Mam Aranya
Author:
Sudhakar AdeebPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
वीरवर लक्ष्मण अपने चारों ओर विस्तीर्ण एवं अभ्यन्तर में घुमड़ते-गूँजते अरण्य से जूझते चौदह वर्ष देश निकाला पाए अपने अग्रज श्रीराम के साथ विचरते रहे। रामकथा तो इस धरती के कण-कण और पत्ते-पत्ते पर लिखी गई तथा बहुश्रुत है। परन्तु त्यागमूर्ति लक्ष्मण अधिकतर मौन-से चित्रित किए गए हैं। कुछेक स्थलों पर जब वह अपने सम्पूर्ण तेज के साथ मुखर होते हैं, तो उन्हें उनके मर्यादाप्रिय अग्रज श्रीराम शान्त करा देते हैं। ऐसा अनेक रामायणों में होता आया है।</p>
<p>विचारणीय यह है कि क्या सौमित्र-लक्ष्मण सम्पूर्ण रामकथा में सदैव मौन ही रहे होंगे? क्या उनका अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं रहा होगा? इतना तेजस्वी, इतना कर्मठ और शौर्यवान् योद्धा भला क्या इतना चुपचाप रह सकता है? फिर रामानुज लक्ष्मण का स्वयं का चिन्तन क्या रहा होगा? ये प्रश्न वर्षों तक मेरे मन में आकार लेते रहे। समाधान इस ‘मम अरण्य’ के रूप में उपस्थित हुआ है।...
ISBN: 9788180319518
Pages: 356
Avg Reading Time: 12 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: -ध्यान से देखो, पहचानते हो? मेरा इशारा यहाँ की छोटी सी -किंतु बेजान नहीं - इस सड़क की तरफ था .....यहाँ पर चलने वाले लोगों की सीधी-साधी चाल .....सड़क किनारे मंदिर में बज रही घंटियाँ ....सालों से खड़ा बरगद और उस पर लपेटी अनगिनत डोरियाँ..... निश्चल कोमल और पवित्र खिल-खिलाहटें ....अपनी इमानदार हाटें .....यहाँ की भोली-भाली उमंग ....अपने मिट्टी की गंध .... हम दोनों गंगा के किनारे चले गये। उमड़ते-घुमड़ते काले-काले मेघ....निश्चल और निर्मल गंगा...दूर तक फैलता कल-कल का स्वर....बहती ठंढ़ी हवाएँ ....तट पर की हलचल.... इस दृश्य ने जैसे हमें बाँध लिया था। सामने से सावन की धूम-धाम जैसे धीरे-धीरे अपनी ओर बढ़ती आ रही थी। -ये है अपना उत्सव!- मैंने कहा और आनंद के पास किनारे पर ही बैठ गया। वह भी काफी देर से स्थिर बैठा, इस दृश्य को देखता रहा। दूर आकाश में काले-काले मेघ छा चुके थे और फिर जोरदार बारिश शुरू हो गयी। मौसम बिल्कुल ठंडा हो गया और चारों ओर सोंधी-सोंधी गंध फैल गयी। काफी देर की चुप्पी के बाद उसने मुझसे कहा- ऐसा लगता है कि कहीं इन्हीं में खो जाऊँ! .....कहीं मिल जाऊँ .... आज शायद उसने पहली बार अपने अंधेरे कमरे से निकलकर इस दुनिया को देखा था। मेरे मन में एक संतोष सा हुआ और आँखों में आँसू आ गये -इसके लिए इन्हें भी तो यहाँ रखना होगा ...इसी पवित्रता के साथ ...इतनी ही गरिमा से .... मैं फिर वापस आ गया।
Poles Apart
- Author Name:
Archana Pingley
- Book Type:

- Description: Me era it all started with a kiss, a ferocious kiss that was meant to showcase the upper hand on him but that one kiss changed everything. And just like that I was in love with him. I thought I knew all of him but he proved me wrong. I despise him for his lies and betrayal and for what I had to endure because of him. But I hate myself more for still caring for him, still loving him. Carlino I myself was not proud of what My reality was. I really despise and envied myself for everything I did except for one thing and I would never like to change that. Because of that one particular incident, I was able to cherish the wonderful feeling of falling in love with the most amazing girl I ever met. I don’t blame her for hating me when she found out My facade and now she was gone. But I'll get her back at any cost and never to lose her.
Nakshe Kadam : Naye Purane
- Author Name:
Shyam Krishna Pandey
- Book Type:

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Description:
यह उपन्यास पूर्व स्वतंत्रता काल से लेकर वर्तमान तक की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक स्थिति को इलाहाबाद के पटल पर रखकर बहुत बारीकी के साथ एक विराट कैनवास पर उकेरता है। इसकी कथा-गाथा 'मल्टी डायममेंशनल' है। आज के युवा को उसकी शानदार विरासत से जोड़ने की सार्थक पहल की गई है। युवा एक शक्ति-समूह है। नई 'पीढ़ी के हाथ में ही नया भारत है। उस शक्ति को इस उपन्यास के माध्यम से सकारात्मक मोड़ देने में रचनाकार सफल है।
लेखक ऐसे परिवार से हैं, जिसके पूर्वजों का स्वतंत्रता-संग्राम में पीढ़ी-दर-पीढ़ी योगदान रहा है। इसलिए इस कृति में स्वतंत्रता आन्दोलन की अब तक अनजानी या विस्मृत महत्त्वपूर्ण घटनाओं का प्रामाणिक एवं सजीव दस्तावेज़ीकरण है।
लेखक भारतीय छात्र आन्दोलन की परम्परा से 1960 से 1970 के दशक के दौरान शीर्ष स्तर पर गहराई से जुड़े रहे हैं। इसलिए स्वाधीनता के बाद उपजे युवा आक्रोश और समकालीन राजनीतिक विचारधाराओं की सोच-समझ का इस उपन्यास में अन्तरंग विवरण एवं समालोचन है। भारत के राष्ट्रस्तरीय पर्वों के आयोजन के मूल भाव का विशद वर्णन और उनके ‘सर्व धर्म सद्भाव' के शाश्वत सन्देशों की व्याख्या है। यह उपन्यास राजनीतिक, सामाजिक क्षेत्रों तथा युवा पीढी से जुड़े व्यक्तियों के अतिरिक्त सामान्य पाठकों के लिए भी पठनीय है। इसमें आद्योपान्त रोचकता है, विभिन्न समयकाल की धड़कन है, स्पन्दन है।
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