Her Dreams : The Story After Her Departure
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Author:
Saransh VermaPublisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
EnglishCategory:
Literary-fiction₹
237
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“Have you ever lost someone very special to your heart?” completing a quota of nine months, she popped out from the womb of her mother, with cute twinkling eyes. Life was all fun then with daily discussions in a cheerful family of five. But one dark day, something happened and she went missing! So, how will you feel when your favourite person suddenly disappears from your life? You have unanswered questions like, what happened to her? Where did she go all of a sudden? Why did it happen? So here comes a young, witty story of a 16 year old carmelite, who had dreams of reaching heights which coincidentally met the doom, putting a full stop to everything. It shows the after-story of how a happy family breaks into pieces with the demise of their daughter, leftover with her dreams. Her mother had a dream of seeing her again, her father had a dream of dropping her school again, her brother had a dream of playing a set of chess with her again, her sister had a dream of gossiping with her again; it all just remained, a dream!.
Read moreAbout the Book
“Have you ever lost someone very special to your heart?” completing a quota of nine months, she popped out from the womb of her mother, with cute twinkling eyes. Life was all fun then with daily discussions in a cheerful family of five. But one dark day, something happened and she went missing! So, how will you feel when your favourite person suddenly disappears from your life? You have unanswered questions like, what happened to her? Where did she go all of a sudden? Why did it happen? So here comes a young, witty story of a 16 year old carmelite, who had dreams of reaching heights which coincidentally met the doom, putting a full stop to everything. It shows the after-story of how a happy family breaks into pieces with the demise of their daughter, leftover with her dreams. Her mother had a dream of seeing her again, her father had a dream of dropping her school again, her brother had a dream of playing a set of chess with her again, her sister had a dream of gossiping with her again; it all just remained, a dream!.
Book Details
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ISBN9789390006113
-
Pages200
-
Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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डोरा ब्रूडर, उम्र पन्द्रह साल, यहूदी। स्कूल के रजिस्टर में उसके नाम के आगे ‘जाने की तारीख़ और कारण’ का सिर्फ़ यह विवरण मिलता है : ‘14 दिसम्बर, 1941; शिष्या भाग गई है।’ यह उपन्यास उसी की तलाश की कहानी है जिसे लेखक लगभग पाँच दशक बाद पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बचे-खुचे दस्तावेज़ों में करता है।
कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती है, और अन्त में पता चलता है कि स्कूल से निकलने के बाद वह जर्मनों की पकड़ में आ गई, और उसे आउशवित्ज़ के लिए रवाना कर दिया गया जहाँ एक पूरी क़ौम को ख़त्म करने के लिए नाज़ियों ने तमाम अमानवीय इन्तज़ाम कर रखे थे।
डोरा ब्रूडर इस उपन्यास की मुख्य पात्र है, लेकिन असल नायक वह माहौल है जो पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बाद वहाँ पैदा हुआ, और जिसे लेखक ने अत्यन्त कौशल के साथ यहाँ पुन:सृजित किया है। एक ऐसा दौर जब अनेक मनुष्यों के लिए न सूरज के पास रोशनी बची थी, न आकाश के पास हवा, न घर उन्हें छिपा पाते थे, न सड़कें कहीं पहुँचा पाती थीं। उन्हें कभी भी कहीं भी पकड़ा जा सकता था, उनके लिए नियम बन गए थे, जो उन्हें उनके ही जैसे मनुष्यों के बीच कम-मनुष्य बनाते थे। उन्हें निर्धारित समय पर निकलना था, निर्धारित इलाक़ों में रहना था, निर्धारित बसों में चलना था, और हर समय अपनी पहचान को ज़ाहिर रखना था।
दिसम्बर की बर्फ़ीली रात में निकली डोरा के साथ कब क्या हुआ, कब वह कहाँ रही, यह खोजते हुए जैसे-जैसे लेखक आगे बढ़ता है इस माहौल की भयावहता हमारे सामने साकार होती जाती है, हम भीतर से ठंडे और सुन्न पड़ते जाते हैं और सहसा चौंककर अपने आज के वातावरण को देखने लगते हैं...
Peeth Pichhe Ka Aangan
- Author Name:
Anirudh Umat
- Book Type:

- Description: ठ पीछे का आँगन' आज दिन-भर रुक-रुक कर, चाव और प्यार से, पढ़ता रहा और तुम्हारी कलाकारी से अभिभूत होता रहा। पिछले तीन-चार सालों में शायद ही किसी उपन्यास को मैंने इतने प्यार से पढ़ा हो। पहले वाक्य ने ही मुझे जकड़ लिया : 'अन्तहीन काली ऊन'। अँधेरे को ऐसी अनूठी उपमा शायद ही किसी और ने दी हो। मैंने पढ़ते हुए इतने निशान लगाए हैं, इतने वाक्य के नीचे लकीरें खींची हैं कि कोई देखे तो हैरान हो। ज़ाहिर है कि मैं तुम्हारे इस उपन्यास से बहुत प्रभावित, बहुत आश्वस्त, बहुत चमत्कृत हुआ हूँ। पहले उपन्यास (‘अँधेरी खिड़कियाँ’) में जो सम्भावनाएँ थीं, इसमें वे साकार हो गई हैं। सबसे अधिक मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि तुम सारे उपन्यास में बहुत संयत हो—और तुमने एक तरह से (फिर) स्थापित कर दिया है कि उपन्यास में अमूर्तन सम्भव ही नहीं, सुन्दर भी हो सकता है, कि प्रयोग अराजकता का पर्याय नहीं, कि 'प्रयोगवादी' उपन्यास भी उपन्यास ही है—साधारण यथार्थ के बग़ैर, भाषा और शिल्प के सहारे, आन्तरिकता के सहारे, मानवीय लाचारियों के सहारे... कहने का मतलब यह कि तुमने अपने इस काम से मुझे प्रभावित ही नहीं किया, मोह भी लिया। —कृष्ण बलदेव व
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