Gora
Author:
Rabindranath ThakurPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 319.2
₹
399
Available
भारतीय मनीषा के आधुनिक महानायक रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ‘गोरा’ की रचना एक शताब्दी पहले की थी और यह उपन्यास भारतीय साहित्य की पिछली पूरी शताब्दी के भीतर मौजूद जीवन-रेखाओं के भीतरी परिदृश्य की सबसे प्रामाणिक पहचान बना रहा। वर्तमान विश्व के तेज़ी से घूमते चक्र में जब एक बार फिर सभी महाद्वीपों के समाज इस प्राचीन राष्ट्र की ज्ञान-गरिमा, चिन्तन-परम्परा तथा विवेक पर आधारित नव-सृजन-शक्ति की ओर आशा-भरी दृष्टि घुमा रहे हैं, तो ‘गोरा’ की ऊर्जस्वी चेतना की प्रासंगिकता नए सिरे से अपनी विश्वसनीयता अर्जित कर रही है।</p>
<p>आज हम भारतीय साहित्य की परिकल्पना को लेकर जिस आत्म-संघर्ष से गुज़र रहे हें, उसे रवीन्द्रनाथ के विचारों और उनके ‘गोरा’ के सहारे प्रत्यक्ष करने का प्रयास किया जा सकता है। ‘गोरा’ की भाषिक संरचना और इसकी सांस्कृतिक चेतना भारतीय साहित्य की अवधारणा के नितान्त अनुकूल हैं। इस उपन्यास में रवीन्द्रनाथ ने पश्चिम बंग की साधु बांग्ला, पूर्वी बांग्ला (वर्तमान बांग्लादेश) की बंगाल-भाषा, लोक में व्यवहृत बांग्ला के विविध रूपों, प्राचीन पारम्परीण शब्दों, सांस्कृतिक शब्दावली, नव-निर्मित शब्दावली आदि का समन्वय करके एक बहुत अर्थगर्भी कथा-भाषा का व्यवहार किया है। भौगोलिक शब्दावली के लोक प्रचलित रूप भी ‘गोरा’ की कथा-भाषा की सम्पत्ति हैं। इसी के साथ रवीन्द्रनाथ ने ‘गोरा’ में अपनी कविता और गीत पंक्तियों तथा बाउल गीतों व लोकगीतों की पंक्तियों का प्रयोग भी किया है। अनुवाद करते समय कथा-भाषा तथा प्रयोगों के इस वैशिष्ट्य को महत्त्व दिया गया है।</p>
<p>‘गोरा’ में कितने ही ऐसे विभिन्न कोटियों के शब्द और प्रयोग हैं, जिनके सांस्कृतिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक और लोकजीवन के दैनिक प्रयोगों से जुड़े सन्दर्भों को जाने बिना ‘गोरा’ का मूल पाठ नहीं समझा जा सकता। अनुवाद में इनके प्रयोग के साथ ही पाद-टिप्पणियों में इनकी व्याख्या कर दी गई है।</p>
<p>अब तक देशी या विदेशी भाषाओं में ‘गोरा’ के जितने भी अनुवाद हुए हैं, उनमें से किसी में भी यह विशेषता मौजूद नहीं है।...और यह ‘गोरा’ का अब तक का सबसे प्रामाणिक अनुवाद है।
ISBN: 9788126725120
Pages: 415
Avg Reading Time: 14 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: भारतरत्न डॉ. भीमराव रामजीराव अंबेडकर, जिन्हें आज लोग श्रद्धा से बाबा साहब कहकर पुकारते हैं। उनका व्यक्तित्व इतना वृहद् और बहुआयामी है, जिसका विस्तार आकाश के समान विस्तृत और समुद्र की भाँति गहन है। उनके विषय में लिखना बड़ा दुष्कर कार्य है, जिसने युग के प्रवाह को मोड़ दिया, रूढिय़ों को तोड़ दिया और जब हिंदू धर्म में कोई सुधार न हुआ तो हिंदू धर्म ही छोड़ दिया। देवी, देवता, ऋषि-मुनि, महात्मा, शंकराचार्य आदि यहाँ तक कि अवतार भी शूद्र को समता तो क्या मानवता का दर्जा भी न दिला सके, उन्हें डॉ. भीमराव ने पूर्ण मानवता का दर्जा ही नहीं दिलाया अपितु समता का अधिकार भी दिलाया। इतनी महान् विभूति के बारे में लिख पाना मेरे सामथ्र्य के बाहर है, फिर भी मैंने उन पर लिखने का प्रयास किया है, क्योंकि अभी तक बाबा साहब पर जो भी लिखा गया है, भले ही वह हिंदी, मराठी, अंग्रेजी अथवा अन्य किसी भारतीय भाषा में लिखा गया हो, वह सबका सब गद्य में लिखा गया है। किंतु मैंने सर्वप्रथम उनके संपूर्ण संघर्षमय जीवन को ‘भीमचरित महाकाव्य’ शीर्षक के अंतर्गत काव्यबद्ध करने का प्रयास किया है।
Ichhamritu
- Author Name:
Shivshankari
- Book Type:

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Description:
किसी दुर्घटना या रोग-जर्जर अवस्था के कारण कोई व्यक्ति अगर स्वस्थ या फिर जीवित रहने की तमाम संभावनाओं से परे चला जाए तो क्या इच्छामृत्यु ही उसका एकमात्र उपचार है? क्या उसे उसकी असह्य-असाध्य पीड़ा अथवा दयनीयता से बचाने का यही अकेला रास्ता है? और, क्या इसे मानवीय कहा जा सकता है? सुपरिचित तमिल लेखिका शिवशंकरी का यह उपन्यास इसी समस्या से रू-ब-रू कराता है। कथाकेंद्र में हैं जननी और सत्या। दोनों ही शिक्षित और सुसंस्कृत पति-पत्नी हैं। जननी नर्तकी है और सत्या एक पत्रिका का संपादक। दोनों ने कुछ ही वर्ष पूर्व
प्रेम-विवाह किया था। दोनों में अथाह प्रेम, समर्पण और सुख-दुःख की समानुभूति। तभी एक दिन
नृत्य-प्रदर्शन के दौरान जननी दुर्घटनाग्रस्त होने से कोमा में चली जाती है। लगभग साल-भर तक जब वह ज्यों की त्यों पड़ी रहती है तो सत्या विचलित हो उठता है और उसे जननी के ही वे विचार अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं कि जब कोई प्राणी अपनी रुग्णावस्था के चलते खुद पर और दूसरों पर बोझ बन जाए तो उसे खत्म कर देना चाहिए। कहना न होगा कि सत्या लम्बे आत्मद्वंद्व से गुजरते हुए जननी को इच्छामृत्यु देने का उपक्रम करता है, लेकिन एक दिलचस्प बदलाव के कारण अपने में ही उलझ जाता है।
संक्षेप में कहा जाए तो शिवशंकरी का यह उपन्यास पल-पल मृत्यु-भय से गुजरते हुए जीवन की रक्षा करता है, और इस प्रक्रिया में जीवन-मृत्यु संबंधी अनेक पहलुओं की भावाकुल पड़ताल भी करता है। इसके साथ ही इसमें दाम्पत्य जीवन की जैसी सुगंध समाई हुई है, वह इसे एक और आयाम देती है।
Kind of Freedom
- Author Name:
Sakshi Charu Srivastava
- Book Type:

- Description: There is nothing more artistic than loving rude people. This may sound strange but these are the people who pose different challenges for us in countering them we sometimes discover some untold joys. Everyone we meet in life leaves behind a trace of their presence. For better or worse, they change us. And the moments witnessing aroma of these hours are the most sublime ones. Sometimes just being with someone without sharing any look or word makes us feel some unknown joys not experienced in routine meetings. This debut book, kind of freedom, is one such collection which consists of many such unheard joys and a freedom of expressions. It will fill your heart with emotional outburst in discovering your own unique joys.
Ekakipan Ke Sau Varsh
- Author Name:
Gabriel Garcia Marquez
- Book Type:

- Description: ‘एकाकीपन के सौ वर्ष’ की कहानी आपको विस्मित करती है; इसकी अतिरंजनाएँ आपको अवाक् और हास्य के आवेग में विह्वल छोड़ देती हैं; आप एक विराट स्मृति-गाथा के अतिमानवीय मायाजाल में धीरे-धीरे यथार्थ और वास्तविकता के कठोर पत्थरों पर पैर रखते हुए आगे बढ़ते हैं; और इस तरह मानव नियति के साथ बिंधे अनन्त अकेलेपन की एक सामूहिक गाथा के दूसरे छोर तक जाते हैं।
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