Bhootnath
Author:
Devkinandan KhatriPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 1036
₹
1295
Available
बाबू देवकीनन्दन खत्री विरचित ‘भूतनाथ’ एक अत्यन्त लोकप्रिय और बहुचर्चित प्रसिद्ध उपन्यास है। ‘चन्द्रकान्ता-सन्तति’ में ही बाबू देवकीनन्दन खत्री के अदभुत पात्र भूतनाथ (गदाधर सिंह) ने अपनी जीवनी (जीवन-कथा) प्रस्तुत करने का संकल्प किया था। यह संकल्प वस्तुतः लेखक का ही एक संकेत था कि इसके बाद ‘भूतनाथ’ नामक बृहत् उपन्यास की रचना होगी। देवकीनन्दन खत्री की अद्भुत कल्पना-शक्ति को शत्-शत् नमन है। लाखों करोड़ों पाठकों का यह उपन्यास कंठहार बना हुआ है। जब यह कहा जाता है कि बाबू देवकीनन्दन खत्री के उपन्यासों को पढ़ने के लिए लाखों लोगों ने हिन्दी भाषा सीखी तो इस कथन में ‘भूतनाथ’ भी स्वतः सम्मिलित हो जाता है क्योंकि ‘भूतनाथ’ उसी तिलिस्मी और ऐयारी उपन्यास परम्परा ही नहीं, उसी शृंखला का प्रतिनिधि उपन्यास है। कल्पना की अद्भुत उड़ान और कथा- रस की मार्मिकता इसे हिन्दी साहित्य की विशिष्ट रचना सिद्ध करती है। मनोरंजन का मुख्य उद्देश्य होते हुए भी इसमें बुराई और असत् पर अच्छाई और सत् की विजय का शाश्वत विधन ऐसा है जो इसे एपिक नाॅवल (Epic Novel) यानी महा-काव्यात्मक उपन्यासों की कोटि में लाता है। ‘भूतनाथ’ का यह शुद्ध पाठ-सम्पादन और भव्य नव-प्रकाशन, आशा है, पाठकों को विशेष रुचिकर प्रतीत होगा।
ISBN: 9789395328913
Pages: 456
Avg Reading Time: 15 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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कुन्तल ने चाहा था कि एक साहित्यिक संस्था के ज़िम्मेदार पद पर आई है तो साहित्य को समाज की मशाल बनाने का उद्योग करेगी। कुछ ऐसा करेगी कि उस मँझोले शहर का कोना-कोना साहित्य के स्पर्श से स्पन्दित हो उठे। युवा प्रतिभाओं को वह आकाश मिले जो उनका हक़ है, और मनुष्य को वह दृष्टि जिससे मनुष्यों का यह क्षुद्र संसार भी जीने योग्य हो उठता है। लेकिन उसे पता भी नहीं लगा, और जाने कितने तीरों, कितने आरोपों, कितने सवालों की नोक पर उसे रख दिया गया। उसका सपने देखना, वह भी स्त्री होकर, यही उसका अपराध हो गया। राजनीति की सबसे निकृष्ट चालों से लिथड़ा साहित्य-संसार अचानक उसे एक काली कारा जैसा महसूस हुआ।
अकेले बैठकर वह बस सोचती ही रह जाती कि जिन शब्दों से सृष्टि के संताप को व्यक्त करने, आदमीयत की उलझनों को खोलने का काम लिया जाना था, वे संकीर्ण स्वार्थों के हड़ियल हाथों का खिलौना कैसे बन गए, कब और क्यों! मैत्रेयी पुष्पा का यह उपन्यास इन्हीं सवालों से जूझता हुआ, साहित्य और संस्कृति की दुनिया के उन कोनों से परदा उठाता है, जहाँ शब्दों की बाज़ीगरी अपने निकृष्टतम रूप में दिखाई देती है, और जहाँ एक उत्साहसम्पन्न, विज़नरी स्त्री उस यथार्थ से हार-हार कर लड़ती जाती है, जिस यथार्थ को न्याय के पैरोकारों ने अपनी छिछली स्वार्थपरता से गढ़ा है। सुगढ़ भाषा और सान्द्र स्त्री अनुभव से रचा यह उपन्यास हमारे समय के साहित्यिक समाज, राजनीतिक दिग्भ्रम और मर्दाना वर्चस्व से हर जगह लड़ती औरत की समग्र कथा है।
Kaal Chakra
- Author Name:
Madhu Bhaduri
- Book Type:

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कालचक्र हमें इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर ले जाता है, जहाँ आज़ादी के बाद का सबसे तीव्र घटना प्रवाह विद्यमान है, जहाँ खड़ा है एक आदमकद मोहभंग। एक ज्वार जहाँ उफन रहा है, जिसकी उत्तुंग लहरों में फूट रहा है एक अत्यन्त ठोस प्रश्न–यह आज़ादी क्या वास्तविक आजादी है ? या उसे अभी हासिल करना है ? यह माँग और इसी के साथ तमाम मेहनतकशों के राज की माँग जहाँ एक आँधी की तरह उठ रही है। जहाँ पूरे देश को हिला रहा है एक शब्द–अपने समय का सबसे आग्नेय शब्द–नक्सलबाड़ी। लेखिका ने इस महत्त्वपूर्ण उभार को अत्यन्त सघन रूप में व्यक्त किया है। राजनीतिक मूल्यों की सुस्पष्ट पहचान के साथ ही उभरती है निम्नमध्यवर्गीय पात्रों की एक
भरी-पूरी दुनिया, उनकी आशा-आकांक्षाएँ, रुचि-वैचित्र्य और आत्म-संघर्ष, जिन्हें लेखिका ने बड़ी ईमानदारी और आत्मा की पूरी गहराई से एक पहचान देने की कोशिश की है। नक्सलबाड़ी क्रान्ति के असफल हो जाने के कारणों की गम्भीर पड़ताल यहाँ दिखाई देती है। इस प्रयास में सबसे पहले जो चीज़ स्पष्ट होती है, वह यही कि क्रांति केवल कोरे आदर्शों और दुस्साहस के मेल का नाम नहीं है। वह मेहनतकश वर्ग के नेतृत्व के बिना सम्भव नहीं है। अभिजात और मध्यवर्ग के लोगों ने किस तरह इसका वरण किया, फिर किस तरह वे एकदम बिखर गए, टूट गए और उन्होंने राहें बदल लीं, इसका अत्यन्त कलात्मक चित्रण कर लेखिका ने अपनी दृष्टि-सम्पन्नता का ही परिचय दिया है। क्रांति की अनुगूँज इस समूची कृति में निरन्तर सुनाई देती है। और साथ ही यह आशय भी उभरकर आता है कि नारी मुक्ति से लेकर रोज़गार तक की प्रत्येक समस्या का हल इतिहास की इसी प्रक्रिया में–क्रांति की सफलता में–अन्तर्निहित है।
Mahabharat : Ek Navin Rupantaran
- Author Name:
Shiv K. Kumar
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‘महाभारत’ विश्व-इतिहास का प्राचीनतम महाकाव्य है। होमर की ‘इलियड’ और ‘ओडीसी’ से कहीं ज़्यादा प्रवीणता के साथ परिकल्पित और शिप्लित यह रचनात्मक कल्पना की अद्भुत कृति है। ऋषि वेदव्यास द्वारा ईसा के प्रायः 2000 वर्ष पूर्व रचित इस महाकाव्य में लगभग समस्त मानवीय मनोभावों—प्रेम और घृणा, क्षमा और प्रतिशोध, सत्य और असत्य, ब्रह्मचर्य और सम्भोग, निष्ठा और विश्वासघात, उदारता और लिप्सा—की सूक्ष्म प्रस्तुति मिलती है।
यों तो ‘महाभारत’ भारतीय मानस में रचा-बसा ग्रन्थ है, पर इसने सम्पूर्ण विश्व के पाठकों को आकर्षित किया है। शायद इसीलिए इस महाकाव्य का रूपान्तर विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में हुआ है। परन्तु विस्मय होता है यह देखकर कि ज़्यादातर रूपान्तरों में इसकी क्षमता का प्रतिपादन एक काव्यात्मक सौन्दर्य और सुगन्ध से समृद्ध कथा के रूप में नहीं हो पाया है। सम्भवतः इसलिए कि लेखकों ने मूलतः इसके कहानी पक्ष को ही प्रधानता दी।...किन्तु इस पुस्तक के लेखक शिव के. कुमार ने इसी कारण इस महाकाव्य में कुछ रंग और सुगन्ध भरने का प्रयास किया है।
यह वस्तुतः ‘महाभारत’ का एक नवीन रूपान्तर है। ‘महाभारत’ एक अद्वितीय रचना है। यह काल और स्थान की सीमाओं से परे है। इसलिए हर युग में इसके साथ संवाद सम्भव है। वर्तमान युग में भी सामाजिक न्याय, राजनीतिक स्वार्थजनित राष्ट्र विभाजन, नारी सशक्तिकरण और राजनेताओं के आचरण के सन्दर्भों में इसका आर्थिक औचित्य है। अंग्रेज़ी से हिन्दी में इस कृति का अनुवाद करते हुए प्रभा के. सिंह ने हिन्दी भाषा की प्रकृति का विशेष ध्यान रखा है। समग्रतः एक अनूठी रचना।
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