Taliban, Afghan Aur Mein
Author:
Sushmita BandyopadhyayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 48
₹
60
Unavailable
अफ़ग़ानिस्तान का तालिबान शासन अब विश्व में रूढ़िवाद, कट्टरता और कठमुल्लावादी तानाशाही का पर्याय बन चुका है, ‘तालिबानी’ और ‘तालिबानीकरण’ जैसे शब्द इधर राजनीतिक विमर्श में आम हो गए हैं।</p>
<p>यह पुस्तक इसी तालिबान शासन से लेखिका की अपनी मुठभेड़ का लोमहर्षक विवरण है। लेखिका ने एक अफ़ग़ान-युवक से प्रेम-विवाह के बाद कई वर्ष अफ़ग़ानिस्तान में बिताए हैं। अफ़ग़ानिस्तान प्रवास के अपने काले दिनों का त्रास उन्होंने इसकी पंक्ति-पंक्ति में पिरोया है। साथ ही विकास की धारा से विच्छिन्न उस भूमि तथा वहाँ के निवासियों के विषय में कई दिलचस्प तथा चौंकानेवाली जानकारियाँ भी पाठक को इस पुस्तक में प्राप्त होंगी।</p>
<p>सुष्मिता बंद्योपाध्याय की इस पुस्तक से पहले ‘काबुलीवाले की बंगाली बीवी’ की पृष्ठभूमि से परिचित पाठक इस आत्मकथात्मक उपन्यास को एक निरन्तरता के साथ पढ़ सकेंगे। इसमें उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के अनुभवों के साथ-साथ अपनी मातृभूमि सम्बन्धी कुछ स्मृतियों तथा स्त्री-विमर्श के कुछ सार्वभौमिक सवालों को भी रेखांकित किया है।
ISBN: TalibanAfghanAurMeinPaperBack
Pages: 119
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘जिगरी’ अशोक कुमार का सर्वाधिक चर्चित और पुरस्कृत उपन्यास है, जिसे इन्होंने एक हफ़्ते तक एक मदारी के साथ रहकर उसके पेशे और उसके भालू के स्वाभाव-व्यवहार का अध्ययन करने के बाद लिखा था। ‘अमेरिकन तेलगू एसोसिएशन’ की उपन्यास लेखन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद इसका यह हिन्दी अनुवाद 2008 में साहित्य अकादेमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में प्रकाशित हुआ। उपन्यास की लोकप्रियता का यह प्रमाण है कि उस हिन्दी अनुवाद के आधार पर इसके मराठी, पंजाबी, ओड़िया, कन्नड़, बांग्ला, मैथिली आदि भाषाओं के अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित हुए हैं। बाद में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। अति संवेदनशील कथानक से युक्त इस उपन्यास में एक भालू और एक मदारी की कथा है, जिसमें मदारी की जीविका का आधार बने भालू के हाव-भाव, क्रिया-कलापों, क्रोध, अपनत्व आदि का तथा मदारी के साथ उसके आत्मीय सम्बन्धों का मार्मिक चित्रण किया गया है। यह है तो एक लघु उपन्यास पर सवाल बड़े खड़े कर देता है।
‘वन्य जीव संरक्षण क़ानून’ वन्य प्राणियों के संरक्षण की दिशा में एक स्वागतयोग्य क़दम है। लेकिन यहाँ यह भी सत्य है कि प्राणी और मनुष्य के बीच प्रेम और ममता का ऐसा मज़बूत सम्बन्ध होता है जो क़ानून का उल्लंघन भी लग सकता है। आज जब मानवीय संवेदनाएँ मन्द-दुर्बल पड़ती जा रही हैं, अधिकांशतः औपचारिक मात्र रह गई हैं, यह उपन्यास इन संवेदनाओं को बचाए रखने की आवश्यकता की ओर बरबस हमारा ध्यान खींचता है।
जीवन्त अनुवाद में प्रस्तुत एक अत्यन्त पठनीय उपन्यास।
Aaspas Se Gujrate Hue
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- Description: ‘अनु–––सर्दियों की एक ख़ुशनुमा ढलती साँझ में मेरे ज़ेहन में आई थी। शाम से लेकर पूरी रात वह मेरे साथ रही। अगले ही दिन मैंने तय कर लिया कि अनु को आकार देना चाहिए। अनु जैसी किसी से मैं आज तक मुखातिब नहीं हुई हूँ। पर टुकड़ों में उसकी छवियाँ मेरे आसपास से गुज़रती रही हैं। आज के दौर की एक सामान्य-सी युवती है अनु, जो कुछ परवरिश के तौर–तरीक़े के चलते, तो कुछ परिस्थितिवश और बहुत कुछ अपने स्वभावगत गुण–अवगुण की वजह से लीक से हटकर चलने की कोशिश में लगी है।’ इस उपन्यास की नायिका के बारे में लेखिका का यह वक्तव्य, अगर बहुत ज़्यादा नहीं तो इतना तो बताता ही है कि वह ‘लीक से हटकर’ चलनेवाली युवती है, उसके ख़ाका को पूरा करने के लिए इतना–भर और जोड़ लेना काफ़ी होगा कि वह हमारे दरवाज़े के बाहर खड़े, ‘इन्स्टैंट’ वर्तमान से उठी हुई नायिका है—अपनी टुकड़ा–टुकड़ा छवियों में ही आकार लेती हुई।
Narak Masiha
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Bhagwandas Morwal
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आधुनिक समाज के हाशियों की उपेक्षित उदासियों का अन्वेषण करनेवाले भगवानदास मोरवाल ने इस उपन्यास में मुख्यधारा की ख़बर ली है। वह मुख्यधारा जो क़िस्म-क़िस्म की अमानवीय और असामाजिक गतिविधियों से उस ढाँचे का निर्माण करती है जिसे हम समाज के रूप में देखते-जानते हैं।
उपन्यास का विषय ग़ैर-सरकारी संगठनों की भीतरी दुनिया है, जहाँ देश के लोगों के दुःख दुकानों पर बिक्री के लिए रखी चीज़ों की तरह बेचे-ख़रीदे जाते हैं, और सामाजिक-आर्थिक विकास की गम्भीर भंगिमाएँ पलक झपकते बैंक बैलेंस में बदल जाती हैं।
यह उपन्यास बताता है कि आज़ादी के बाद वैचारिक-सामाजिक प्रतिबद्धताओं के सत्त्व का क्षरण कितनी तेज़ी से हुआ है, और आज वह कितने समजघाती रूप में हमारे बीच सक्रिय है। कल जो लोग समाज के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने की उदात्तता से दीप्त थे, कब और कैसे पूरे समाज, उसके पवित्र विचारों, विश्वासों, प्रतीकों और अवधारणाओं को अपने हित के लिए इस्तेमाल करने लगे और वह भी इतने निर्लज्ज आत्मविश्वास के साथ, इस पहेली को खोलना शायद आज के सबसे ज़रूरी कामों में से एक है। यह उपन्यास अपने विवरणों से हमें इस ज़रूरत को और गहराई से महसूस कराता है।
उपन्यास के पात्र अपने स्वार्थों की नग्नता में जिस तरह यहाँ प्रकट हुए हैं, वह डरावना है; पैसा कमाने के तर्क को वे जहाँ तक ले जा चुके हैं, वह एक ख़ौफ़नाक जगह है—सचमुच का नरक; और जिस भविष्य का संकेत यहाँ से मिलता है, वह वीभत्स है।
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