Mahabhiyog
(0)
Author:
Anjali DeshpandePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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‘महाभियोग’ भोपाल गैस कांड और उसके बाद सालों तक इस भयावह त्रासदी को लेकर समाज, देश, सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रेस और न्याय व्यवस्था के चक्रव्यूह में जो चला, उसकी कहानी है। तथ्यपरकता और सघनता में इतनी वास्तविक कि भ्रम होता है कि कहीं लेखक इसमें ख़ुद भी तो मौजूद नहीं, और ये सारे चरित्र भी, जो एक तरफ़ भारत के साधारण जन-गण के जीवन और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ़ अपने जीवन में भी सत्ता के परम्परा-प्रसूत वर्चस्व से जूझ रहे हैं। यह सामूहिक लेकिन बहुस्तरीय संघर्षशीलता ही इस विराट कथा की नायिका है।</p> <p>नब्बे और उसके बाद जन्मे लोग, बहुत सम्भव है कि इस घटना के बारे में बहुत मूर्त ढंग से कुछ न सोच पाते हों, उनके लिए यह उपन्यास सिर्फ़ इसलिए भी ज़रूरी है कि शायद पहली बार किसी उपन्यास में वे विवरण आए हैं, जो उन्हें उस त्रासदी की भयावहता को महसूस करने में मदद कर सकते हैं। साथ ही उस पूरे वैचारिक, सामाजिक और प्रशासनिक-न्यायिक विमर्श को जानने में भी, जो बरसों चलता रहा।</p> <p>यह उपन्यास समाज और सरकार के बीच स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका को लेकर भी कुछ महत्त्वपूर्ण उद्घाटित करता है।
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‘महाभियोग’ भोपाल गैस कांड और उसके बाद सालों तक इस भयावह त्रासदी को लेकर समाज, देश, सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रेस और न्याय व्यवस्था के चक्रव्यूह में जो चला, उसकी कहानी है। तथ्यपरकता और सघनता में इतनी वास्तविक कि भ्रम होता है कि कहीं लेखक इसमें ख़ुद भी तो मौजूद नहीं, और ये सारे चरित्र भी, जो एक तरफ़ भारत के साधारण जन-गण के जीवन और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ़ अपने जीवन में भी सत्ता के परम्परा-प्रसूत वर्चस्व से जूझ रहे हैं। यह सामूहिक लेकिन बहुस्तरीय संघर्षशीलता ही इस विराट कथा की नायिका है।</p>
<p>नब्बे और उसके बाद जन्मे लोग, बहुत सम्भव है कि इस घटना के बारे में बहुत मूर्त ढंग से कुछ न सोच पाते हों, उनके लिए यह उपन्यास सिर्फ़ इसलिए भी ज़रूरी है कि शायद पहली बार किसी उपन्यास में वे विवरण आए हैं, जो उन्हें उस त्रासदी की भयावहता को महसूस करने में मदद कर सकते हैं। साथ ही उस पूरे वैचारिक, सामाजिक और प्रशासनिक-न्यायिक विमर्श को जानने में भी, जो बरसों चलता रहा।</p>
<p>यह उपन्यास समाज और सरकार के बीच स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका को लेकर भी कुछ महत्त्वपूर्ण उद्घाटित करता है।
Book Details
-
ISBN9788126728008
-
Pages304
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अपनी रचनात्मक ज़मीन और लेखकीय दायित्व की तलाश करते हुए एक ईमानदार लेखक प्रायः स्वयं को भी रचने की कोशिश करता है। अनुपस्थित रहकर भी वह उसमें उपस्थित रहता है; और सहज ही उस देश-काल को लाँघ जाता है जो उसे आकार देता रहा है। समकालीन कथाकारों में संजीव की मौजूदगी को कुछ इसी तरह देखा जाता है। आकस्मिक नहीं कि हिन्दी की यथार्थवादी कथा-परम्परा को उन्होंने लगातार आगे बढ़ाया है।
‘सूत्रधार’ संजीव का नया उपन्यास है, और उनकी शोधपरक कथा-यात्रा में नितान्त चुनौतीपूर्ण भी। केन्द्र में हैं भोजपुरी गीत-संगीत और लोकनाट्य के अनूठे सूत्रधार भिखारी ठाकुर। वही भिखारी ठाकुर, जिन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा था और उनके अभिनन्दनकर्ताओं ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। लेकिन भिखारी ठाकुर क्या सिर्फ़ यही थे? निश्चय ही नहीं, क्योंकि कोई भी एक बड़ा किसी दूसरे बड़े के समकक्ष नहीं हो सकता। और यों भी भिखारी का बड़प्पन उनके सहज सामान्य होने में निहित था, जिसे इस उपन्यास में संजीव ने उन्हीं के आत्मद्वन्द्व से गुज़रते हुए चित्रित किया है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी धूपछाँही कथा-यात्रा है, जिसे हम भिखारी जैसे लीजेंडरी लोक कलाकार और उनके संगी-साथियों के अन्तर्बाह्य संघर्ष को महसूस करते हुए करते हैं। काल्पनिक अतिरेक की यहाँ कोई गुंजाइश नहीं। न कोई ज़रूरत। ज़रूरत है तो तथ्यों के बावजूद रचनात्मकता को लगातार साधे रखने की, और संजीव को इसमें महारत हासिल है। यही कारण है कि ‘सूत्रधार’ की शक्ल में उतरे भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज में रचे-बसे लोकराग और लोकचेतना को व्यक्त ही नहीं करते, उद्दीप्त भी करते हैं। उनकी लोकरंजकता भी गहरे मूल्यबोध से सम्बलित है; और उसमें न सिर्फ़ उनकी, बल्कि हमारे समाज और इतिहास की बहुविध विडम्बनाएँ भी समाई हुई हैं। अपने तमाम तरह के शिखरारोहण के बावजूद भिखारी अगर अन्त तक भिखारी ही बने रहते हैं तो यह यथार्थ आज भी हमारे सामने एक बड़े सवाल की तरह मौजूद है।
कहने की आवश्यकता नहीं कि देश, काल, पात्र की जीवित-जाग्रत् पृष्ठभूमि पर रचा गया यह जीवनीपरक उपन्यास आज के दलित-विमर्श को भी एक नई ज़मीन देता है। तथ्यों से बँधे रहकर भी संजीव ने एक बड़े कलाकार से उसी के अनुरूप रससिक्त और आत्मीय संवाद किया है।
—रामकुमार कृषक
Dastan-E-Laapata
- Author Name:
Manzoor Ehtesham
- Book Type:

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किसी भी व्यक्ति के निजी और आत्मीय संसार में उसके समय की राजनीति और हालात किस तरह सेंध लगा सकते हैं, इसका एक बेचैन कर देनेवाला दस्तावेज़ है, सुपरिचित कथाकार मंज़ूर एहतेशाम का बहुचर्चित उपन्यास ‘दास्तान-ए-लापता’।
दरअसल संसार लोगों का ही नहीं, ‘लापताओं’ का भी मंच है। अन्य प्रजातियों की तरह यहाँ ‘लापता’ भी जन्म लेते हैं, बड़े होते हैं और आख़िर थककर अपने अन्त को प्राप्त होते हैं।
‘दास्तान-ए-लापता’ दास्तान है ज़मीर अहमद ख़ान की, जिसने ज़िन्दगी की शुरुआत में बहुत विश्वास से कहा था, ‘‘मुझे सच्चा प्यार चाहिए, बस।’’ और यह भी कि ‘‘मैं उसे हासिल करके दिखाऊँगा!’’ ‘दास्तान-ए-लापता’ इस क्रूर दुनिया में उसके बड़े होने का दस्तावेज़ है। ‘दास्तान-ए-लापता’ ज़मीर अहमद ख़ान सहित उन सब लोगों की कहानी है जो जाने-अनजाने किसी परिवार या व्यवस्था की परिधि से छूट जाते हैं। ‘दास्तान-ए-लापता’ उन लोगों की कथा है जो चाहते हुए भी अन्धी दौड़ का हिस्सा नहीं बन पाते, जो हर बार अपने अन्तर्विरोधों के साथ सिर्फ़ अपने भीतरी तहख़ानों में उतर पाते हैं। यह उन लोगों की कथा है जो ज़िन्दगी की हर असफलता में अतीत के शाप सुनते हैं, जो अपनी छोटी-छोटी बेईमानियों को आत्मा में पैबन्द की तरह लगाकर चलते हैं और एक दिन सबके देखते-देखते अपने भीतर लापता हो जाते हैं।
कथानक में पीड़ा की एक धुँधली लकीर बराबर चलती है। अपने देश-काल से असुविधाजनक सवाल पूछते-पूछते यह लकीर मंज़ूर एहतेशाम के पिछले उपन्यास ‘सूखा बरगद’ से ‘दास्तान-ए-लापता’ तक अनायास खिंच आई है। हालाँकि यहाँ पाठक को भ्रमित करने के लिए सांसारिक घटनाक्रम है, परिवारों और व्यक्तियों का सनकीपन है, फिर भी लेखक का कोई भी शिल्पगत प्रयोग इस लकीर को पूरी तरह ढक नहीं पाता।
एक तरह से ‘दास्तान-ए-लापता’ मंज़ूर एहतेशाम के पिछले उपन्यास ‘सूखा बरगद से’ प्रस्थान है। जहाँ इससे पहले लेखक का सरोकार एक अल्पसंख्यक समाज था, वहाँ इस बार अल्प या बहुसंख्यक की परिभाषा को बेमानी करता एक अकेला आदमी है, जो परिधि से बाहर की ओर चल निकला है, एक क्रमशः अदृश्य होता आदमी, जो लोप होने से पहले इस कथानक के परिदृश्य में अपने पदचिह्न छोड़ता है, अपनी सुप्त पीड़ा के साथ, शायद आख़िरी बार...
Uska Bachpan
- Author Name:
Krishna Baldev Vaid
- Book Type:

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‘उसका बचपन’ एक महत्त्वपूर्ण और असाधारण उपन्यास है और अपने शिल्प और शैली के आधार पर हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। इसमें एक संवेदनशील बच्चे के दृष्टिकोण से एक निर्धन परिवार के रोज़मर्रा के जीवन और जोखिम को अनेक दृश्य खंडों में उभारा गया है। इसका छोटा-सा संसार हमें विचलित भी करता है और एक गहरा आनन्द भी देता है।
यथार्थ से लबालब होते हुए भी यह उपन्यास यथार्थवादी उपन्यासों की कई पुरानी लकीरों के इधर-उधर होता हुआ आगे बढ़ता है। इसमें कोई एक कहानी नहीं, कोई बनावटी प्लाट नहीं। इसमें कृष्ण बलदेव वैद ने शब्दों का कहीं अपव्यय नहीं किया, न ही वे अतिभावुकता के शिकार हुए हैं। शिल्पगत आगाही और भाषागत ताज़गी के लिहाज़ से श्री वैद का यह पहला उपन्यास एक आदर्श प्रस्तुत करता है।
1957 में अपने प्रथम प्रकाशन के समय ‘उसका बचपन’ हिन्दी साहित्य की एक विशिष्ट घटना थी। इस संस्करण से उस घटना की याद ताज़ा हो जाएगी, ऐसी हमारी आशा है।
Nai Paudh
- Author Name:
Nagarjun
- Book Type:

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‘नई पौध’ की कहानी अति सरल है। गाँव के बड़े-बूढ़ों की ज़िद तोड़कर तरुणों ने एक लड़की के जीवन को चौपट होने से बचा लिया—बे-मेल शादियों की यह समस्या हमारे ग्रामीण समाज में आज भी विकराल रूप में मौजूद है। इस समस्या का विप्लवी समाधान नई पीढ़ी ही दे सकती है...
नागार्जुन का यह उपन्यास, आकार में लघु होने पर भी, प्रभाव के लिहाज़ से बड़ा ही व्यापक साबित हुआ है...प्रकृति की मनोरम पट-भूमि पर कथाकार ने घटनाओं का मोहक ताना-बाना सजाया है। विशिष्ट आलोचकों ने नागार्जुन की इस कथाकृति की भूरि-भूरि सराहना की है और साधारण पाठकों ने भी इसे बेहद पसन्द किया है।
Gramsevika
- Author Name:
Amarkant
- Book Type:

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दमयन्ती के दिल में एक आग जल रही थी। वह साहस, संघर्ष और कर्मठता का जीवन अपनाकर अपने दु:ख, निराशा और अपमान का बदला उस व्यक्ति से लेना चाहती थी, जिसने दहेज के लालच में उसे ठुकरा दिया था।
उस दिन वह ख़ुशी से चहक उठी, जब उसे नियुक्ति-पत्र मिला। उसकी ख़ुशी का एक यह भी कारण था कि उसे गाँव की औरतों की सेवा करने का मौक़ा मिला था। जब पढ़ती थी, तो उसकी यह इच्छा रही थी कि वह अपने देश के लिए, समाज के लिए कुछ करे। आज उसका सपना साकार होने चला था। परन्तु गाँव में जाकर उसे कितना कटु अनुभव हुआ था!
