Ekda Naimisharanye
Author:
Amritlal NagarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Available
एक पुण्य-स्थान के रूप में नैमिषारण्य का उल्लेख बहुत सारे पुराणों में प्राप्त होता है। यही वह स्थान है जहाँ ऋषि-मुनि, कोई समस्या उपस्थित होने पर सभा करते थे। यहीं अधिक यज्ञ-यजन हुए।</p>
<p>यह नागर जी की एकमात्र पौराणिक, पर श्रेष्ठ कृति है। सारे पात्र पौराणिक हैं, कल्पित और अकल्पित भी। पौराणिक गाथाओं का ही इसमें उद्घाटन हुआ है। पौराणिक और सर्वख्यात नारद तो इसके मुख्य पात्रों में हैं। नारद इसमें वेद-वेदान्तों, ज्योतिष, व्याकरण, छन्द-शास्त्र स्मृति-ग्रन्थों यहाँ तक कि गान और नृत्य के अद् भुत ज्ञाता के रूप में प्रस्तुत हुए हैं।</p>
<p>नारद का ज्ञान नागर का ही ज्ञान है, और यह तथ्य इस प्रसिद्ध उपन्यासकार के असामान्य स्वाध्याय और ज्ञान-गरिमा को प्रकाश में लाता है।</p>
<p>उपन्यास पुनर्जागरण का सन्देशवाहक है। मुख्य पात्र हैं भार्गव सोमाहुति।
ISBN: 9789352210404
Pages: 340
Avg Reading Time: 11 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘विजेता’ और इसकी अगली कड़ी ‘तूफ़ान झुका सकता नहीं’ नामक उपन्यासों में उज्बेकिस्तान के एक ग्राम-सोवियत की जनता को एकजुट सामूहिक श्रम और सामूहिक मेधा एवं कौशल से, ख़ाली पड़ी धरती को खेती योग्य बनाते हुए, क्रान्तिविरोधी बसमाचियों द्वारा बन्द कर दिए गए कोकबुलाक चश्मे के उद्गम को खोजकर उसे फिर से चालू करते हुए और सामूहिक फ़ार्मों के उत्पादन को तरह-तरह से आगे बढ़ाते हुए विस्तार से चित्रित किया गया है।
आर्थिक सम्बन्धों के रूपान्तरण के साथ ही जो नई सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक-सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्य-मान्यताएँ, सम्बन्ध और संस्थाएँ अस्तित्व में आ रही थीं तथा नए-पुराने के बीच जो संघर्ष अविराम जारी था, उसका लेखक ने विश्वसनीय और जीवन्त चित्र उपस्थित किया है। कथा के फलक पर पार्टी और प्रशासकीय मशीनरी की वह नौकरशाही भी मौजूद है। क्रान्ति-पूर्व समाज के अवशेष कुछ षड्यंत्रकारी विध्वंसक तत्त्व भी मौजूद हैं जो पुरानी पीढ़ी के कुछ लोगों की रूढ़िवादिता और नौकरशाही की हठधर्मिता का लाभ उठाकर सार्वजनिक सम्पत्ति और समाजवाद को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते हैं।
पुराने मूल्यों और रूढ़ियों से चिपके कुछ पुराने लोग भी हैं जो धीरे-धीरे बदलते हैं। लेकिन नए और पुराने के बीच का संघर्ष लगातार चलता रहता है। इन सभी प्रवृत्तियों की पारस्परिक अन्तर्क्रिया और संघात के रूप में आगे बढ़ते घटना-क्रम के बीच से नई दुनिया के उन नए नायकों के उदात्त, मानवीय चरित्र उभरते हैं जो पूँजी की संस्कृति के बरअक्स श्रम की संस्कृति की नुमाइंदगी करते हैं।
Bhootnath
- Author Name:
Devkinandan Khatri
- Book Type:

- Description: बाबू देवकीनन्दन खत्री विरचित ‘भूतनाथ’ एक अत्यन्त लोकप्रिय और बहुचर्चित प्रसिद्ध उपन्यास है। ‘चन्द्रकान्ता-सन्तति’ में ही बाबू देवकीनन्दन खत्री के अदभुत पात्र भूतनाथ (गदाधर सिंह) ने अपनी जीवनी (जीवन-कथा) प्रस्तुत करने का संकल्प किया था। यह संकल्प वस्तुतः लेखक का ही एक संकेत था कि इसके बाद ‘भूतनाथ’ नामक बृहत् उपन्यास की रचना होगी। देवकीनन्दन खत्री की अद्भुत कल्पना-शक्ति को शत्-शत् नमन है। लाखों करोड़ों पाठकों का यह उपन्यास कंठहार बना हुआ है। जब यह कहा जाता है कि बाबू देवकीनन्दन खत्री के उपन्यासों को पढ़ने के लिए लाखों लोगों ने हिन्दी भाषा सीखी तो इस कथन में ‘भूतनाथ’ भी स्वतः सम्मिलित हो जाता है क्योंकि ‘भूतनाथ’ उसी तिलिस्मी और ऐयारी उपन्यास परम्परा ही नहीं, उसी शृंखला का प्रतिनिधि उपन्यास है। कल्पना की अद्भुत उड़ान और कथा- रस की मार्मिकता इसे हिन्दी साहित्य की विशिष्ट रचना सिद्ध करती है। मनोरंजन का मुख्य उद्देश्य होते हुए भी इसमें बुराई और असत् पर अच्छाई और सत् की विजय का शाश्वत विधन ऐसा है जो इसे एपिक नाॅवल (Epic Novel) यानी महा-काव्यात्मक उपन्यासों की कोटि में लाता है। ‘भूतनाथ’ का यह शुद्ध पाठ-सम्पादन और भव्य नव-प्रकाशन, आशा है, पाठकों को विशेष रुचिकर प्रतीत होगा।
Raat Ke Gyarah Baje
- Author Name:
Rajesh Maheshwari
- Book Type:

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Description:
‘रात के ग्यारह बजे’ नारी के विविध रूपों को काले और सफ़ेद खानों में रखकर देखने के बजाय ‘ग्रे एरिया’ में अलग-अलग शेड्स दिखाता है। बहुत ही विश्वसनीय प्रसंगों के ताने-बाने में। राजेश माहेश्वरी के इस उपन्यास की स्त्रियाँ शिक्षित हैं और आत्मविश्वास से भरी हुई हैं। कठिनाइयों के अथाह दुर्गम को पार कर वे अस्तित्व के संघर्ष में निरन्तर आगे बढ़ती हुई नज़र आती हैं।
उपन्यास के किरदार मानसी, राकेश, आनन्द, गौरव और पल्लवी के बीच रिश्तों की परतें बहुत उलझी हुई हैं। ये सभी किरदार ज़िन्दगी की गाड़ी में सवार सहयात्री से लगते हैं जिनके जीवन की घटनाएँ कहीं न कहीं हमारे अपने जीवन की सच्चाई से हमें अवगत कराते हुए प्रतीत होते हैं। 'विश्वास’ का वास्तविक अर्थ हम तब समझ पाते हैं जब हमारे साथ विश्वासघात होता है। और तभी पता चलता है कि विश्वास का धागा जितना सच्चा होता है, उतना ही कच्चा भी होता है। लेखक ने इस अनुभव को बहुत कारगर ढंग से चित्रित किया है।
इस उपन्यास को पढ़ते हुए एक बात अलग से ध्यान खींचती है कि स्त्री-स्वतंत्रता और स्वावलम्बन के समर्थक पुरुष उनके हित में चाहे जो करते हों, लेकिन उनके हँसी-मज़ाक़ में भी उसी तरह की बातें होती हैं जो किसी सामान्य पुरुष के। उपन्यास की भाषा कथा-प्रवाह को गतिशील बनाए रखनेवाली है तथा कथानक की बुनावट ऐसी कि लगे, जैसे कोई फ़िल्म देख रहे हों!
आज के दौर में स्त्री और पुरुष के बीच के रिश्तों को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास।
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