Amitav Ghost
(1)
Author:
Supriya DeepPublisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
EnglishCategory:
Literary-fiction₹
237
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She is not aware that she is different. Priyakshee, an it professional, could just see flashes of the future In her dreams. Still, she couldn't save her mother; her father was far dead. The cover-faced, self-healer fighter with the aegishjalmur tattoo on his calf, negative, appears in her dreams and soon in real life. He protects her from attacks no one else knows about; tells her about her dead mother residing in his world: midlife-the ghost-world; falls for her against the 'ghost law of protectors'. Together they discover that priyakshee, like her mother, is a member of Jiva, a hidden society with the power of ghost-immortality. To keep her safe from himself, negative pursues her to marry her boss Amit who has developed an interest in her because she could prevision like amit's grandmother. On the seventh day of their engagement, priyakshee is found missing, Amit is convinced of her murder and after reading about negative in her diary, which says that priyakshee is captured in the ghost world, currently in eternal sleep waiting for Amit and negative to come and rescue her, Amit decides to prove her schizophrenic. Is negative really an imagination of priyakshee or she holds a key to power everyone in midlife would like to have? Why does priyakshee go missing? Does Amit get rid of her after knowing about her schizophrenia? Or does he just want Exemption from accusation to go and find priyakshee? 'Amitav ghost' Breaks the stereotype, rediscovers the concept of ghost, swings between psychological realism and fantasy, and keeps the reader guessing whether everything about negative is true or it's priyakshee's imagination.
Read moreAbout the Book
She is not aware that she is different. Priyakshee, an it professional, could just see flashes of the future In her dreams. Still, she couldn't save her mother; her father was far dead. The cover-faced, self-healer fighter with the aegishjalmur tattoo on his calf, negative, appears in her dreams and soon in real life. He protects her from attacks no one else knows about; tells her about her dead mother residing in his world: midlife-the ghost-world; falls for her against the 'ghost law of protectors'. Together they discover that priyakshee, like her mother, is a member of Jiva, a hidden society with the power of ghost-immortality. To keep her safe from himself, negative pursues her to marry her boss Amit who has developed an interest in her because she could prevision like amit's grandmother. On the seventh day of their engagement, priyakshee is found missing, Amit is convinced of her murder and after reading about negative in her diary, which says that priyakshee is captured in the ghost world, currently in eternal sleep waiting for Amit and negative to come and rescue her, Amit decides to prove her schizophrenic. Is negative really an imagination of priyakshee or she holds a key to power everyone in midlife would like to have? Why does priyakshee go missing? Does Amit get rid of her after knowing about her schizophrenia? Or does he just want Exemption from accusation to go and find priyakshee? 'Amitav ghost' Breaks the stereotype, rediscovers the concept of ghost, swings between psychological realism and fantasy, and keeps the reader guessing whether everything about negative is true or it's priyakshee's imagination.
Book Details
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ISBN9788194462170
-
Pages200
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Author Name:
Manzoor Ehtesham
- Book Type:

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Description:
‘दास्तान-ए-लापता’ और ‘सूखा बरगद’ जैसे चर्चित उपन्यासों के लेखक मंज़ूर एहतेशाम की यह नई औपन्यासिक कृति समकालीन हिन्दी उपन्यास के लय-ताल रहित परिदृश्य में एक सुखद हस्तक्षेप है। यह उपन्यास पुनः स्थापित करता है कि सिर्फ़ कहानी बता देना और प्रचलित विमर्शों की जुमलेबाज़ी का बघार डालते हुए ‘पोलिटिकली करेक्ट’ मोर्चे पर सीना तानकर खड़े हो जाना ही अच्छे उपन्यास की गारंटी नहीं है। हर उपन्यास को अपनी भाषा और संरचना में अपनी ही एक लय का आविष्कार करना पड़ता है, और यही वह चीज़ है जो उसे दशकों और सदियों तक पढ़नेवाले के दिलो-दिमाग़ का हिस्सा बनाती है।
