रय है। अनर्गल कामना का परिताप, बन्धन और व्यसन इस जुड़वाँ नगरी को सहन नहीं। गया के कण-कण में इहकाल-परकाल और जन्म-जन्मान्तर का महाशून्य अपने परम औघड़ भाव में विन्यस्त है।</p> <p>भारत की पौराणिक आख्यायिका, परम्परा, संस्कार, दर्शन और चिन्तन के अर्क से निर्मित 'गयासुर संधान’ एक ऐसी गहन कृति है, जो स्वदेशानुराग की महागाथा के संग-संग मनुष्य के लिए रोमांचक सत्यार्थ प्रकाश है।</p> <p>
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विश्व आस्था के जुड़वाँ नगर गया-बोधगया पर केन्द्रित 'गयासुर संधान’ कथ्य और शैली में युगान्तरकारी ध्वनि का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें कल्पना, इतिहास, लोककथा, दन्तकथा, मिथक और यथार्थ का अद्भुत रोमांचक मिश्रण है। रहस्यमय और संक्रामक!</p>
<p>'गयासुर संधान’ की कथा बताती है कि अनैतिक कामनाएँ-एषणाएँ अन्तत: कैसे भस्म होती हैं। गयासुर के शरीर पर बसे होने की मान्यतावाली इस प्राचीन नगरी में सदैव से यह अटल आस्था है कि कामनामुक्त व्यक्ति के लिए ही यहाँ आश्रय है। अनर्गल कामना का परिताप, बन्धन और व्यसन इस जुड़वाँ नगरी को सहन नहीं। गया के कण-कण में इहकाल-परकाल और जन्म-जन्मान्तर का महाशून्य अपने परम औघड़ भाव में विन्यस्त है।</p>
<p>भारत की पौराणिक आख्यायिका, परम्परा, संस्कार, दर्शन और चिन्तन के अर्क से निर्मित 'गयासुर संधान’ एक ऐसी गहन कृति है, जो स्वदेशानुराग की महागाथा के संग-संग मनुष्य के लिए रोमांचक सत्यार्थ प्रकाश है।</p>
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Book Details
-
ISBN9789387462144
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अपने समय के चर्चित पत्रकार और लेखक अखिलेश मिश्र के इस पहले उपन्यास में आज़ादी से पूर्व के उत्तर भारत के ग्रामीण परिवेश के सौहार्दपूर्ण सामाजिक जीवन का जीवन्त चित्रण हुआ है।
बटोहियों की बतकही के अद् भुत कथारस से आप्लावित यह आख्यान ग्रामीण जीवन के कई अनछुए पहलुओं से साक्षात्कार कराता है।
इसमें एक बच्चे के युवा होने तक के जीवनानुभव की कथा के माध्यम से देश-काल के हरेक छोटे-बड़े विडम्बनापूर्ण क्रिया-व्यवहारों, रूढ़ियों और अन्धविश्वासों पर मारक व्यंग्य किया गया है। पूरा उपन्यास इस विद्रोही ‘जनमदागी’ नायक की शरारतों (और शरारतें भी कैसी-कैसी—नुसरत की नानी की अँगनई में बैठकर चोटइया काट डालने, छुआछूत नहीं मानने की ज़िद में नीच जाति से रोटी लेकर खाने, उसी की गगरी से पानी पीने, गुलेल से निशाना साधने, तालाब में तैरने आदि की पूरी कथा) से भरा पड़ा है। यही विद्रोही मानसिकता आगे चलकर धार्मिक कर्मकांडों और अंग्रेज़ों की सत्ता के विरुद्ध संघर्ष में तब्दील हो जाती है।
इसमें तत्कालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति-नियति का जिस संवेदनापूर्ण ढंग से चित्रण हुआ है और उस स्थिति के ख़िलाफ़ लेखकीय व्यंग्य की त्वरा जिस रूप में उभरकर सामने आई है, वह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस उपन्यास को विरल कथ्य के साथ-साथ शैली लाघव और कहन की भंगिमा के लिए भी लम्बे समय तक याद रखा जाएगा।
Peedhiyan
- Author Name:
Neel Padamnabhan
- Book Type:

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Description:
तमिल साहित्य की पहली आंचलिक कृति के रूप में समादृत प्रस्तुत उपन्यास ‘पीढ़ियाँ’ (तमिल : तलैमुरैगळ) को मास्टर पीसेज़ ऑफ़ इंडियन लिटरेचर के यशस्वी सम्पादक डॉ. के.एम. जॉर्ज ने भारतीय साहित्य की उत्कृष्ट कृति के रूप में स्थान दिया है।