उस गाँव में न कोई स्कूल था और न ही अस्पताल। रूढ़िवादी संस्कारों और अन्धविश्वासों की गिरफ़्त में छटपटाते लोग थे, जिन्हें पढ़ाई-लिखाई से नफ़रत थी। उनका विश्वास था कि पढ़ाई-लिखाई से ग़रीबी आएगी। भला अपने बच्चों को वे भिखमंगा क्यों बनाएँ? भगवान ने सबको हाथ-पैर दिए हैं। टोकरी बनाकर शहर में बेचो और पेट का गड्ढा भरो।
इस अज्ञानता के कारण गाँव के ग़रीब लोग जहाँ धर्म के ठेकेदारों के क्रिया-कलापों से आक्रान्त थे, वहीं जोंक की तरह ख़ून चूसनेवाले सूदख़ोरों के जुल्मों से उत्पीड़ित भी।
इसके बावजूद दमयन्ती ने हार नहीं मानी। अपने लक्ष्य की राह को प्रशस्त करने की दिशा में जुटी रही—कि अचानक हरिचरन के प्रवेश ने ऐसी उथल-पुथल मचाई कि उसके जीवन की दिशा ही बदल गई।
Vaijyanti : Vol. 1-2
- Author Name:
Chitra Chaturvedi 'Kartika'
- Book Type:

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‘वैजयंती’ श्रीकृष्ण के जीवन, कर्म, आदर्शों, विचारों और अलौकिक प्रेम की रसभीगी अनुपम गाथा है। ग्रामीण परिवेश में पले कृष्ण का विकास विविध दिशाओं में होता है और वह शीघ्र ही एक अपूर्व रंग-बिरंगे बहुआयामी व्यक्तित्व से सम्पन्न हो जाता है। ‘वैजयंती’ में ब्रज की सोंधी सुवास और छाछ है, वेणुवादन, आनन्द और महारास है। किन्तु रह-रहकर श्रीकृष्ण के अन्तर में एक अजानी-सी पुकार उठती है, आह्वान करती है, चल पड़ने को। कुछ विशिष्ट करने को। और श्रीकृष्ण जननायक बन चल पड़ते हैं क्रान्ति का शंखनाद करके कंस के अधिनायक तंत्र का मूलोच्छेदन करने। राधा नहीं रोकती। वह बाधा नहीं, राधा है।
प्रथम खंड में स्वप्नलोकीय कोमलता और माधुरी है, गीत, प्रीति और लालित्य के मध्य शस्त्रों की झनझनाहट है। वहीं द्वितीय खंड में क्रूर यथार्थ है और टंकारों तथा हुंकारों के मध्य प्रेम की मृदुल फुहारें और प्रीति-विह्वल मन की गुहारें हैं।
चारों ओर फैली अराजकता, अनैतिकता और स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध कर्मयोगी का संघर्ष चलता है और उनकी वैजयंती पताका सदा फहराती रहती है। वैजयंती में पाठक पाएँगे राधा, गोप-गोपी, रुक्मिणी, सत्यभामा, जांबवती तथा सुभद्रा को एक अनूठे ही रंग में। पाठक यह भी पाएँगे अर्जुन, विदुर, भीष्म, कर्ण, संजय और उद्धव को अनूठे स्वरूप में। भीष्म और विदुर को कैसे ज्ञात हुआ था कि कर्ण कुन्ती का पुत्र है? अपने पौत्रवत् श्रीकृष्ण को देखते ही भीष्म का मुखमंडल खिल क्यों पड़ता है? अर्जुन में ऐसा क्या है जो श्रीकृष्ण उस पर मुग्ध हैं? उद्धव में क्या विशेषता है जो उन्हें ही कृष्ण अपनी थाती सौंपते हैं? संजय और धनंजय ही गीता सुनने के अधिकारी क्यों हुए?
और फिर....राधा का क्या हुआ?
‘वैजयंती’ में कुछ नवीन न हो तो भी कुछ अपने आप अलग और विशिष्ट अवश्य है।
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