Dheere Bahe Done Re : Vols. 1-2
Author:
Mikhaiel SholokhovPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 880
₹
1100
Available
इस वृहद् उपन्यास की जटिल संरचना और प्लॉट के पीछे इतिहास की नियमसंगत निरन्तरता का विचार उपस्थित है। शोलोख़ोव दो दुनियाओं के बीच के संघर्ष की भव्यता से पाठक का साक्षात्कार कराते हैं। स्थापित सामाजिक सम्बन्धों, संस्थाओं, परम्पराओं, रीति-रिवाजों की दुनिया टूट-बिखर रही है और एक नई दुनिया उभर रही है, स्वयं को स्थापित कर रही है। महत्त्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों के साथ ही उपन्यास व्यक्ति और जन-समुदाय की ऐतिहासिक नियति के बीच के सम्बन्ध, ऐतिहासिक आवश्यकता और चयन की स्वतंत्रता के प्रश्न तथा त्रासदीपूर्ण संघर्षों और नाटकीय परिणतियों को जन्म देनेवाली ऐतिहासिक परिस्थितियों पर सोचने-विचारने के लिए पाठक को उकसाता है और उन सभी बिन्दुओं पर काव्यात्मक न्यायपूर्ण एवं तर्कपूर्ण अवस्थिति प्रस्तुत करता है।</p>
<p>शोलोख़ोव की कुशलता यह है कि यह सब कुछ वह कला की शर्तों पर नहीं करते बल्कि, इनके द्वारा अपनी कला को और अधिक उन्नत बनाते हैं। वे 'जनगण की नियतियों के महाकाव्यात्मक वर्णन की परम्परा को रचनात्मक ढंग से विकसित करते हुए, एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के अंग के रूप में जनता के व्यापक आन्दोलनों के चित्र उपस्थित करते हैं। उपन्यास की कहानी ग्रिगोरी मेलेख़ोव के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है, लेकिन इसका वास्तविक नायक यही जनता है।</p>
<p>‘धीरे बहे दोन रे...’ क्रान्ति और गृहयुद्ध के दौरान कज़्ज़ाकों के आन्तरिक और बाह्य जगत में मची उथल-पुथल और बदलावों का ग्राफ़िक चित्रण प्रस्तुत करता है। 'धीरे बहे दोन रे' ने शोलोख़ोव को न केवल सोवियत लेखकों की अग्रिम पंक्ति में स्थापित कर दिया, बल्कि उन्हें विश्व-स्तर पर चर्चित लेखक बना दिया। इसके लिए उन्हें 1941 में ‘स्तालिन पुरस्कार से’ सम्मानित किया गया।
ISBN: 9789360868819
Pages: 1151
Avg Reading Time: 38 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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अपनी रचनात्मक ज़मीन और लेखकीय दायित्व की तलाश करते हुए एक ईमानदार लेखक प्रायः स्वयं को भी रचने की कोशिश करता है। अनुपस्थित रहकर भी वह उसमें उपस्थित रहता है; और सहज ही उस देश-काल को लाँघ जाता है जो उसे आकार देता रहा है। समकालीन कथाकारों में संजीव की मौजूदगी को कुछ इसी तरह देखा जाता है। आकस्मिक नहीं कि हिन्दी की यथार्थवादी कथा-परम्परा को उन्होंने लगातार आगे बढ़ाया है।
‘सूत्रधार’ संजीव का नया उपन्यास है, और उनकी शोधपरक कथा-यात्रा में नितान्त चुनौतीपूर्ण भी। केन्द्र में हैं भोजपुरी गीत-संगीत और लोकनाट्य के अनूठे सूत्रधार भिखारी ठाकुर। वही भिखारी ठाकुर, जिन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा था और उनके अभिनन्दनकर्ताओं ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। लेकिन भिखारी ठाकुर क्या सिर्फ़ यही थे? निश्चय ही नहीं, क्योंकि कोई भी एक बड़ा किसी दूसरे बड़े के समकक्ष नहीं हो सकता। और यों भी भिखारी का बड़प्पन उनके सहज सामान्य होने में निहित था, जिसे इस उपन्यास में संजीव ने उन्हीं के आत्मद्वन्द्व से गुज़रते हुए चित्रित किया है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी धूपछाँही कथा-यात्रा है, जिसे हम भिखारी जैसे लीजेंडरी लोक कलाकार और उनके संगी-साथियों के अन्तर्बाह्य संघर्ष को महसूस करते हुए करते हैं। काल्पनिक अतिरेक की यहाँ कोई गुंजाइश नहीं। न कोई ज़रूरत। ज़रूरत है तो तथ्यों के बावजूद रचनात्मकता को लगातार साधे रखने की, और संजीव को इसमें महारत हासिल है। यही कारण है कि ‘सूत्रधार’ की शक्ल में उतरे भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज में रचे-बसे लोकराग और लोकचेतना को व्यक्त ही नहीं करते, उद्दीप्त भी करते हैं। उनकी लोकरंजकता भी गहरे मूल्यबोध से सम्बलित है; और उसमें न सिर्फ़ उनकी, बल्कि हमारे समाज और इतिहास की बहुविध विडम्बनाएँ भी समाई हुई हैं। अपने तमाम तरह के शिखरारोहण के बावजूद भिखारी अगर अन्त तक भिखारी ही बने रहते हैं तो यह यथार्थ आज भी हमारे सामने एक बड़े सवाल की तरह मौजूद है।
