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Choolaha Aur Chakki

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किसी भी देश या समाज की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ़ वहाँ जन्मे महापुरुषों से ही नहीं बनती बल्कि संस्कृति के निर्माण में उन अनाम लोगों की भी भागीदारी होती है जो रोज़मर्रा की गतिविधियों में संलग्न रहते हुए भी अपना एक जीवन–सन्देश छोड़ जाते हैं। शहर चकवाल की भागवन्ती ऐसा ही चरित्र है जिसने अनपढ़ होते हुए भी अपने बच्चों को पढ़ा–लिखाकर न केवल क़ाबिल बनाया बल्कि इंसानियत के गुण भी उनमें विकसित किए। घर–गृहस्थी के चूल्हा, चरखा और चक्की में व्यस्त रहनेवाली भागवन्ती जितनी पारम्परिक है, उतनी ही आधुनिक भी। उसका चरित्र जैसे एक अबूझ पहेली हो। गांधी हत्या के बाद पहले तो वह अपने पति से कहती है कि, ‘‘सोग मनाना है तो मनाओ, तुम्हारे लिए महात्मा होगा या उन लोगों के लिए जो कुर्सियाँ सँभाले बैठे हैं।’’ लेकिन थोड़ी ही देर बाद जब बहू आकर पूछती है कि आज खाना क्या बनेगा तो एक पल रुककर ग़ुस्से में कहती है ‘‘कैसे घर से आई हो तुम, इतना बड़ा आदमी मर गया और तुम पूछ रही हो—खाना क्या पकेगा! शर्म नहीं आती?’’ सुख–दु:ख, हास्य–रुदन, जीवन–मरण, अच्छाई–बुराई की जीवन्त झलकियों का सुन्दर कोलाज है यह लघु औपन्यासिक कृति। इसमें आज़ादी के पूर्व से लेकर गांधी हत्या तक की राजनीतिक हलचलों की अनुगूँज भी सुनाई पड़ेगी। प्रवाहपूर्ण भाषा तथा बतकही के शिल्प में बुना यह उपन्यास बेहद पठनीय बन पड़ा है।

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किसी भी देश या समाज की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ़ वहाँ जन्मे महापुरुषों से ही नहीं बनती बल्कि संस्कृति के निर्माण में उन अनाम लोगों की भी भागीदारी होती है जो रोज़मर्रा की गतिविधियों में संलग्न रहते हुए भी अपना एक जीवन–सन्देश छोड़ जाते हैं।

शहर चकवाल की भागवन्ती ऐसा ही चरित्र है जिसने अनपढ़ होते हुए भी अपने बच्चों को पढ़ा–लिखाकर न केवल क़ाबिल बनाया बल्कि इंसानियत के गुण भी उनमें विकसित किए। घर–गृहस्थी के चूल्हा, चरखा और चक्की में व्यस्त रहनेवाली भागवन्ती जितनी पारम्परिक है, उतनी ही आधुनिक भी। उसका चरित्र जैसे एक अबूझ पहेली हो। गांधी हत्या के बाद पहले तो वह अपने पति से कहती है कि, ‘‘सोग मनाना है तो मनाओ, तुम्हारे लिए महात्मा होगा या उन लोगों के लिए जो कुर्सियाँ सँभाले बैठे हैं।’’ लेकिन थोड़ी ही देर बाद जब बहू आकर पूछती है कि आज खाना क्या बनेगा तो एक पल रुककर ग़ुस्से में कहती है ‘‘कैसे घर से आई हो तुम, इतना बड़ा आदमी मर गया और तुम पूछ रही हो—खाना क्या पकेगा! शर्म नहीं आती?’’

सुख–दु:ख, हास्य–रुदन, जीवन–मरण, अच्छाई–बुराई की जीवन्त झलकियों का सुन्दर कोलाज है यह लघु औपन्यासिक कृति। इसमें आज़ादी के पूर्व से लेकर गांधी हत्या तक की राजनीतिक हलचलों की अनुगूँज भी सुनाई पड़ेगी। प्रवाहपूर्ण भाषा तथा बतकही के शिल्प में बुना यह उपन्यास बेहद पठनीय बन पड़ा है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2002
Weight
222 grams
ISBN-13
9788126706099
Pages
79
Reading time
~3 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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