तमिल के श्रेष्ठ महाकाव्य ‘शिलप्पाधिकारम’ के रचयिता कवि इलंगो ने जिस श्रेष्ठि-कुल के सामान्य जन को काव्य के केन्द्र में रखा था, उसी कुल की एक शाखा कालान्तर में धुर दक्षिण की ओर संक्रमण कर गई और कन्याकुमारी ज़िले में इरणियल परिसर के सात गाँवों में बसकर एलूर चेट्टी कहलाई। आधुनिक तमिल साहित्य के जाने-माने हस्ताक्षर नील पद् मनाभन ने इसी चेट्टी-समुदाय के सम्पूर्ण जीवन को, वर्तमान युग में अपनी ही रूढ़ियों और अन्धविश्वासों के मकड़जाल में फँसकर अपनी अस्मिता बनाए रखने के लिए उसके द्वारा किए जा रहे जद्दोजहद को इस उपन्यास में उकेरा है। उपन्यास की ख़ासियत यह है कि एक समुदाय-विशेष के आस्था-विश्वास, जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत विविध संस्कार, रूढ़ियाँ, अन्धविश्वास और वर्जनाएँ, लोरी और शोकगीत सहित ग्राम्य गीत, कर्ण-परम्परा से चली आ रही दन्तकथाएँ आदि पात्रों की अपनी बोली में अविकल रूप से इसमें दर्ज हैं। इस कारण यह उपन्यास नृविज्ञानियों और समाज-भाषावैज्ञानिकों के लिए अमूल्य दस्तावेज़ का काम दे सकता है।
लगभग सत्तर साल की कालावधि में व्याप्त तीन पीढ़ियों के इतिवृत्त के केन्द्र में है दिरवी का परिवार, जो अपनी नेकनीयती और भोलेपन के कारण समाज के सबल वर्ग के स्वार्थपूर्ण हथकंडों का शिकार बनता है। अपनी बहन पर लगाए गए झूठे इल्जाम के ख़िलाफ़ यौवन की दहलीज़ पर क़दम रख रहे दिरवी को अकेले ही एक धर्मयुद्ध लड़ना पड़ता है और इस संघर्ष में वह कैसे कामयाब होता है, यही इस उपन्यास का केन्द्रबिन्दु है।
उपन्यास में यह भी दिखाया गया है कि अर्थहीन रूढ़ियों और परम्परागत विश्वासों की दुहाई देकर नारी को घर की चहारदीवारी के अन्दर बन्द रखने की मूढ़ता जिस समुदाय में प्रचलित हो, उसमें रातोंरात आमूल-चूल परिवर्तन लाना सम्भव नहीं है। अभी एक विशाल रणांगण में एक लम्बा युद्ध लड़ना शेष है। कल्पना की रंगीनी और अतिरंजनापूर्ण वर्णनों से सर्वथा अस्पृश्य होकर भी कोई कृति इतनी रोचक और मर्मस्पर्शी हो सकती है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है नील पद् मनाभन की ‘पीढ़ियाँ’।
50 Mahan Swatantrata Senani
- Author Name:
Rishi Raj
- Book Type:

- Description: "जिन लोगों ने देश को स्वाधीन कराने का स्वप्न देखा, इसकी कल्पना की और दृढ निश्चय कर अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया, उनका पुण्य स्मरण करना हमारा पुनीत कर्तव्य है। उनके बलिदान को आज की युवा पीढ़ी तक पहुँचाना हमारा परम धर्म है। जिस आजादी की हवा में हम साँस ले पा रहे हैं, अपने लिए, अपने घर-परिवार के लिए कुछ कर पा रहे हैं, इसमें कहीं-न-कहीं उन सभी के बलिदान की सुगंध है। इसलिए इन हुतात्माओं को कोटि-कोटि वंदन-अभिनंदन! शहीदों से जुडे़ स्थानों पर जाना, उनको समय-समय पर याद करना व उनको श्रद्धांजलि देना, यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होना चाहिए। आनेवाली पीढि़यों को अपने गौरवमयी अतीत व हमारे शूरवीरों के महान् जीवन से परिचय करवाना हम सबका धर्म बनता है। राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करनेवाले हुतात्माओं की एक लंबी शृंखला है। उनमें से 50 अमर सपूतों के प्रेरणाप्रद जीवन से पाठकों को परिचित कराने का यह उपक्रम है, जो निश्चित रूप से हर भारतीय को पढ़ना ही चाहिए।"
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