Bachpan
(0)
Author:
Leo Tolstoy, Nirmal VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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तोल्स्तोय विश्व-स्तर पर पढ़े जाने वाले रूसी लेखक हैं। वे दुनिया के उन कुछ लेखकों में शामिल है, जिन्हें हर भाषा और हर देश में अपना मानकर पढ़ा जाता है, जो सम्पूर्ण मानवता की सम्पत्ति हैं।</p> <p>यह छोटा-सा उपन्यास उनकी आरम्भिक रचना है, जिसमें उन्होंने अपनी दस वर्ष की आयु के बाद के कुछ वर्षों का वर्णन किया है। इसकी रचना उन्होंने तब की थी जब वे सत्ताईस वर्ष के थे। इस आत्मकथात्मक रचना में उन्होंने बालपन की सादगी, भोलेपन और दैनन्दिन जीवन की नाटकीयता को ख़ासतौर पर पकड़ा है। वय:संधि के मोड़ पर खड़े एक किशोर के मन की उथल-पुथल भी इसमें अभिव्यक्त हुई है और एक लेखक के रूप में तोल्स्तोय की प्रतिभा की संभावनाएँ भी उनकी इस रचना में सामने आई थीं जिन्हें उस समय के लेखकों ने विशिष्ट माना था।</p> <p>निर्मल वर्मा के अनुवादों की शृंखला में भी इस पुस्तक का स्थान बहुत शुरू में आता है। तोल्स्तोय की लेखन-शैली और संवेदना को हिन्दी में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मूल की बारीकियों को सम्प्रेषणीय ढंग से वहन किया है।
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तोल्स्तोय विश्व-स्तर पर पढ़े जाने वाले रूसी लेखक हैं। वे दुनिया के उन कुछ लेखकों में शामिल है, जिन्हें हर भाषा और हर देश में अपना मानकर पढ़ा जाता है, जो सम्पूर्ण मानवता की सम्पत्ति हैं।</p>
<p>यह छोटा-सा उपन्यास उनकी आरम्भिक रचना है, जिसमें उन्होंने अपनी दस वर्ष की आयु के बाद के कुछ वर्षों का वर्णन किया है। इसकी रचना उन्होंने तब की थी जब वे सत्ताईस वर्ष के थे। इस आत्मकथात्मक रचना में उन्होंने बालपन की सादगी, भोलेपन और दैनन्दिन जीवन की नाटकीयता को ख़ासतौर पर पकड़ा है। वय:संधि के मोड़ पर खड़े एक किशोर के मन की उथल-पुथल भी इसमें अभिव्यक्त हुई है और एक लेखक के रूप में तोल्स्तोय की प्रतिभा की संभावनाएँ भी उनकी इस रचना में सामने आई थीं जिन्हें उस समय के लेखकों ने विशिष्ट माना था।</p>
<p>निर्मल वर्मा के अनुवादों की शृंखला में भी इस पुस्तक का स्थान बहुत शुरू में आता है। तोल्स्तोय की लेखन-शैली और संवेदना को हिन्दी में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मूल की बारीकियों को सम्प्रेषणीय ढंग से वहन किया है।
Book Details
-
ISBN9789360860356
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कुछ समीक्षकों ने इसे मृत्यु का आख्यान कहा, लेकिन यह ठीक-ठीक वही नहीं है, नश्वरता का एक गहरा अहसास इस उपन्यास के केन्द्र में ज़रूर है। जीवन के एक विशिष्ट मोड़ पर आकर ठहरे हुए इसके चरित्र एक तरह से अपने भीतर की यात्रा पर निकले हैं और इस तरह जिजीविषा और मृत्यु की अपरिहार्यता का अन्वेषण करते हुए उस जीवन से साक्षात्कार करते हैं जो जिया जा चुका है, लेकिन अभी भी स्मृतियों के रूप में सजीव है।
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परिन्दे निर्मल वर्मा का पहला कहानी-संग्रह है। सात कहानियों के इस संग्रह के पहले प्रकाशन (1958) के बाद जैसे हिन्दी कहानी को एक नया प्रस्थान मिला था। न सिर्फ़ इन कहानियों की भाषा के कारण, बल्कि इतिहास और समय के विशाल फलक पर मानव-नियति को समझने की एक नई दृष्टि और प्रविधि के कारण भी।
नामवर सिंह ने ‘परिन्दे’ को नई कहानी धारा की पहली कहानी ठहराया था। उन्होंने सही ही कहा था कि हिन्दी भाषा के लिए जो काम कविता नहीं कर सकी, वह इन कहानियों के गद्य ने कर दिखाया।
निर्मल जी के पात्र अपने वातावरण में इतने प्राकृतिक होते हैं कि वे यथार्थवादी कही जानेवाली कहानियों के विवरण-बहुल चरित्रों से ज़्यादा वास्तविक लगने लगते हैं। अपनी व्यक्ति-सत्ता में वे इतने सजीव और सम्भव लोग हैं कि उनका वर्णन करने के लिए कथाकार की भाषा को लम्बी-लम्बी डिटेल्स देने की जरूरत नहीं पड़ती, वह बस उन्हें उनकी जगह पर आलोकित भर कर देती है, और हम देखते हैं कि ये हमारे अपने किसी हिस्से के कितने करीब हैं। वे हमारी स्मृति का हिस्सा हो जाते हैं, जैसे अपनी जिन्दगी के कुछ महीन अनुभव।
‘परिन्दे’ में संकलित सभी कहानियों में मनुष्य की ऐतिहासिक अवस्थिति से उत्पन्न अस्तित्वगत प्रश्नों को, स्वतंत्रता और मुक्ति की उसकी आन्तरिक व्याकुलता को समग्र अभिव्यक्ति मिली है। रोज़मर्रा जीवन की परिस्थितियों और पात्रों को निर्मल वर्मा यहाँ इस तरह अंकित करते हैं कि उनके पीछे हमें मानव की जिजीविषा की सुदीर्घ यात्रा अपने तमाम प्रश्नों और सन्देहों के साथ आती दिखाई देती है।
Cheeron Par Chandani
- Author Name:
Nirmal Verma
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निर्मल वर्मा कहते हैं, ‘अकसर सोचता हूँ, कौन-सा सही तरीक़ा है, किसी देश के जातीय गुण जानने का! शायद बहुत छोटी बातों से, जिनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है, जिन्हें नज़रअन्दाज़ किया जा सकता है’—निर्मल वर्मा का यात्री-मन शहरों, देशों, समाजों, ऐतिहासिक स्थलों, म्यूज़ियमों, पबों और बारों में किसी भी देश के भूत-भविष्य और वर्तमान को ऐसी ही छोटी-छोटी बातों से जानता और पाठक तक पहुँचाता है। शायद इसीलिए उनके यात्रा-विवरणों को पढ़ना न थकाता है, न बोझिल करता है, उलटे हम जैसे अपने ऊपर ठहरी अपने दैनन्दिन जीवन की थकान को उनके गद्य के प्रवाह में तिरोहित करते जाते हैं; हल्के और प्रकाशित महसूस करते हुए।
‘चीड़ों पर चाँदनी’ (प्रथम प्रकाशन 1964) न सिर्फ़ निर्मल वर्मा के उत्कृष्ट गद्य का नमूना है, बल्कि एक यात्रा-वृत्तान्त के रूप में भी यह पुस्तक एक मानक का दर्ज़ा हासिल कर चुकी है। जिन यात्राओं का वर्णन इस पुस्तक में उन्होंने किया है, वे सिर्फ़ बाहर की यात्राएँ नहीं हैं, न सिर्फ़ उस क्षण तक सीमित जब वे की जा रही थीं—ये भीतर की यात्राएँ भी हैं, और स्मृतियों की भी, इतिहास की भी। उन शहरों और सड़कों की यात्राएँ जिन पर कहीं अतीत के विध्वंसों के अवशेष आपको चौंका देते हैं, अवसाद से भर देते हैं तो कहीं महान लेखकों, चित्रकारों, कलाकारों की कालातीत मौजूदगी उम्मीद से भर देती है, जिन्होंने अपने समय में मनुष्य के लिए दूर तक जानेवाली राहें बनाई थीं।
कहानी, निबन्ध, डायरी और यात्रा-वृत्त—इन सब विधाओं का परिपाक इस पुस्तक में हुआ है। इन यात्राओं से गुज़रते हुए हम एक से ज्यादा स्तरों पर समृद्ध होते हैं।
Bharat Aur Europe : Pratishruti Ke Kshetra
- Author Name:
Nirmal Verma
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भारत और यूरोप दो ध्रुवान्तों का नाम है, एक-दूसरे से जुड़कर भी दो अलग-अलग वास्तविकताएँ। खींचकर या सिकोड़कर उन्हें मिलाया नहीं जा सकता। लेखन के प्रति ईमानदार रचनाकार के लिए इस वास्तविकता को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके बिना न सिर्फ़ युग-यथार्थ की पहचान असम्भव हो जाएगी बल्कि उसे उसकी विविधता के साथ रचना में अभिव्यक्त भी नहीं किया जा सकेगा, क्योंकि कोई भी लेखक सत्य की एकांगिता के सहारे यथार्थ का मुक्त द्रष्टा नहीं हो सकता।
‘भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र’ निर्मल जी के अपरम्परित सोच और निष्कर्षों को अपेक्षाकृत विकसित रूप में निरूपित करती है। भारत और यूरोप की अपनी-अपनी चिन्तन-परम्परा के मूल आधारों को व्याख्यायित करते हुए वे यहाँ उस रचनात्मकता की आलोचना करते हैं, जो अपने स्वाभाविक आधारों की उपेक्षा करती है। उनके अनुसार कला और साहित्य की प्रासंगिकता का सवाल अपनी सांस्कृतिक परम्परा से कटकर हल नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में उनके ही शब्दों को उद्धृत किया जाए तो “भारतीय परम्परा में कला और दुनिया के यथार्थ के बीच का सम्बन्ध हमेशा से ही कुछ पवित्र माना जाता रहा है। उसमें एक तरह की आवेगपूर्ण मांसलता रही है और मांसलता ऐन्द्रिक होने के बावजूद एक प्रकार की ईश्वरीय दिव्यता में आलोकित होती है...”
इस पुस्तक में शामिल ‘भारतीय संस्कृति और राष्ट्र’, ‘भारतीय जीवन की निराशाएँ’, ‘क्या साहित्य समाज से कट चुका है?’ और ‘आलोचना के भटकाव’ जैसे प्रश्नाकुल निबन्ध हमारी आज की चिन्ताओं तक आते हैं।
Jalti Jhadi
- Author Name:
Nirmal Verma
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नामवर सिंह के शब्दों में ‘...निर्मल ने यथार्थ की सीमा पार करने की कोशिश की है। उन्होंने तात्कालिक वर्तमान का अतिक्रमण करना चाहा है, कहानी-कला के दायरे से भी बाहर निकलने की कोशिश की है। यहाँ तक कि शब्द की अभेद्य दीवार को लाँघकर शब्द के पहले के ‘मौन जगत’ में प्रवेश करने का भी प्रयत्न किया है।’
मनुष्य के भीतर अवस्थित इस मौन को पकड़ने का प्रयास बार-बार निर्मल जी की कहानियों में दिखाई देता है जिसे वे जीवन के बीचोबीच ही सम्भव करते हैं। जीवन के भावनात्मक जोख़िम से भरे इलाक़ों में मनुष्य की सघन और सूक्ष्म अनुभूतियों को प्रकाशित करनेवाली इस संग्रह की कहानियाँ अकेलेपन, अवसाद, अजनबीयत और आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं का अन्वेषण दुर्लभ चित्रात्मकता और प्रामाणिकता के साथ करती हैं।
सन् 1965 में पहली बार प्रकाशित इस संग्रह की ज़्यादातर कहानियाँ यूरोप की पृष्ठभूमि में लिखी गई हैं जिनमें ‘लन्दन की एक रात’, ‘अन्तर’ और ‘जलती झाड़ी’ जैसी प्रसिद्ध कहानियाँ भी शामिल हैं।
इसी संग्रह में ‘माया दर्पण’ शीर्षक कहानी भी है जिस पर समानान्तर सिनेमा के चर्चित निर्देशक कुमार शाहनी ने इसी नाम से फ़िल्म बनाई थी जिसे 1973 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
Beech Bahas Mein
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Nirmal Verma
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बीच बहस में निर्मल वर्मा की चार चर्चित कहानियों का संकलन है। इन चारों ही कहानियों में वे सम्बन्धों की पारम्परिक भारतीय अवधारणा और पश्चिम में इन सम्बन्धों के बदलते स्वरूप का चित्रण करते हैं।
व्यक्ति की स्वतंत्रता, जीने के अपने ढंग को चुनने की आजादी, नैतिक वर्जनाओं से टकराहट, मानवीय जवाबदेही का गहरा बोध और इन सबका परस्पर संघर्ष इन कहानियों की आधारभूत भाव-भूमि है।
यह निर्मल जी का चौथा संग्रह है जिसका प्रथम प्रकाशन 1973 में हुआ था। इसमें भूमिका की तरह उनका एक संक्षिप्त आलेख भी शामिल है—‘अपने देश वापसी’। विदेश-प्रवास के उपरान्त भारत वापसी पर वे जैसे अपने समाज और परिवेश को देखते हैं उसका अत्यन्त विचारोत्तेजक विवेचन वे इसमें करते हैं। मिसाल के तौर पर ये पंक्तियाँ—“ग़रीबी और दरिद्रता में गहरा अन्तर है। भारत लौटने पर जो चीज़ सबसे तीखे ढंग से आँखों में चुभती है, वह ग़रीबी नहीं (ग़रीबी पश्चिम में भी है), बल्कि सुसंस्कृत वर्ग की दरिद्रता। एक अजीब छिछेरापन, जिसका ग़रीबी के आत्मसम्मान से दूर का भी रिश्ता नहीं।”
‘बीच बहस में’ शीर्षक कहानी पारिवारिक रिश्तों के भीतर फैलती सम्बन्धहीनता को जितनी तीव्रता के साथ रेखांकित करती है, वह विस्मयकारी है। इसी तरह अन्य कहानियाँ भी अपने-अपने परिवेश में सामाजिक यथार्थ के उस पक्ष पर प्रकाश डालती हैं, जिसका सामना तो कुछ व्यक्ति कर रहे होते हैं, लेकिन उसकी जड़ें समाज में दूर तक फैली होती है।
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