कहने की आवश्यकता नहीं कि देश, काल, पात्र की जीवित-जाग्रत् पृष्ठभूमि पर रचा गया यह जीवनीपरक उपन्यास आज के दलित-विमर्श को भी एक नई ज़मीन देता है। तथ्यों से बँधे रहकर भी संजीव ने एक बड़े कलाकार से उसी के अनुरूप रससिक्त और आत्मीय संवाद किया है।
—रामकुमार कृषक
Pashchim Bengal Ki Lokkathayen
- Author Name:
Pankaj Saha
- Book Type:

- Description: लोक और जीवन के बीच अटूट संबंध है। अपनी परंपरा, सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक समझ, आर्थिक तंत्र और धार्मिक मान्यताओं से आबद्ध आम-जीवन ही लोक-जीवन है। लोक-जीवन में लोक-संस्कृति अपने विभिन्न रूपों में विद्यमान रहती है। कभी यह लोकाचार, कभी लोक-विश्वास, लोक-पर्व आदि के रूप में रहती है, तो कभी लोकगीत के रूप में, कभी लोककथा के रूप में, कभी लोकनाट्य और कभी सुभाषित के रूप में। लोक-साहित्य में लोककथाओं का विशेष महत्त्व है। भारत की समस्त लोक-भाषाओं में लोककथाएँ भरी पड़ी हैं। इन लोककथाओं में मानव-मूल्यों एवं मानवीय संवेदनाओं का सागर लहराता है। इन कथाओं में मानवीय समाज की विसंगतियों एवं त्रासदियों का गहराई से अवगाहन किया जा सकता है। जातक, पंचतंत्र, हितोपदेश, वृहत्कथा, कथासरितसागर भारत की प्राचीनतम एवं अत्यंत समृद्ध लोककथाएँ हैं। बंगाल की लोककथाएँ भी बहुत पुरानी एवं समृद्ध हैं। अन्य भारतीय भाषाओं की तरह इनका भी जन्म मुख्यतः दादी एवं नानी के मुख से ही हुआ है। इस पुस्तक में संकलित समस्त लोककथाएँ बंगाल (पूर्व एवं पश्चिम) के हृदय का दर्पण हैं। इन लोककथाओं में बंगाल के लोक-जीवन की धड़कनें सुनाई पड़ती हैं।
Besharam : 'Lajja' Upanyaas Ki Uttar-Katha
- Author Name:
Taslima Nasrin
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- Description: तसलीमा नसरीन का यह उपन्यास उन लोगों के विषय में है जो अपनी जन्मभूमि को छोड़कर किसी और देश में, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, पराए माहौल और पराई आबोहवा में अपना जीवन बिता रहे हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि तसलीमा ने यह जीवन बहुत नज़दीक से जिया है। उनकी विश्व-स्तर पर चर्चित पुस्तक ‘लज्जा’ के लिए उन्हें कट्टरपंथियों ने देशनिकाला दे दिया था। लम्बा समय उन्होंने अपने मुल्क से बाहर बिताया है। इस उपन्यास में उन्होंने अपनी जड़ों से उखड़े ऐसे ही जीवन की मार्मिक और विचारोत्तेजक कथा कही है। स्वयं उनका कहना है कि यह उपन्यास ‘लज्जा’ की तरह राजनीतिक नहीं है, इसका उद्देश्य निर्वासन की सामाजिक दुर्घटना और उसकी परिस्थितियों को रेखांकित करना है। उपन्यास के सभी पात्र निश्चित रूप से उन चेहरों की नक़्क़ाशी करते हैं जिन्हें साम्प्रदायिक उन्माद और अत्याचार के चलते अपना घर छोडऩा पड़ा और बेगानी आबोहवा में साँस लेते हुए जीने की नई मुहिम शुरू करनी पड़ी।
Kitne Chaurahe
- Author Name:
Phanishwarnath Renu
- Book Type:

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‘कितने चौराहे’ फणीश्वरनाथ रेणु का पठनीय लघु उपन्यास है। पहली बार यह 1966 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के वृत्तान्त में लेखक ने निजी जीवन की कई घटनाओं को संयोजित किया है।
‘कितने चौराहे' की रचना का उद्देश्य स्पष्ट है। यह उपन्यास आज़ादी के लिए संघर्ष करने और बलिदान देनेवाले युवकों को केन्द्र में रखकर लिखा गया है, ताकि आज के किशोरों में देशप्रेम, सेवा, त्याग आदि आदर्शों के भाव जाग्रत् हो सकें।
यह उपन्यास व्यक्तिगत सुख-दु:ख, स्वार्थ-मोह से ऊपर उठकर देश के लिए जीने-मरने वालों के मानवीय, संवेदनशील रूप को उभारता है। पाठकों के मन में यह वृत्तान्त श्रद्धा जाग्रत् करता है। पाठक के मन में चारों ओर चीखते भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता आदि के प्रति क्षोभ उभरता है। उत्सर्गी परम्परा के प्रति आकर्षण बढ़ता है।
‘कितने चौराहे' में 'आंचलिकता का विश्वसनीय पुट, ज्वलन्त चरित्र सृष्टि, मार्मिक कथावस्तु और चरित्रानुकूल भाषा मोहित करती है। साधारण में निहित असाधारणता का उन्मेष सर्वोपरि है। रेणु के उपन्यास-शिल्प की अनेक विशेषताएँ इस रचना में दृष्टिगोचर होती हैं। शब्दों के बीच से बिम्ब झाँकते हैं, 'सूरज पच्छिम की ओर झुक गया। बालूचर पर लाली उतर आई। परमान की धारा पर डूबते हुए सूरज की अन्तिम किरण झिलमिलाई।' जीवन का जयगान करता उपन्यास।
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