Poorvapar
(0)
Author:
Rameshchandra ShahPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
125
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सांसारिकता से पलायन और सांसारिकता का स्वीकार—भारतीय मन सहस्राब्दियों से इन दोनों जीवन मूल्यों के बीच झूलता आ रहा है। दुनिया से भागने, उसे त्यागने में जो एक आत्ममुग्धता और आत्मश्लाघा है, परम्परित विश्वासों और संस्कारों के निर्वाह का जो गर्व है, उसी की उपज होते हैं बंसी उर्फ़ बाबाजी, जैसे चरित्र, जो इस उपन्यास के नायक हैं और जिसे सुपरिचित कवि-कथाकार रमेशचन्द्र शाह ने पूरी सजगता से रचा है।</p> <p>लेखक की यह सजगता इस बात में भी है कि एक कठिन विषय को उसने अत्यन्त सहज भाषा-शिल्प में प्रस्तुत किया है और इस कौशल में भी कि उसका कथानायक अपनी समूची द्वन्द्वयात्रा में अपने ही बालसखा बंटी के शब्द-साक्ष्य से उद्वेलित और उत्प्रेरित है। लगता है जैसे वह उसी का दूसरा प्रतिरूप हो; यानी वह प्रतिरूप जिसे वह अपने ही किए जी नहीं पाया और जो अब उसकी अन्तर्विभक्त अवश था, उसके राग-विराग, विश्वास-अविश्वास और आशा-निराशा को निर्ममता से विश्लेषित कर रहा है। यही कारण है कि जब बंटी एक कृति के बहाने एक आत्मीय स्मृति की तरह बंसी को छू जाता है तो जैसे उसकी समूची साधना-भूमि डोल उठती है। वह सब जो उसके लिए मर चुका था, फिर से जीवित हो उठा और उसकी प्रत्येक निषिद्ध और दमित चित्तवृत्ति उसे प्रश्नाकुल करने लगी। उसकी यह प्रश्नाकुलता ही इस उपन्यास का मूलाधार है, जिससे भारतीय धर्म-दर्शन के कितने ही अनुत्तरित पहलू उजागर होते हैं।</p> <p>संक्षेप में कहें तो ‘शाह की यह महत्त्वपूर्ण कथाकृति मनुष्य के उस वैयक्तिक सुखवाद का तात्त्विक चित्रण करती है, जिसके मूल में सांसारिकता की उपेक्षा का अतार्किक दर्शन निहित है।’</p> <p><strong> </strong>
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सांसारिकता से पलायन और सांसारिकता का स्वीकार—भारतीय मन सहस्राब्दियों से इन दोनों जीवन मूल्यों के बीच झूलता आ रहा है। दुनिया से भागने, उसे त्यागने में जो एक आत्ममुग्धता और आत्मश्लाघा है, परम्परित विश्वासों और संस्कारों के निर्वाह का जो गर्व है, उसी की उपज होते हैं बंसी उर्फ़ बाबाजी, जैसे चरित्र, जो इस उपन्यास के नायक हैं और जिसे सुपरिचित कवि-कथाकार रमेशचन्द्र शाह ने पूरी सजगता से रचा है।</p>
<p>लेखक की यह सजगता इस बात में भी है कि एक कठिन विषय को उसने अत्यन्त सहज भाषा-शिल्प में प्रस्तुत किया है और इस कौशल में भी कि उसका कथानायक अपनी समूची द्वन्द्वयात्रा में अपने ही बालसखा बंटी के शब्द-साक्ष्य से उद्वेलित और उत्प्रेरित है। लगता है जैसे वह उसी का दूसरा प्रतिरूप हो; यानी वह प्रतिरूप जिसे वह अपने ही किए जी नहीं पाया और जो अब उसकी अन्तर्विभक्त अवश था, उसके राग-विराग, विश्वास-अविश्वास और आशा-निराशा को निर्ममता से विश्लेषित कर रहा है। यही कारण है कि जब बंटी एक कृति के बहाने एक आत्मीय स्मृति की तरह बंसी को छू जाता है तो जैसे उसकी समूची साधना-भूमि डोल उठती है। वह सब जो उसके लिए मर चुका था, फिर से जीवित हो उठा और उसकी प्रत्येक निषिद्ध और दमित चित्तवृत्ति उसे प्रश्नाकुल करने लगी। उसकी यह प्रश्नाकुलता ही इस उपन्यास का मूलाधार है, जिससे भारतीय धर्म-दर्शन के कितने ही अनुत्तरित पहलू उजागर होते हैं।</p>
<p>संक्षेप में कहें तो ‘शाह की यह महत्त्वपूर्ण कथाकृति मनुष्य के उस वैयक्तिक सुखवाद का तात्त्विक चित्रण करती है, जिसके मूल में सांसारिकता की उपेक्षा का अतार्किक दर्शन निहित है।’</p>
<p><strong> </strong>
Book Details
-
ISBN9788171780815
-
Pages268
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इस उपन्यास में इतिहास के साथ कल्पना का विरोध नहीं, समन्वय घटित हुआ है।
‘बेगम मेरी विश्वास’ में मराली विश्वास गाँव-देहात की एक ग़रीब लड़की है लेकिन कालचक्र के प्रभाव से भारत के इतिहास को बदलने में प्रमुख भूमिका निभाती है। घटना-चक्र से यही मराली विश्वास सिराजुद्दौला के हरम में पहुँचकर मरियम बेगम हो जाती है और बाद में क्लाइव के पास पहुँचकर बन पाती है मेरी। हिन्दू, मुसलमान और ईसाई—तीन विभिन्न धर्मों के संगम की प्रतीक बन जाती है एक मामूली-सी लड़की।
दो इतिहास पुरुष—सिराजुद्दौला और क्लाइव के बीच थी एक नायिका—मराली यानी बेगम मेरी विश्वास, दोनों शत्रुओं का समान रूप से विश्वास जीतनेवाली।
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