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‘परछाइयाँ’ आत्म-कथा नहीं, जीवन-गाथा है। इसमें जीवन के अनुभवों और निष्कर्षों को अनावृत्त किया गया है। इस पुस्तक की पंक्तियों में पाठक स्वयं अपने जीवन में घटित घटनाओं की अनुभूति करता चलता है। मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों का सूक्ष्मता और सरलता से किया गया विश्लेषण श्रीमती महिमा मेहता के संवेदनशील मन को भी उजागर कर देता है। जीवन में संघर्ष क्या होता है और उससे जूझने के लिए सकारात्मक एवं आस्थावादी दृष्टि कैसी भूमिका निभाती है, इसका दिग्दर्शन कराती है ‘परछाइयाँ’। इन परछाइयों में जो चित्र उभरते चलते हैं उनको कुशल चितेरे की भाँति उकेरने में लेखिका अत्यन्त सफल रही है। इस संस्मरणात्मक उपन्यास में केवल घटनाएँ नहीं, अपने समय की परिक्रमा है। वह जो बीत गया है, वह अब नहीं लौटता, लेकिन स्मृतियों में बस जाता है। प्रसाद जी के ‘आँसू’ की रचना विकल वेदना के उभरने पर सम्भव हुई थी, लेकिन यह संस्मरणात्मक उपन्यास जीवन के एकाकीपन का सहचर है। महिमा जी गद्य लेखन करती हैं और सहज-सरल भाषा में अपने संवेगों को सम्प्रेषित करती हैं। वे ऐसे समय में लिख रही हैं जब शारीरिक पीड़ा व्यथित करती है और इस एकाकीपन में स्मृतियाँ ही साथ देती हैं। पाठक आश्चर्यचकित होगा कि उन स्मृतियों के सकारात्मक पहलुओं को लेखिका किस कुशलता से चित्रित करती हैं। मूल्यों के क्षरण के इस युग में ये प्रकाश-स्तम्भ का काम करेंगी। लेखिका का विश्वास है कि कुछ मूल्य ऐसे होते हैं जो जीवन को जीने योग्य बनाते हैं। यही मूल्य हैं जिन्हें महिमा जी ने प्रयासपूर्वक सँजोया ही नहीं, अपनी स्मृति का हिस्सा बनाया है। आज के युग में उन मूल्यों के सजीव चित्रण ने ‘परछाइयाँ’ को विशिष्टता प्रदान की है।

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‘परछाइयाँ’ आत्म-कथा नहीं, जीवन-गाथा है। इसमें जीवन के अनुभवों और निष्कर्षों को अनावृत्त किया गया है। इस पुस्तक की पंक्तियों में पाठक स्वयं अपने जीवन में घटित घटनाओं की अनुभूति करता चलता है। मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों का सूक्ष्मता और सरलता से किया गया विश्लेषण श्रीमती महिमा मेहता के संवेदनशील मन को भी उजागर कर देता है। जीवन में संघर्ष क्या होता है और उससे जूझने के लिए सकारात्मक एवं आस्थावादी दृष्टि कैसी भूमिका निभाती है, इसका दिग्दर्शन कराती है ‘परछाइयाँ’। इन परछाइयों में जो चित्र उभरते चलते हैं उनको कुशल चितेरे की भाँति उकेरने में लेखिका अत्यन्त सफल रही है।

इस संस्मरणात्मक उपन्यास में केवल घटनाएँ नहीं, अपने समय की परिक्रमा है। वह जो बीत गया है, वह अब नहीं लौटता, लेकिन स्मृतियों में बस जाता है। प्रसाद जी के ‘आँसू’ की रचना विकल वेदना के उभरने पर सम्भव हुई थी, लेकिन यह संस्मरणात्मक उपन्यास जीवन के एकाकीपन का सहचर है।

महिमा जी गद्य लेखन करती हैं और सहज-सरल भाषा में अपने संवेगों को सम्प्रेषित करती हैं। वे ऐसे समय में लिख रही हैं जब शारीरिक पीड़ा व्यथित करती है और इस एकाकीपन में स्मृतियाँ ही साथ देती हैं। पाठक आश्चर्यचकित होगा कि उन स्मृतियों के सकारात्मक पहलुओं को लेखिका किस कुशलता से चित्रित करती हैं। मूल्यों के क्षरण के इस युग में ये प्रकाश-स्तम्भ का काम करेंगी।

लेखिका का विश्वास है कि कुछ मूल्य ऐसे होते हैं जो जीवन को जीने योग्य बनाते हैं। यही मूल्य हैं जिन्हें महिमा जी ने प्रयासपूर्वक सँजोया ही नहीं, अपनी स्मृति का हिस्सा बनाया है। आज के युग में उन मूल्यों के सजीव चित्रण ने ‘परछाइयाँ’ को विशिष्टता प्रदान की है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2016
Weight
442 grams
ISBN-13
9789352211555
Pages
303
Reading time
~10 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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