Bachpan
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तोल्स्तोय विश्व-स्तर पर पढ़े जाने वाले रूसी लेखक हैं। वे दुनिया के उन कुछ लेखकों में शामिल है, जिन्हें हर भाषा और हर देश में अपना मानकर पढ़ा जाता है, जो सम्पूर्ण मानवता की सम्पत्ति हैं। यह छोटा-सा उपन्यास उनकी आरम्भिक रचना है, जिसमें उन्होंने अपनी दस वर्ष की आयु के बाद के कुछ वर्षों का वर्णन किया है। इसकी रचना उन्होंने तब की थी जब वे सत्ताईस वर्ष के थे। इस आत्मकथात्मक रचना में उन्होंने बालपन की सादगी, भोलेपन और दैनन्दिन जीवन की नाटकीयता को ख़ासतौर पर पकड़ा है। वय:संधि के मोड़ पर खड़े एक किशोर के मन की उथल-पुथल भी इसमें अभिव्यक्त हुई है और एक लेखक के रूप में तोल्स्तोय की प्रतिभा की संभावनाएँ भी उनकी इस रचना में सामने आई थीं जिन्हें उस समय के लेखकों ने विशिष्ट माना था। निर्मल वर्मा के अनुवादों की शृंखला में भी इस पुस्तक का स्थान बहुत शुरू में आता है। तोल्स्तोय की लेखन-शैली और संवेदना को हिन्दी में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मूल की बारीकियों को सम्प्रेषणीय ढंग से वहन किया है।
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तोल्स्तोय विश्व-स्तर पर पढ़े जाने वाले रूसी लेखक हैं। वे दुनिया के उन कुछ लेखकों में शामिल है, जिन्हें हर भाषा और हर देश में अपना मानकर पढ़ा जाता है, जो सम्पूर्ण मानवता की सम्पत्ति हैं।
यह छोटा-सा उपन्यास उनकी आरम्भिक रचना है, जिसमें उन्होंने अपनी दस वर्ष की आयु के बाद के कुछ वर्षों का वर्णन किया है। इसकी रचना उन्होंने तब की थी जब वे सत्ताईस वर्ष के थे। इस आत्मकथात्मक रचना में उन्होंने बालपन की सादगी, भोलेपन और दैनन्दिन जीवन की नाटकीयता को ख़ासतौर पर पकड़ा है। वय:संधि के मोड़ पर खड़े एक किशोर के मन की उथल-पुथल भी इसमें अभिव्यक्त हुई है और एक लेखक के रूप में तोल्स्तोय की प्रतिभा की संभावनाएँ भी उनकी इस रचना में सामने आई थीं जिन्हें उस समय के लेखकों ने विशिष्ट माना था।
निर्मल वर्मा के अनुवादों की शृंखला में भी इस पुस्तक का स्थान बहुत शुरू में आता है। तोल्स्तोय की लेखन-शैली और संवेदना को हिन्दी में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मूल की बारीकियों को सम्प्रेषणीय ढंग से वहन किया है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2024
- Weight
- 150 grams
- ISBN-13
- 9789360860356
- Pages
- 120
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 13 × 20 cm
- Language
- Hindi
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भारत और यूरोप दो ध्रुवान्तों का नाम है, एक-दूसरे से जुड़कर भी दो अलग-अलग वास्तविकताएँ। खींचकर या सिकोड़कर उन्हें मिलाया नहीं जा सकता। लेखन के प्रति ईमानदार रचनाकार के लिए इस वास्तविकता को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके बिना न सिर्फ़ युग-यथार्थ की पहचान असम्भव हो जाएगी बल्कि उसे उसकी विविधता के साथ रचना में अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकेगा, क्योंकि कोई भी लेखक सत्य की एकांगिता के सहारे यथार्थ का मुक्त द्रष्टा नहीं हो सकता। ‘भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र’ निर्मल जी के अपरम्परित सोच और निष्कर्षों को अपेक्षाकृत विकसित रूप में निरूपित करती है। भारत और यूरोप की अपनी-अपनी चिन्तन-परम्परा के मूल आधारों को व्याख्यायित करते हुए वे यहाँ उस रचनात्मकता