यह उपन्यास सफलतापूर्वक इस ज़िम्मेदारी को अंजाम देता है। देश और काल के विभिन्न चरणों में आवाजाही करता हुआ यह उपन्यास स्मृतियों की पगडंडियों पर जैसे चहलक़दमी करते हुए, अपने पात्रों के भीतरी और बाहरी बदलावों की प्रक्रिया से गुज़रता है; उन सवालों से रूबरू होता है जो समय हमारे भीतर रोपता रहता है और उन यंत्रणाओं से भी जिनकी ज़िम्मेदारी तय करना कभी आसान नहीं होता।
किसी भी उम्दा रचना को लेकर यह कहना कभी सम्भव नहीं होता कि इसका उद्देश्य अमुक है, अथवा इससे हमें अमुक सन्देश प्राप्त होता है। वह हमारे ही जीवन का एक ज़्यादा उजले प्रकाश में बुना गया चित्र होता है जिससे हम जाने कितनी दिशाओं से रोशनी पाते हैं, और एक ज़्यादा खुली और रौशन जगह में अपना नया ठिकाना बनाते हैं।
ठिकानों और वक़्तों की उधेड़-बुन में रोशनी की किरचें पकड़ता हुआ यह उपन्यास पाठकों को निश्चय ही अनुभूति का एक नया धरातल देगा।
Devrani Jethani Ki Kahani
- Author Name:
P. Gauridutt
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- Description: Awating description for this book
Path Ka Daava
- Author Name:
Sharatchandra
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Description:
शरत् के अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास ‘पथेर दाबी’ का यह नया और प्रामाणिक अनुवाद एक बार फिर आत्ममन्थन और वैचारिक-सामाजिक बेचैनी की उस दुनिया में ले जाने को प्रस्तुत है, जो साठ-सत्तर साल पहले इस देश की आम आबोहवा थी। एक तरफ़ अंग्रेज़ सरकार का विरोध, उसी के साथ-साथ सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति का जोश और एक सजग राष्ट्र के रूप में पहचान अर्जित करने की व्यग्रता—यह सब उस दौर में साथ-साथ चल रहा था। शरत् का यह उपन्यास बार-बार बहसों में जाता है, अपने वक़्त को समझने की कोशिश करता है, और प्रतिरोध तथा अस्वीकार की एक निर्भीक और स्पष्टवादी मुद्रा को आकार देने का प्रयास करता है।
पहली बार सम्पूर्ण पाठ के साथ, सीधे बांग्ला से अनूदित यह उपन्यास भावुक-हृदय शरत् के सामाजिक और राजनीतिक सरोकारों और चिन्ताओं का एक व्यापक फलक प्रस्तुत करता है। तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों पर दो टूक बात करता यह उपन्यास एक लेखक के रूप में शरत् की निर्भीकता और स्पष्टवादिता का भी प्रमाण है। अंग्रेज़ी शासन और बंगाली समाज के बारे में उपन्यास के मुख्य पात्र डॉ. सव्यसाची की टिप्पणियों ने तब के प्रभु समाज को विकल कर दिया था, तो यह स्वाभाविक ही था। अपने ही रोज़मर्रापन में गर्क भारतीय समाज को लेकर जो आक्रोश बार-बार इस उपन्यास में उभरा है, वह मामूली फेरबदल के साथ आज भी हम अपने ऊपर लागू कर सकते हैं। उल्लेखनीय है डॉक्टर का यह वाक्य, “ऐसा नहीं होता, भारती, कि जो पुराना है वही पवित्र है। सत्तर साल का आदमी पुराना होने की वजह से दस साल के बच्चे से ज़्यादा पवित्र नहीं हो सकता।”
स्वतंत्रता संघर्ष की उथल-पुथल के दौर में भारतीय समाज के भीतर चल रही नैतिक और बौद्धिक बेचैनियों को प्रामाणिक ढंग से सामने लाता एक क्लासिक उपन्यास।
Aadividrohi
- Author Name:
Howard Fast
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Description:
ईसा पूर्व 73 के आसपास रोम में हुए ग़ुलाम-विद्रोह की यह महागाथा ‘आदिविद्रोही’ स्वतंत्रता, प्रेम, उम्मीद और जिजीविषा की अपूर्व कथा है। इस विद्रोह का नेतृत्व ग़ुलामों के परिवार में ही जन्मे स्पार्टकस ने किया था। यह वह दौर था जब ग़ुलामी की प्रथा अपने शिखर पर थी और मनुष्यता का विशाल हिस्सा मुट्ठीभर उच्च वर्ग की सेवा और मनोरंजन का साधन भी था। तत्कालीन रोम के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक जीवन में ग़ुलामी की यह प्रथा कैसे काम करती थी, इसका अनुमान तो इस ऐतिहासिक उपन्यास से होता ही है; ग़ुलामों का अपना जीवन कैसा था; ग़ुलाम पुरुषों और स्त्रियों को पराधीनता की मानसिक यंत्रणा के अलावा शारीरिक तौर पर भी क्या कुछ झेलना पड़ता था, यह भी इससे समझा जा सकता है।
लेकिन उपन्यास का केन्द्रीय पात्र स्पार्टकस ही है जिसे कापुआ के अमीर लानिस्ता लेन्टुलस बाटियाटस ने ग्लैडिएटर के रूप में तैयार किया और जिसने आगे जाकर अपनी और अपने साथी ग़ुलामों की आज़ादी के लिए एक ऐतिहासिक विद्रोह को अंजाम दिया। स्वाधीनता, समानता और मुक्त विवेक के पैरोकार हावर्ड फ़ास्ट ने अपनी कृतियों में हमेशा ही साधारण जन की अन्तर्निहित शक्ति को पहचानते हुए ऐसी कथाओं की रचना की जो मानवता के भविष्य को लेकर उम्मीद पैदा करती है।
1951 में लिखे गए इस उपन्यास के विषय में यह जानना भी रोचक होगा कि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के चलते उस समय अमेरिका के किसी प्रकाशक ने इसे छापने का साहस नहीं दिखाया था, लेखक ने इसे अपने परिचितों और पाठकों की सहायता से स्वयं प्रकाशित किया था। बाद में यह फ़िल्मों और टीवी धारावाहिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना।
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