Ghar
(0)
Author:
Vibhuti Narayan RaiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर विभूति नारायण राय का यह उपन्यास मध्यवर्गीय परिवार की विडम्बनापूर्ण जीवन-स्थितियों का दारुण दस्तावेज़ है। पेंशनयाफ़्ता मुंशी रामानुज लाल का यह घर क्यों ईंट-गारे के मकान में तब्दील होकर रह गया, ‘घर’ शब्द से जुड़ी ऊष्मा कैसे एकाएक वाष्प बनकर उड़ गई, एक ही छत के नीचे रहते हुए घर के प्राणी एक-दूसरे से एकदम कटकर संवादहीनता की अंधी सुरंग में क्यों फँस गए जहाँ न परिचित स्पर्श था और न ही स्वर? इन सवालों के जवाब के अलावा यह हमारी व्यवस्था की उन विडम्बनाओं और विद्रूपताओं की कहानी भी है जिनमें फँसकर एक पढ़ा-लिखा नवयुवक बेरोज़गारी का दंश झेलते हुए नपुंसक आक्रोश से भर उठता है और स्वयं से तथा समाज से आँखें चुराने लगता है, दूसरी तरफ़ यह उन हज़ारों राजकुमारियों के करुण दु:ख की कथा भी है जिन्हें कोई राजकुमार लेने नहीं आता। सरस भाषा और प्रवाहपूर्ण कथा विन्यास विभूति नारायण राय की अपनी विशिष्टता है जिसे पाठक इस उपन्यास में भी पाएँगे।
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समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर विभूति नारायण राय का यह उपन्यास मध्यवर्गीय परिवार की विडम्बनापूर्ण जीवन-स्थितियों का दारुण दस्तावेज़ है। पेंशनयाफ़्ता मुंशी रामानुज लाल का यह घर क्यों ईंट-गारे के मकान में तब्दील होकर रह गया, ‘घर’ शब्द से जुड़ी ऊष्मा कैसे एकाएक वाष्प बनकर उड़ गई, एक ही छत के नीचे रहते हुए घर के प्राणी एक-दूसरे से एकदम कटकर संवादहीनता की अंधी सुरंग में क्यों फँस गए जहाँ न परिचित स्पर्श था और न ही स्वर? इन सवालों के जवाब के अलावा यह हमारी व्यवस्था की उन विडम्बनाओं और विद्रूपताओं की कहानी भी है जिनमें फँसकर एक पढ़ा-लिखा नवयुवक बेरोज़गारी का दंश झेलते हुए नपुंसक आक्रोश से भर उठता है और स्वयं से तथा समाज से आँखें चुराने लगता है, दूसरी तरफ़ यह उन हज़ारों राजकुमारियों के करुण दु:ख की कथा भी है जिन्हें कोई राजकुमार लेने नहीं आता। सरस भाषा और प्रवाहपूर्ण कथा विन्यास विभूति नारायण राय की अपनी विशिष्टता है जिसे पाठक इस उपन्यास में भी पाएँगे।
Book Details
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ISBN9788171198382
-
Pages107
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रेम की न कोई भाषा होती है, न परिभाषा, न सीमाएँ उसे सीमित करती हैं, न दूरियाँ उसे ओझल करती हैं, वह दूरी जीवन और मृत्यु भी क्यों न हों! ‘पूर्णमिदम्’ के बाद सरोज कौशिक का यह उपन्यास ‘पूर्णमदः’; अलग-अलग होते हुए भी ये दोनों उपन्यास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। वह अध्यात्म के आलोक में प्रकाशमान, तो यह जीवन के संघर्षों ने बीच के पवित्र दीप को अपने सचेत आत्मबोध की ओट में बचाते हुए एक सघन यात्रा। ‘पूर्णमदः’ में पीड़ा है, अतीत के दुखते घाव हैं, स्मृति में कौंधती विविधवर्णी छवियाँ हैं, चहुँओर व्याप्त कालिमा में अपने अन्तस की पवित्रता को निष्कलंक रखते अपने मूल्यों को बचाने का संघर्ष है; और जीवन तथा समाज में मनुष्य की आत्मा को कचोटतीं, खोखला करतीं अपूर्णताओं के बरक्स पूर्ण को बचाने और अगली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखने की कामना है। भावनाओं के सघन चित्रों से परिपूर्ण एक पठनीय औपन्यासिक कृति।
