Mahuacharit
(0)
Author:
Kashinath SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
₹ 159.2 (20% off)
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वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘महुआचरित’ जीवन के अपार अरण्य में भटकती इच्छाओं का आख्यान है। मध्यवर्गीय समाज की सच्चाइयों को लेखक ने विशिष्ट कथा-रस के साथ प्रकट किया है। यह उपन्यास जिस शिल्प में अभिव्यक्त हुआ है, वह कथा-संसार में एक नया प्रस्थान निर्मित करता है। छोटे-बड़े किंचित् असमाप्त अपूर्ण वाक्य संकेतों की ओर उन्मुख विवरण और बहुअर्थी बिम्ब इस रचना को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। महुआ की सहेली है उसके मकान की छत जहाँ वह खुलती, खिलती और खेलती है। यह कल्पना ही अपने आपमें अनूठी और व्यंजक है।</p> <p>कहना न होगा कि ‘महुआचरित’ को ‘वृत्तान्त का अन्त’ करती कथा-रचना के रूप में रेखांकित किया जा सकता है।</p> <p>अस्सी साल के स्वतंत्रता सेनानी पिता की पुत्री महुआ की देहासक्ति से विवाह तक की यात्रा और फिर उसमें जागता अस्मिता-बोध—इस कथा को लेखक ने समुचित सामाजिक सन्दर्भों के साथ प्रस्तुत किया है। स्त्री-विमर्श की अनुगूँज के बावजूद यह प्रश्न आकार लेता है, ‘ऐसा क्या है देह में कि उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता/लेकिन मन का सारा रिश्ता-नाता तहस-नहस हो जाता है।’</p> <p>सघन संवेदना और सर्वथा नवीन संरचना से समृद्ध ‘महुआचरित’ उपन्यास निश्चित रूप से पाठकों की आत्मीयता अर्जित करेगा।
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वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘महुआचरित’ जीवन के अपार अरण्य में भटकती इच्छाओं का आख्यान है। मध्यवर्गीय समाज की सच्चाइयों को लेखक ने विशिष्ट कथा-रस के साथ प्रकट किया है। यह उपन्यास जिस शिल्प में अभिव्यक्त हुआ है, वह कथा-संसार में एक नया प्रस्थान निर्मित करता है। छोटे-बड़े किंचित् असमाप्त अपूर्ण वाक्य संकेतों की ओर उन्मुख विवरण और बहुअर्थी बिम्ब इस रचना को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। महुआ की सहेली है उसके मकान की छत जहाँ वह खुलती, खिलती और खेलती है। यह कल्पना ही अपने आपमें अनूठी और व्यंजक है।</p>
<p>कहना न होगा कि ‘महुआचरित’ को ‘वृत्तान्त का अन्त’ करती कथा-रचना के रूप में रेखांकित किया जा सकता है।</p>
<p>अस्सी साल के स्वतंत्रता सेनानी पिता की पुत्री महुआ की देहासक्ति से विवाह तक की यात्रा और फिर उसमें जागता अस्मिता-बोध—इस कथा को लेखक ने समुचित सामाजिक सन्दर्भों के साथ प्रस्तुत किया है। स्त्री-विमर्श की अनुगूँज के बावजूद यह प्रश्न आकार लेता है, ‘ऐसा क्या है देह में कि उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता/लेकिन मन का सारा रिश्ता-नाता तहस-नहस हो जाता है।’</p>
<p>सघन संवेदना और सर्वथा नवीन संरचना से समृद्ध ‘महुआचरित’ उपन्यास निश्चित रूप से पाठकों की आत्मीयता अर्जित करेगा।
Book Details
-
ISBN9788193969212
-
Pages100
