Gaban
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गबन' की नायिका जालपा का बचपन से एक सपना है- उसे माँ के जैसा ही चंद्रहार मिले। इस स्वप्न के इर्द-गिर्द प्रेमचंद भारतीय मध्यवर्ग के पतन की कथा लिखते हैं। जालपा का स्वर्णाभूषणों के प्रति अतार्किक प्रेम नायक रमानाथ को भ्रष्टाचार की ओर इतना ले जाता है कि वह अन्ततः निर्दोषों को सज़ा कराने के लिए झूठा सरकारी गवाह तक बनने को तैयार हो जाता है; यह 'गबन' की कथा है। इसके बीच ऐसे अनेक चरित्र और उनके जीवन प्रसंग हैं जो सहज मानवीय ढंग से उच्चता और अवनति की ओर यात्रा करते दिखाई देते हैं। इससे 'गबन' बस आभूषण प्रेम के दुष्परिणामों का आख्यान नहीं रह जाता- मानवीय गरिमा और सामाजिक परिवर्तन के उच्च आदर्शों का दस्तावेज बन जाता है।
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गबन' की नायिका जालपा का बचपन से एक सपना है- उसे माँ के जैसा ही चंद्रहार मिले। इस स्वप्न के इर्द-गिर्द प्रेमचंद भारतीय मध्यवर्ग के पतन की कथा लिखते हैं। जालपा का स्वर्णाभूषणों के प्रति अतार्किक प्रेम नायक रमानाथ को भ्रष्टाचार की ओर इतना ले जाता है कि वह अन्ततः निर्दोषों को सज़ा कराने के लिए झूठा सरकारी गवाह तक बनने को तैयार हो जाता है; यह 'गबन' की कथा है। इसके बीच ऐसे अनेक चरित्र और उनके जीवन प्रसंग हैं जो सहज मानवीय ढंग से उच्चता और अवनति की ओर यात्रा करते दिखाई देते हैं। इससे 'गबन' बस आभूषण प्रेम के दुष्परिणामों का आख्यान नहीं रह जाता- मानवीय गरिमा और सामाजिक परिवर्तन के उच्च आदर्शों का दस्तावेज बन जाता है।
Book Details
-
ISBN9788119745630
-
Pages327
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age11-18 yrs
-
Country of OriginIndia
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किसी भी देश या समाज की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ़ वहाँ जन्मे महापुरुषों से ही नहीं बनती बल्कि संस्कृति के निर्माण में उन अनाम लोगों की भी भागीदारी होती है जो रोज़मर्रा की गतिविधियों में संलग्न रहते हुए भी अपना एक जीवन–सन्देश छोड़ जाते हैं।
शहर चकवाल की भागवन्ती ऐसा ही चरित्र है जिसने अनपढ़ होते हुए भी अपने बच्चों को पढ़ा–लिखाकर न केवल क़ाबिल बनाया बल्कि इंसानियत के गुण भी उनमें विकसित किए। घर–गृहस्थी के चूल्हा, चरखा और चक्की में व्यस्त रहनेवाली भागवन्ती जितनी पारम्परिक है, उतनी ही आधुनिक भी। उसका चरित्र जैसे एक अबूझ पहेली हो। गांधी हत्या के बाद पहले तो वह अपने पति से कहती है कि, ‘‘सोग मनाना है तो मनाओ, तुम्हारे लिए महात्मा होगा या उन लोगों के लिए जो कुर्सियाँ सँभाले बैठे हैं।’’ लेकिन थोड़ी ही देर बाद जब बहू आकर पूछती है कि आज खाना क्या बनेगा तो एक पल रुककर ग़ुस्से में कहती है ‘‘कैसे घर से आई हो तुम, इतना बड़ा आदमी मर गया और तुम पूछ रही हो—खाना क्या पकेगा! शर्म नहीं आती?’’
सुख–दु:ख, हास्य–रुदन, जीवन–मरण, अच्छाई–बुराई की जीवन्त झलकियों का सुन्दर कोलाज है यह लघु औपन्यासिक कृति। इसमें आज़ादी के पूर्व से लेकर गांधी हत्या तक की राजनीतिक हलचलों की अनुगूँज भी सुनाई पड़ेगी। प्रवाहपूर्ण भाषा तथा बतकही के शिल्प में बुना यह उपन्यास बेहद पठनीय बन पड़ा है।
Sabrang
- Author Name:
S. D. Ojha
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यह नाम है उस अद्वितीय प्रयास का, जो भारतीय संस्कृति, कला, इतिहास, दर्शन, और जीवन शैली की अथाह गहराइयों को शब्दों की माला में पिरोता है। बालपन की मासूमियत से लेकर यौवन के जोश तक, साप्ताहिक पत्रिकाओं के मधुर स्वाद से लेकर साहित्य की गहराइयों में खुद की खोज तक - श्री एस. डी. ओझा जी की सेवानिवृत्ति के बाद की लेखनी से उपजे इन लेखों में वह सब मौजूद है जो आपकी आत्मा को स्पर्श कर सकता है। इस पुस्तक में उन्होंने ऐसी रचना की है जो पाठकों को ज्ञान की गहराइयों में ले जाने के साथ-साथ उन्हें अनुप्रेरित भी करती है। जीवन के अनेक रंगों को समेटे ‘सबरंग’ आपको उस यात्रा पर ले चलेगा जहाँ प्रत्येक पृष्ठ एक नवीन रंग, एक नवीन सोच, और एक नवीन दर्शन की प्रतीक्षा में है। आइए, ‘सबरंग’ के पन्नों को उलटें और अपने जीवन को इन विचारों के रंगों से संवारें। यह पुस्तक आपके पुस्तकालय का एक अमूल्य निधि बन जाएगी।
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