Vaikalya
- Author Name:
Dr. Shireesh Gopal Deshpande
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वैकल्य अर्थात् विकलता। कुष्ठरोग पर आधारित हिंदी में संभवतः यह पहला क्लासिकल और मूल ललित शैली में लिखा गया उपन्यास है। इसने कुष्ठ रोगियों के पुनर्वास और उपचार को लेकर समाज में लोगों की आँखें खोलने का काम किया है। उपन्यास का कथानक अंतर्मन को छू लेता है। विषय बहुत ही हृदयस्पर्शी और दिलचस्प है। यह दो महापुरुषों के मौन संघर्ष की गाथा है। एक वह जो, समाजसेवी हैं, कुष्ठरोगियों के लिए आश्रम व्यवस्था की बात करते हैं, तो दूसरे वह, जो प्रख्यात डॉक्टर हैं, अस्पताल व्यवस्था की बात करते हैं और रोगियों का इलाज घर से ही होना चाहिए—इसका पुरजोर समर्थन करते हैं। कुल मिलाकर कुष्ठरोग को लेकर वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण के बीच की यह गहरी खाई सशक्त कथ्य के ताने-बाने से बुनी एक करुण-गाथा है। दोनों महापुरुषों की पत्नियों का अपने पति और उनके कार्य के प्रति त्याग और समर्पण की कहानी भी गजब की है। कुष्ठरोग को महारोग के नाम से भी जाना जाता है, जिसके प्रति लोगों के मन में कई प्रकार के भ्रम, भय और अंधविश्वासी भावनाएँ थीं। इस रोग के संसर्ग की स्थिति, टीके का आविष्कार, उपलब्ध दवाइयाँ, देश-विदेश के अनुसंधानकर्ताओं की मान्यताएँ, सरकारी रवैया, रोगियों का देश निकाला, पाप-पुण्य जैसे मुद्दों को लेकर यह उपन्यास वैचारिक द्वंद्व पेश कर जनजागरण की स्थिति पैदा करता है।
Mediyaya Namah
- Author Name:
Girish Pankaj
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मीडिया की आधुनिक दुनिया निश्चित रूप से अनेक विकृतियों से भरी हुई है। कुछ अखबारी चेहरे भले ही नायक जैसी लगें, लेकिन उनके पीछे एक खलनायक छुपा होता है। गिरीश पंकज ने मीडिया की कुछ खामियों को उजागर करने का सार्थक प्रयास किया है। गिरीश पिछले तीस वर्षों से मीडिया से जुड़े हैं। इससे पहले, उन्होंने 'मिठलबरा की आत्मकथा’ नामक उपन्यास लिखा, जो तेलुगु और ओडिया भाषाओं में भी अनूदित हुआ है। यह व्यंग्य उपन्यास इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ कहने का व्यंग्य नहीं है, बल्कि शुरू से अंत तक उसमें व्यंग्य का तत्व निरंतर रहता है। इसकी भाषा रंजक, व्यंग्यपूर्ण, बेबाक और पाठक को बांधे रखने वाली है। कभी-कभी भाषा कुछ खुली-खुली भी लग सकती है, पर पूरी तरह से मर्यादित है। इस तरह के व्यंग्य उपन्यासों में अक्सर व्यंग्य खोजना पड़ता है, लेकिन ‘मीडियाय नमः’ में कहीं- कहीं व्यंग्य का समावेश हर कदम पर है। मुझे पूरा भरोसा है कि गिरीश का यह नया व्यंग्य उपन्यास बाजारवादी मीडिया के संकीर्ण, समझौता-प्रधान चेहरे को जानने में मदद करेगा।
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