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Tripur Sundari

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यह उपन्यास आत्मोपलब्धि को लक्षित एक लम्बी यात्रा की कथा है। यात्रा बाहरी उतनी नहीं जितनी आन्तरिक। विवेक विवाहित युवक है लेकिन वह चाहता है अध्यात्म की राह से वह चरम उपलब्धि, जहाँ वह उस त्रिपुर सुन्दरी माया के साक्षात् दर्शन कर सके जो सम्पूर्ण स्त्री-शक्ति का एकीकृत पुंज है और अखिल सृष्टि जिसके वात्सल्य की छाँह में विश्राम करती है, फलती-फूलती है। लेकिन अपने मार्गदर्शक गुरु के आश्रम में वह मिलता है श्यामलता से, जो अपने गार्हस्थ्य जीवन को विडम्बनाओं और अपनी अतुल रूप राशि के बीच कोई सामंजस्य नहीं बिठा पाती और साधना की डगर पर चल पड़ती है। विवेक में उसे अपना पूर्ण पुरुष दिखता है, और विवेक उसमें अपनी त्रिपुर सुन्दरी देखता है। बीच में है विवेक की पत्नी प्रियंवदा और उसका दु:ख। एक लम्बा द्वन्द्व और अन्त में वह आत्मबोध जो विवेक अर्थात् पुरुष को स्त्री रूप में अपने चहुँओर उपस्थित शक्ति का साक्षात्कार करता है। वह जान लेता है कि नारी पुरुष की वासना-तृप्ति का साधन नहीं है, वह केवल उसकी सिद्धि का माध्यम है, और स्त्री की सिद्धि है सृष्टि का विकास। विवेक के गुरु, स्वामी जी अन्त में बताते हैं कि संसार में रहो, सभी कर्म प्रभु-स्मृति को जाग्रत रखकर करो। और अपने दृष्टि-क्षेत्र में व्याप्त स्त्री-शक्ति में निहित त्रिपुर सुन्दरी को देखो। अहं की क्षुद्रता और परम की असीमता के द्वन्द्व को उद्घाटित करनेवाला एक रोचक उपन्यास।

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यह उपन्यास आत्मोपलब्धि को लक्षित एक लम्बी यात्रा की कथा है। यात्रा बाहरी उतनी नहीं जितनी आन्तरिक।

विवेक विवाहित युवक है लेकिन वह चाहता है अध्यात्म की राह से वह चरम उपलब्धि, जहाँ वह उस त्रिपुर सुन्दरी माया के साक्षात् दर्शन कर सके जो सम्पूर्ण स्त्री-शक्ति का एकीकृत पुंज है और अखिल सृष्टि जिसके वात्सल्य की छाँह में विश्राम करती है, फलती-फूलती है।

लेकिन अपने मार्गदर्शक गुरु के आश्रम में वह मिलता है श्यामलता से, जो अपने गार्हस्थ्य जीवन को विडम्बनाओं और अपनी अतुल रूप राशि के बीच कोई सामंजस्य नहीं बिठा पाती और साधना की डगर पर चल पड़ती है। विवेक में उसे अपना पूर्ण पुरुष दिखता है, और विवेक उसमें अपनी त्रिपुर सुन्दरी देखता है। बीच में है विवेक की पत्नी प्रियंवदा और उसका दु:ख।

एक लम्बा द्वन्द्व और अन्त में वह आत्मबोध जो विवेक अर्थात् पुरुष को स्त्री रूप में अपने चहुँओर उपस्थित शक्ति का साक्षात्कार करता है। वह जान लेता है कि नारी पुरुष की वासना-तृप्ति का साधन नहीं है, वह केवल उसकी सिद्धि का माध्यम है, और स्त्री की सिद्धि है सृष्टि का विकास।

विवेक के गुरु, स्वामी जी अन्त में बताते हैं कि संसार में रहो, सभी कर्म प्रभु-स्मृति को जाग्रत रखकर करो। और अपने दृष्टि-क्षेत्र में व्याप्त स्त्री-शक्ति में निहित त्रिपुर सुन्दरी को देखो।

अहं की क्षुद्रता और परम की असीमता के द्वन्द्व को उद्घाटित करनेवाला एक रोचक उपन्यास।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2007
Weight
106 grams
ISBN-13
9788180311932
Pages
128
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
12 × 18 cm
Language
Hindi

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