Bhakta Prahlad
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Author:
Suryakant Tripathi 'Nirala'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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भारत के पौराणिक साहित्य में अनेक ऐसे किशोर चरित्र हैं जो मनुष्य के अडिग विश्वास, आस्था और संकल्प बल के प्रतीक हैं। ‘भक्त प्रह्लाद’ हमारे पौराणिक आख्यानों का ऐसा ही चरित्र है। इस चरित्र की कथा के माध्यम से निराला ने प्रह्लाद के उस अटूट विश्वास को उजागर किया है जो किसी भी आततायी के सामने पराजित नहीं होता। साथ ही, मानव-प्रकृति के वर्णन पर भी निराला ने अपना ध्यान केन्द्रित किया है। भक्त प्रह्लाद जब शिक्षा के लिए गुरुकुल में पहुँचा तो गुरु ने आरम्भ में जो तीन बातें बतलाईं, उनमें तीसरी थी, “तुम यहाँ कभी यह घमंड न कर सकोगे कि तुम राजा के लड़के हो। यहाँ जितने लड़के हैं, सबका बराबर आसन है। सम्मान की दृष्टि से बड़ा वह है जिसने अध्ययन अधिक किया है। तुम्हें सदा ही उसका अदब करना चाहिए।” इसके बाद निराला लिखते हैं, “प्रह्लाद मौन धारण किए इन अनुशासनों को सुन रहे थे। तीसरी आज्ञा उन्हें भायी। राजा और रंक एक ही आसन पर बैठकर ज्ञानार्जन करते हैं, समता के इस भाव से समदर्शी बालक का मुख प्रफुल्ल हो उठा।”</p> <p>उपरोक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि ‘भक्त प्रह्लाद’ एक पौराणिक चरित्र का पुनराख्यान-मात्र नहीं है, बल्कि उसके माध्यम से निराला ने किशोर पीढ़ी के लिए समता और मनुष्यता का सन्देश भी दिया है।
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भारत के पौराणिक साहित्य में अनेक ऐसे किशोर चरित्र हैं जो मनुष्य के अडिग विश्वास, आस्था और संकल्प बल के प्रतीक हैं। ‘भक्त प्रह्लाद’ हमारे पौराणिक आख्यानों का ऐसा ही चरित्र है। इस चरित्र की कथा के माध्यम से निराला ने प्रह्लाद के उस अटूट विश्वास को उजागर किया है जो किसी भी आततायी के सामने पराजित नहीं होता। साथ ही, मानव-प्रकृति के वर्णन पर भी निराला ने अपना ध्यान केन्द्रित किया है। भक्त प्रह्लाद जब शिक्षा के लिए गुरुकुल में पहुँचा तो गुरु ने आरम्भ में जो तीन बातें बतलाईं, उनमें तीसरी थी, “तुम यहाँ कभी यह घमंड न कर सकोगे कि तुम राजा के लड़के हो। यहाँ जितने लड़के हैं, सबका बराबर आसन है। सम्मान की दृष्टि से बड़ा वह है जिसने अध्ययन अधिक किया है। तुम्हें सदा ही उसका अदब करना चाहिए।” इसके बाद निराला लिखते हैं, “प्रह्लाद मौन धारण किए इन अनुशासनों को सुन रहे थे। तीसरी आज्ञा उन्हें भायी। राजा और रंक एक ही आसन पर बैठकर ज्ञानार्जन करते हैं, समता के इस भाव से समदर्शी बालक का मुख प्रफुल्ल हो उठा।”</p>
<p>उपरोक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि ‘भक्त प्रह्लाद’ एक पौराणिक चरित्र का पुनराख्यान-मात्र नहीं है, बल्कि उसके माध्यम से निराला ने किशोर पीढ़ी के लिए समता और मनुष्यता का सन्देश भी दिया है।
Book Details
-
ISBN9788171788965
-
Pages96
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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निराला का कवि-विकास एकरैखिक या सपाट नहीं है, उसमें कई घुमाव हैं, उसके कई स्तर हैं। एक ही समय में भिन्न प्रकार की कविताओं के साथ कवि अपने पाठकों और आलोचकों के समक्ष चुनौती देता खड़ा हो जाता है। निराला इसीलिए महाकवि हैं क्योंकि एक तरफ़ तो उनमें क्लैसिकी परम्परा के दर्शन होते हैं, वहीं दूसरी ओर एकदम अपने आसपास के परिवेश के और जनधर्मिता की कविता के। निराला में मुक्ति की एकल याचना नहीं है, बल्कि सामूहिक चेतना है। निराला का साहित्य न साहित्यिक कट्टरता या धार्मिक कट्टरता के समक्ष घुटने टेकता है और न साम्राज्यवाद के। उनके चिन्तन में भौतिकवाद के तत्त्व भी उपस्थित हैं और वे किसी ईश्वर द्वारा संसार के सृजन का मज़ाक़ उड़ाते हैं। उनके धार्मिक दृष्टिकोण के केन्द्र में मनुष्य है, इसीलिए विज्ञान की सत्ता व उसकी सामाजिक भूमिका को तथा आधुनिक सभ्यता के मूल्यों को भी वे सहज स्वीकार करते थे। निराला की कविता मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन-व्यापार की कविता भी है जिसमें जीवन का सम्पूर्ण संगीत है। निराला रचना को ‘युद्ध कौशल’ कहते थे और गद्य को ‘जीवन-संग्राम की भाषा’। अपने कथा-साहित्य में वे जीवन-संग्राम को अंकित करते चलते हैं। निराला ने अपनी मुक्ति-चेतना के साथ जैसे कविता को मुक्त किया वैसे ही कथा को भी। निराला की कहानियाँ भी हिन्दी की परम्परागत कहानियों के रूप और संगठन को अतिक्रमित करती हैं। हर पीढ़ी अपने महाकवि को ‘डिस्कवर’ करती है, इसलिए हर पीढ़ी का अपना चयन होता है। सम्पादन की चौथी पीढ़ी में यह संचयन है। हमारी पीढ़ी का चयन और हमारे अपने निराला की खोज!
Geetika
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
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‘गीतिका’ में संकलित अधिकांश गीतों का विषय प्रेम, यौवन और सौन्दर्य है, जिसकी अभिव्यक्ति के लिए निराला कहीं नारी को सम्बोधित करते हैं तो कहीं प्रकृति को, लेकिन आह्लाद की चरम अवस्था में नारी और प्रकृति का भेद ही मिट जाता है और तब नारी तथा प्रकृति एकमेक हो उठती हैं। कुछ गीत प्रार्थनापरक भी हैं, लेकिन स्वर इनका भी उल्लासपूर्ण ही है।
महाकवि निराला के काव्य में गीतिका का विशिष्ट स्थान है। इसमें संकलित गीत एक ओर उत्कृष्ट कविता का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, तो दूसरी ओर निराला के गहन संगीत-ज्ञान का। कविता और संगीत का ऐसा सामंजस्य हिन्दी कविता में दुर्लभ है।
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