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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बढ़ते शहरीकरण ने जहाँ प्रकृति की सुन्दरता को विनष्ट किया है, वहीं सियासतदानों की स्वार्थपरता ने मानव-मानव के बीच नफ़रत और हिंसा की गहरी खाई पैदा कर दी है। आम आदमी जो कि इन राजनीतिज्ञों और मज़हबी, साम्प्रदायिक ताक़तों की इस चाल को नहीं समझते हैं, वे इनके झाँसे में आकर इस धरती की सुन्दरता को और इंसानियत के निरन्तर प्रवाह को क्षति पहुँचाते हैं, लेकिन जब एक शिशु के जन्म की वेला आती है तो फिर दुखी और पीड़ित इंसानों के मन में ‘एक और उम्मीद’ की कोंपल फूटती है।
यह उपन्यास इंसानियत की इसी उम्मीद की कोंपल के खिलने की दास्तान है जो अपनी रचनात्मक विशिष्टता और सहज प्रवाह के कारण न केवल पाठकीय संवेदना को स्पन्दित करता है, बल्कि वैचारिक उत्तेजना को भी नया आयाम प्रदान करता है।
Naari
- Author Name:
Siyaramsharan Gupt
- Book Type:

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चिरन्तन नारी युग-युग के अन्धकार में, उसे तुच्छ करके चिरकाल से आगे बढ़ती जा रही है, दु:ख और विपत्ति के अँधियारे पथ को पददलित करती हुई। उसे कोई भय नहीं है, कोई चिन्ता नहीं है। यही वह भाव है, यही वह मूल-मंत्र है, जिसके इर्द-गिर्द प्रसिद्ध उपन्यासकार सियारामशरण गुप्त जी ने इस उपन्यास का ताना-बाना बुना है, जो रोचक है, उत्कृष्ट मनोरंजन प्रदान करनेवाला है, और दिशाहीन होते समाज को सही दिशा दिखानेवाला भी है।
नारी सहित प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की सृष्टि है। इसी कारण ईश्वर की तरह वह गहन भी है। ईश्वर की तरह ही कष्ट सहन करके ही उसे ईश्वरीय शक्ति उपलब्ध करना होगा। उचित यही है, करणीय यही है। यही वह मान्यता है, यही वह सिद्धान्त है, जिसे इस उपन्यास में निरूपित किया गया है, स्थापित किया गया है। उपन्यास के पात्र जैसे सजीव होकर इन सर्वोच्च मान्यताओं को अपने क्रिया-कलापों और संवादों से इस प्रकार पूर्णता से स्थापित करते चलते हैं कि पाठक के मन-मस्तिष्क पर उसका स्थायी प्रभाव पड़े।
Sookha Patta
- Author Name:
Amarkant
- Book Type:

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वर्ष 1959 में प्रकाशित ‘सूखा पत्ता’ को अमरकान्त की ही नहीं, बल्कि उस दौर में लिखे गए समूचे उपन्यास-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि माना जाता है।
आज़ादी से पहले के पूर्वी उत्तर प्रदेश का क़स्बाई परिवेश और इसके किशोर कथा-नायक कृष्ण का चित्रण यहाँ असाधारण रूप में हुआ है। कृष्ण के मित्र मनमोहन के रूप में किशोरावस्था की मानसिक विकृतियों, कृष्ण के ‘क्रान्तिकारी’ रूझान के बहाने अपरिपक्व युवा मानस की कमज़ोरियों और कृष्ण-उर्मिला-प्रेमकथा के सहारे समाज की मानव-विरोधी रूढ़ परम्पराओं पर तीखा प्रहार इस उपन्यास में किया गया है।
किशोर वय से युवावस्था में प्रवेश करते छात्र-जीवन की अनुभव-विविधता के बीच अनायास जुड़ गए कृष्ण-उर्मिला प्रसंग को लेखक ने जिस सूक्ष्मता और विस्तार से उकेरा है, उसकी ताज़गी, सहजता और सादगी हिन्दी कथा-साहित्य की बेजोड़ उपलब्धि है। इस प्रणय-गाथा की पवित्र और गहन आत्मीय सुगन्ध मन में कहीं गहरे पैठ जाती है; और साथ ही यह तकलीफ़ भी कि सामाजिक रूढ़ियों की दीवार आख़िर कब तक दो युवा-हृदयों के बीच उठाई जाती रहेगी?
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