Peeth Pichhe Ka Aangan
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ठ पीछे का आँगन' आज दिन-भर रुक-रुक कर, चाव और प्यार से, पढ़ता रहा और तुम्हारी कलाकारी से अभिभूत होता रहा। पिछले तीन-चार सालों में शायद ही किसी उपन्यास को मैंने इतने प्यार से पढ़ा हो। पहले वाक्य ने ही मुझे जकड़ लिया : 'अन्तहीन काली ऊन'। अँधेरे को ऐसी अनूठी उपमा शायद ही किसी और ने दी हो। मैंने पढ़ते हुए इतने निशान लगाए हैं, इतने वाक्य के नीचे लकीरें खींची हैं कि कोई देखे तो हैरान हो। ज़ाहिर है कि मैं तुम्हारे इस उपन्यास से बहुत प्रभावित, बहुत आश्वस्त, बहुत चमत्कृत हुआ हूँ। पहले उपन्यास (‘अँधेरी खिड़कियाँ’) में जो सम्भावनाएँ थीं, इसमें वे साकार हो गई हैं। सबसे अधिक मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि तुम सारे उपन्यास में बहुत संयत हो—और तुमने एक तरह से (फिर) स्थापित कर दिया है कि उपन्यास में अमूर्तन सम्भव ही नहीं, सुन्दर भी हो सकता है, कि प्रयोग अराजकता का पर्याय नहीं, कि 'प्रयोगवादी' उपन्यास भी उपन्यास ही है—साधारण यथार्थ के बग़ैर, भाषा और शिल्प के सहारे, आन्तरिकता के सहारे, मानवीय लाचारियों के सहारे... कहने का मतलब यह कि तुमने अपने इस काम से मुझे प्रभावित ही नहीं किया, मोह भी लिया। —कृष्ण बलदेव व
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ठ पीछे का आँगन' आज दिन-भर रुक-रुक कर, चाव और प्यार से, पढ़ता रहा और तुम्हारी कलाकारी से अभिभूत होता रहा। पिछले तीन-चार सालों में शायद ही किसी उपन्यास को मैंने इतने प्यार से पढ़ा हो। पहले वाक्य ने ही मुझे जकड़ लिया : 'अन्तहीन काली ऊन'। अँधेरे को ऐसी अनूठी उपमा शायद ही किसी और ने दी हो। मैंने पढ़ते हुए इतने निशान लगाए हैं, इतने वाक्य के नीचे लकीरें खींची हैं कि कोई देखे तो हैरान हो। ज़ाहिर है कि मैं तुम्हारे इस उपन्यास से बहुत प्रभावित, बहुत आश्वस्त, बहुत चमत्कृत हुआ हूँ। पहले उपन्यास (‘अँधेरी खिड़कियाँ’) में जो सम्भावनाएँ थीं, इसमें वे साकार हो गई हैं। सबसे अधिक मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि तुम सारे उपन्यास में बहुत संयत हो—और तुमने एक तरह से (फिर) स्थापित कर दिया है कि उपन्यास में अमूर्तन सम्भव ही नहीं, सुन्दर भी हो सकता है, कि प्रयोग अराजकता का पर्याय नहीं, कि 'प्रयोगवादी' उपन्यास भी उपन्यास ही है—साधारण यथार्थ के बग़ैर, भाषा और शिल्प के सहारे, आन्तरिकता के सहारे, मानवीय लाचारियों के सहारे...
कहने का मतलब यह कि तुमने अपने इस काम से मुझे प्रभावित ही नहीं किया, मोह भी लिया।
—कृष्ण बलदेव व
Book Details
-
ISBN9789388753869
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारतीय मनीषा के आधुनिक महानायक रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ‘गोरा’ की रचना एक शताब्दी पहले की थी और यह उपन्यास भारतीय साहित्य की पिछली पूरी शताब्दी के भीतर मौजूद जीवन-रेखाओं के भीतरी परिदृश्य की सबसे प्रामाणिक पहचान बना रहा। वर्तमान विश्व के तेज़ी से घूमते चक्र में जब एक बार फिर सभी महाद्वीपों के समाज इस प्राचीन राष्ट्र की ज्ञान-गरिमा, चिन्तन-परम्परा तथा विवेक पर आधारित नव-सृजन-शक्ति की ओर आशा-भरी दृष्टि घुमा रहे हैं, तो ‘गोरा’ की ऊर्जस्वी चेतना की प्रासंगिकता नए सिरे से अपनी विश्वसनीयता अर्जित कर रही है।
आज हम भारतीय साहित्य की परिकल्पना को लेकर जिस आत्म-संघर्ष से गुज़र रहे हें, उसे रवीन्द्रनाथ के विचारों और उनके ‘गोरा’ के सहारे प्रत्यक्ष करने का प्रयास किया जा सकता है। ‘गोरा’ की भाषिक संरचना और इसकी सांस्कृतिक चेतना भारतीय साहित्य की अवधारणा के नितान्त अनुकूल हैं। इस उपन्यास में रवीन्द्रनाथ ने पश्चिम बंग की साधु बांग्ला, पूर्वी बांग्ला (वर्तमान बांग्लादेश) की बंगाल-भाषा, लोक में व्यवहृत बांग्ला के विविध रूपों, प्राचीन पारम्परीण शब्दों, सांस्कृतिक शब्दावली, नव-निर्मित शब्दावली आदि का समन्वय करके एक बहुत अर्थगर्भी कथा-भाषा का व्यवहार किया है। भौगोलिक शब्दावली के लोक प्रचलित रूप भी ‘गोरा’ की कथा-भाषा की सम्पत्ति हैं। इसी के साथ रवीन्द्रनाथ ने ‘गोरा’ में अपनी कविता और गीत पंक्तियों तथा बाउल गीतों व लोकगीतों की पंक्तियों का प्रयोग भी किया है। अनुवाद करते समय कथा-भाषा तथा प्रयोगों के इस वैशिष्ट्य को महत्त्व दिया गया है।
‘गोरा’ में कितने ही ऐसे विभिन्न कोटियों के शब्द और प्रयोग हैं, जिनके सांस्कृतिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक और लोकजीवन के दैनिक प्रयोगों से जुड़े सन्दर्भों को जाने बिना ‘गोरा’ का मूल पाठ नहीं समझा जा सकता। अनुवाद में इनके प्रयोग के साथ ही पाद-टिप्पणियों में इनकी व्याख्या कर दी गई है।
अब तक देशी या विदेशी भाषाओं में ‘गोरा’ के जितने भी अनुवाद हुए हैं, उनमें से किसी में भी यह विशेषता मौजूद नहीं है।...और यह ‘गोरा’ का अब तक का सबसे प्रामाणिक अनुवाद है।
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