की आलोचना करते हैं, जो अपने स्वाभाविक आधारों की उपेक्षा करती है। उनके अनुसार कला और साहित्य की प्रासंगिकता का सवाल अपनी सांस्कृतिक परम्परा से कटकर हल नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में उनके ही शब्दों को उद्धृत किया जाए तो “भारतीय परम्परा में कला और दुनिया के यथार्थ के बीच का सम्बन्ध हमेशा से ही कुछ पवित्र माना जाता रहा है। उसमें एक तरह की आवेगपूर्ण मांसलता रही है और मांसलता ऐन्द्रिक होने के बावजूद एक प्रकार की ईश्वरीय दिव्यता में आलोकित होती है...” इस पुस्तक में शामिल ‘भारतीय संस्कृति और राष्ट्र’, ‘भारतीय जीवन की निराशाएँ’, ‘क्या साहित्य समाज से कट चुका है?’ और ‘आलोचना के भटकाव’ जैसे प्रश्नाकुल निबन्ध हमारी आज की चिन्ताओं तक आते हैं।
Parinde
- Author Name:
Nirmal Verma
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परिन्दे निर्मल वर्मा का पहला कहानी-संग्रह है। सात कहानियों के इस संग्रह के पहले प्रकाशन (1958) के बाद जैसे हिन्दी कहानी को एक नया प्रस्थान मिला था। न सिर्फ़ इन कहानियों की भाषा के कारण, बल्कि इतिहास और समय के विशाल फलक पर मानव-नियति को समझने की एक नई दृष्टि और प्रविधि के कारण भी। नामवर सिंह ने ‘परिन्दे’ को नई कहानी धारा की पहली कहानी ठहराया था। उन्होंने सही ही कहा था कि हिन्दी भाषा के लिए जो काम कविता नहीं कर सकी, वह इन कहानियों के गद्य ने कर दिखाया। निर्मल जी के पात्र अपने वातावरण में इतने प्राकृतिक होते हैं कि वे यथार्थवादी कही जानेवाली कहानियों के विवरण-बहुल चरित्रों से ज़्यादा वास्तविक लगने लगते हैं। अपनी व्यक्ति-सत्ता में वे इतने सजीव और सम्भव लोग हैं कि उनका वर्णन करने के लिए कथाकार की भाषा को लम्बी-लम्बी डिटेल्स देने की जरूरत नहीं पड़ती, वह बस उन्हें उनकी जगह पर आलोकित भर कर देती है, और हम देखते हैं कि ये हमारे अपने किसी हिस्से के कितने करीब हैं। वे हमारी स्मृति का हिस्सा हो जाते हैं, जैसे अपनी जिन्दगी के कुछ महीन अनुभव। ‘परिन्दे’ में संकलित सभी कहानियों में मनुष्य की ऐतिहासिक अवस्थिति से उत्पन्न अस्तित्वगत प्रश्नों को, स्वतंत्रता और मुक्ति की उसकी आन्तरिक व्याकुलता को समग्र अभिव्यक्ति मिली है। रोज़मर्रा जीवन की परिस्थितियों और पात्रों को निर्मल वर्मा यहाँ इस तरह अंकित करते हैं कि उनके पीछे हमें मानव की जिजीविषा की सुदीर्घ यात्रा अपने तमाम प्रश्नों और सन्देहों के साथ आती दिखाई देती है।
Aadi, Ant Aur Aarambh
- Author Name:
Nirmal Verma
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‘भारत सिर्फ़ एक ‘नेशन स्टेट’ नहीं है। शताब्दियों से हमारे देश की सीमाएँ वे स्वागत-द्वार रही हैं जिनके भीतर आते ही उत्पीड़ित और त्रस्त जातियाँ अपने को सुरक्षित पाती रही हैं।’ यह लिखते हुए निर्मल वर्मा यह भी कहते हैं कि एक प्राचीन वट-वृक्ष की तरह भारतीय संस्कृति ने अपनी छाया तले अनेक समुदायों को ऐसा पवित्र स्पेस दिया जहाँ वे मुक्त हवा में साँस ले सकें। क्या आजादी के बाद हमने एक राष्ट्र के रूप में अपनी इस विराटता को छीज जाने दिया? ऐसे ही प्रश्नों पर मनन करते हुए इस पुस्तक के निबन्ध उस आत्म-उन्मूलन को भी रेखांकित करते हैं जिसके चलते आधुनिक मनुष्य अपने ही स्पेस में शरणार्थी जैसा हो चला है। अलग-अलग अवसरों पर लिखे गए इस पुस्तक के अधिकांश निबन्ध, भले ही उनके विषय कुछ भी हों, आत्म-उन्मूलन के इस ‘अन्धकार’ को कहीं-न-कहीं चिह्नित करते हैं। भारतीय बुद्धिजीवी की भूमिका, धर्म और साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और भारतीयता आदि विषयों के अलावा यहाँ संकलित निबन्ध हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े कुछ प्रश्नों को भी अपने दायरे में लेते हैं। चेकोस्लोवाकिया पर सोवियत सेना के आक्रमण और भारत के आपातकाल से जुड़े दो आलेख भी इस पुस्तक में शामिल हैं।
