🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Juloos Wala Adami

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

‘जुलूस वाला आदमी’ कथाकार रमाकान्त का महत्त्वाकांक्षी उपन्यास है। उनके मन में इसे लिखने की रूपरेखा सन् 60 के दशक में बन चुकी थी, लेकिन इसका लिखा जाना उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक जारी रहा। यह एक राजनीतिक उपन्यास है लेकिन उससे कहीं अधिक है आजादी से ठीक पहले और बाद के सामाजिक बदलाव की अकथ कथा। इस उपन्यास के सन्दर्भ में स्वयं कथाकार ने अपनी डायरी में यत्र-तत्र जो दर्ज किया है, परिचय के लिए वही अपने में पर्याप्त है। रमाकान्त जी के शब्दों में : “हमारे देश के स्वातंत्र्योत्तर काल में व्यक्ति और समाज के जीवन की कथा कही है मैंने इस उपन्यास में। उपन्यास इतिहास का दस्तावेज नहीं होता। यह किसी कालखंड में जीवन की मूलधारा और व्यक्ति की चेतना के विकास का अंकन होता है। यही कहने का प्रयास है मेरा ...यह उपन्यास कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक तिकड़मबाजी की नीति और संघर्षशील जनपक्ष के अंतर्विरोधों और उनके टकराव को उभारता है। मेरा नायक नेता नहीं बनना चाहता। ...जुलूस आगे बढ़ता रहता है और जुलूस वाला आदमी सब पीछे छोड़ता चलता है। जुलूस को कहाँ पहुँचना है, यह जानता है, पर कैसे, किन रास्तों से होकर गुजरेगा, यह नहीं जानता।” यह उपन्यास पाठकों को इस जुलूस में सहर्ष आमंत्रित करता है। इस उम्मीद के साथ कि ‘जुलूस वाला आदमी’ का पाठक अन्तिम सफे तक रचनाकार का साथ देते हुए, जीवन में इस जुलूस से बहुत कुछ पाएगा भी।

Read more

₹ 995

796 20% off

Available

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

Frequently bought together
Juloos Wala Adami This book ₹796
Zindagi - Story of Life Vastvik Amera ₹175
Born At Midnight Kedar Vitekar ₹170
3 books selected ₹1,340 ₹1,141

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

‘जुलूस वाला आदमी’ कथाकार रमाकान्त का महत्त्वाकांक्षी उपन्यास है। उनके मन में इसे लिखने की रूपरेखा सन् 60 के दशक में बन चुकी थी, लेकिन इसका लिखा जाना उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक जारी रहा। यह एक राजनीतिक उपन्यास है लेकिन उससे कहीं अधिक है आजादी से ठीक पहले और बाद के सामाजिक बदलाव की अकथ कथा। इस उपन्यास के सन्दर्भ में स्वयं कथाकार ने अपनी डायरी में यत्र-तत्र जो दर्ज किया है, परिचय के लिए वही अपने में पर्याप्त है। रमाकान्त जी के शब्दों में : “हमारे देश के स्वातंत्र्योत्तर काल में व्यक्ति और समाज के जीवन की कथा कही है मैंने इस उपन्यास में। उपन्यास इतिहास का दस्तावेज नहीं होता। यह किसी कालखंड में जीवन की मूलधारा और व्यक्ति की चेतना के विकास का अंकन होता है। यही कहने का प्रयास है मेरा ...यह उपन्यास कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक तिकड़मबाजी की नीति और संघर्षशील जनपक्ष के अंतर्विरोधों और उनके टकराव को उभारता है। मेरा नायक नेता नहीं बनना चाहता। ...जुलूस आगे बढ़ता रहता है और जुलूस वाला आदमी सब पीछे छोड़ता चलता है। जुलूस को कहाँ पहुँचना है, यह जानता है, पर कैसे, किन रास्तों से होकर गुजरेगा, यह नहीं जानता।” यह उपन्यास पाठकों को इस जुलूस में सहर्ष आमंत्रित करता है। इस उम्मीद के साथ कि ‘जुलूस वाला आदमी’ का पाठक अन्तिम सफे तक रचनाकार का साथ देते हुए, जीवन में इस जुलूस से बहुत कुछ पाएगा भी।

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
3rd
Publication year
1993
Weight
970 grams
ISBN-13
9788171193271
Pages
403
Reading time
~13 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22.5 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp