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काशी के जमींदार परिवार के मुखिया प्रभाशंकर और भतीजे ज्ञानशंकर की जमींदारी में लखनपुर एक गाँव है। 'प्रेमाश्रम' उपन्यास में प्रेमचंद लखनपुर के लोगों की व्यथा कथा लिखते हैं कि कैसे अपने आसामी किसानों के उत्पीड़न से बेपरवाह जमींदार अपनी ही रासलीलाओं में मगन हैं। यह उत्पीड़न इतना बढ़ता है कि गाँव के सारे काम करने लायक पुरुष जेल चले जाते हैं ऊपर से बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक विपदाएँ अपनी जगह । जमीदार परिवार भी धीरे-धीर बदलता है, विलास की सीमाएँ सामने आती जाती हैं और मजलूम किसानों के भी दिन फिरते हैं, यही कथा है 'प्रेमाश्रम' की।
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काशी के जमींदार परिवार के मुखिया प्रभाशंकर और भतीजे ज्ञानशंकर की जमींदारी में लखनपुर एक गाँव है। 'प्रेमाश्रम' उपन्यास में प्रेमचंद लखनपुर के लोगों की व्यथा कथा लिखते हैं कि कैसे अपने आसामी किसानों के उत्पीड़न से बेपरवाह जमींदार अपनी ही रासलीलाओं में मगन हैं। यह उत्पीड़न इतना बढ़ता है कि गाँव के सारे काम करने लायक पुरुष जेल चले जाते हैं ऊपर से बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक विपदाएँ अपनी जगह । जमीदार परिवार भी धीरे-धीर बदलता है, विलास की सीमाएँ सामने आती जाती हैं और मजलूम किसानों के भी दिन फिरते हैं, यही कथा है 'प्रेमाश्रम' की।
Book Details
-
ISBN9788119745890
-
Pages472
-
Avg Reading Time16 hrs
-
Age0-11 yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
दुष्यन्त कुमार ने बहुत कुछ लिखा पर जिन अच्छी कृतियों से उनके रचनात्मक वैभव का पता चलता है, यह उपन्यास उनमें से एक है।
उपन्यास में एक सामन्ती परिवार और उसके परिवेश का चित्रण है। सामन्त ज़मीन और उससे मिलनेवाली दौलत को क़ब्ज़े में रखने के लिए न केवल ग़रीब किसानों, अपने नौकर-चाकरों और स्त्रियों का शोषण और उत्पीड़न करता है, बल्कि स्वयं को और जिन्हें वह प्यार करता है, उन्हें भी बर्बादी की तरफ़ ठेलता है, इसका यहाँ मार्मिक चित्रण किया गया है।
उपन्यास बड़ी शिद्दत से दिखाता है कि अन्तत: सामन्त भी मनुष्य ही होता है और उसकी भी अपनी मानवीय पीड़ाएँ होती हैं, पर अपने वर्गीय स्वार्थ और शोषकीय रुतबे को बनाए रखने की कोशिश में वह कितना अमानवीय होता चला जाता है, इसका ख़ुद उसे भी अहसास नहीं होता।
उपन्यास के सारे चरित्र चाहे वह चन्दन, भैनाजी, माँ, पिताजी और मंडावली वाली भाभी हों या फिर मुंशीजी, यादराम, भिक्खन चमार आदि निचले वर्ग के हों—सब अपने परिवेश में पूरी जीवन्तता और ताज़गी के साथ उभरते हैं। उपन्यासकार कुछ ही वाक्यों में उनके पूरे व्यक्तित्व को उकेरकर रख देता है, और अपनी परिणति में कथा पाठक को स्तब्ध तथा द्रवित कर जाती है।
दुष्यन्त कुमार की भाषा के तेवर की बानगी यहाँ भी देखने को मिलती है—कहीं एक भी शब्द न फ़ालतू, न सुस्त।
अत्यन्त पठनीय तथा मार्मिक कथा-रचना।
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