Jalti Jhadi
- Author Name:
Nirmal Verma
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नामवर सिंह के शब्दों में ‘...निर्मल ने यथार्थ की सीमा पार करने की कोशिश की है। उन्होंने तात्कालिक वर्तमान का अतिक्रमण करना चाहा है, कहानी-कला के दायरे से भी बाहर निकलने की कोशिश की है। यहाँ तक कि शब्द की अभेद्य दीवार को लाँघकर शब्द के पहले के ‘मौन जगत’ में प्रवेश करने का भी प्रयत्न किया है।’ मनुष्य के भीतर अवस्थित इस मौन को पकड़ने का प्रयास बार-बार निर्मल जी की कहानियों में दिखाई देता है जिसे वे जीवन के बीचोबीच ही सम्भव करते हैं। जीवन के भावनात्मक जोख़िम से भरे इलाक़ों में मनुष्य की सघन और सूक्ष्म अनुभूतियों को प्रकाशित करनेवाली इस संग्रह की कहानियाँ अकेलेपन, अवसाद, अजनबीयत और आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं का अन्वेषण दुर्लभ चित्रात्मकता और प्रामाणिकता के साथ करती हैं। सन् 1965 में पहली बार प्रकाशित इस संग्रह की ज़्यादातर कहानियाँ यूरोप की पृष्ठभूमि में लिखी गई हैं जिनमें ‘लन्दन की एक रात’, ‘अन्तर’ और ‘जलती झाड़ी’ जैसी प्रसिद्ध कहानियाँ भी शामिल हैं। इसी संग्रह में ‘माया दर्पण’ शीर्षक कहानी भी है जिस पर समानान्तर सिनेमा के चर्चित निर्देशक कुमार शाहनी ने इसी नाम से फ़िल्म बनाई थी जिसे 1973 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
Beech Bahas Mein
- Author Name:
Nirmal Verma
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बीच बहस में निर्मल वर्मा की चार चर्चित कहानियों का संकलन है। इन चारों ही कहानियों में वे सम्बन्धों की पारम्परिक भारतीय अवधारणा और पश्चिम में इन सम्बन्धों के बदलते स्वरूप का चित्रण करते हैं। व्यक्ति की स्वतंत्रता, जीने के अपने ढंग को चुनने की आजादी, नैतिक वर्जनाओं से टकराहट, मानवीय जवाबदेही का गहरा बोध और इन सबका परस्पर संघर्ष इन कहानियों की आधारभूत भाव-भूमि है। यह निर्मल जी का चौथा संग्रह है जिसका प्रथम प्रकाशन 1973 में हुआ था। इसमें भूमिका की तरह उनका एक संक्षिप्त आलेख भी शामिल है—‘अपने देश वापसी’। विदेश-प्रवास के उपरान्त भारत वापसी पर वे जैसे अपने समाज और परिवेश को देखते हैं उसका अत्यन्त विचारोत्तेजक विवेचन वे इसमें करते हैं। मिसाल के तौर पर ये पंक्तियाँ—“ग़रीबी और दरिद्रता में गहरा अन्तर है। भारत लौटने पर जो चीज़ सबसे तीखे ढंग से आँखों में चुभती है, वह ग़रीबी नहीं (ग़रीबी पश्चिम में भी है), बल्कि सुसंस्कृत वर्ग की दरिद्रता। एक अजीब छिछेरापन, जिसका ग़रीबी के आत्मसम्मान से दूर का भी रिश्ता नहीं।” ‘बीच बहस में’ शीर्षक कहानी पारिवारिक रिश्तों के भीतर फैलती सम्बन्धहीनता को जितनी तीव्रता के साथ रेखांकित करती है, वह विस्मयकारी है। इसी तरह अन्य कहानियाँ भी अपने-अपने परिवेश में सामाजिक यथार्थ के उस पक्ष पर प्रकाश डालती हैं, जिसका सामना तो कुछ व्यक्ति कर रहे होते हैं, लेकिन उसकी जड़ें समाज में दूर तक फैली होती है।
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