Professor Shanku Ke Karname
Author:
Satyajit RayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
प्रोफ़ेसर शंकू कौन है? बस, इतना ही पता चलता है कि वे एक वैज्ञानिक हैं, विश्वविख्यात वैज्ञानिक। कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने शायद किसी भीषण प्रयोग में अपने प्राण गँवा दिए हैं। इधर यह भी सुनने में आया है कि वे किसी अपरिचित अंचल में छुपकर अपने काम में लगे हुए हैं, समय आने पर प्रकट हो जाएँगे। प्रोफ़ेसर शंकू की प्रत्येक डायरी में कुछ-न-कुछ ऐसी विचित्र जानकारियाँ अंकित हैं जो हमें रोमांचित करती हैं। ये कहानियाँ सच्ची हैं या झूठी, सम्भव हैं या असम्भव—इसका निर्णय आप स्वयं पढ़कर कर लें। रोचक शैली में लिखा गया सत्यजित राय का बहुचर्चित-बहुप्रशंसित उपन्यास है—‘प्रोफ़ेसर शंकू के कारनामे’।
ISBN: 9788183612425
Pages: 128
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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के।बांग्ला भाषा में पलामू पर विपुल साहित्य रचा गया है। पिछली ही शताब्दी में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के अग्रज सजीवचन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1880 में ‘पलामू’ नामक औपन्यासिक कृति का सृजन किया था। तब से लेकर महाश्वेता देवी जैसी शीर्षस्थ रचनाकार तक की क़लम पलामू पर निरन्तर चलती रही। हिन्दी में ही इस पर ज़मीनी अनुभवों से उपजी प्रामाणिक कृति का अभाव रहा है। ‘धपेल’ इस अभाव को प्रभावशाली ढंग से मिटाता है। 1993 के एक अकाल-सूखा प्रसंग को केन्द्र में रखकर रचा गया यह उपन्यास अन्ततः इस अभिशप्त भूगोल-विशेष की ही गाथा नहीं रह जाता, बल्कि भूख और ग़रीबी की जड़ों को उधेड़ते हुए अपने सम्पूर्ण देश और काल का मर्मान्तक आख्यान बन जाता है। ‘पलामू ग़रीब भारत का आईना है’ जैसे महाश्वेता देवी के पुराने चिन्ता-कथन का श्यामल ने अपने इस पहले उपन्यास में जैसा प्रामाणिक एवं मर्मस्पर्शी चित्रण-विश्लेषण किया है, इससे उनकी रचना-क्षमता एवं वर्णन-कौशल का पता चलता है।
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- Description: ‘कलंक मुक्ति’ का संसार, नारी-जीवन के क्रूरतम अन्तर्विरोधों का संसार है, जिसे रेणु ने बड़ी सहजता, आत्मीयता और सूक्ष्मता के साथ रचा है। इसमें चित्रित ‘वर्किंग विमेन्स होस्टल’ का चकलाघर में बदल जाना भारतीय शासक वर्ग के पतनशील चरित्र और झूठे लोकतंत्र की विडम्बनाओं का कच्चा चिट्ठा है, जो अपने आप में एक चीखता हुआ सवाल बन गया है कि इस सबके लिए जिम्मेदार कौन? और उपन्यास की प्रत्येक पंक्ति इस प्रश्न का उत्तर देती है। दूसरी ओर है—बेला गुप्त, त्याग, कर्त्तव्य और बलिदान की प्रतिमूर्ति । संघर्षशील । पराजित। एक संजीवनी... पुण्य... पवित्र... पापहरा धारा—बेला—कब राष्ट्रीय अस्मिता में बदल जाती है, पता नहीं लगता। केवल प्रश्न ही शेष रह जाता है वहाँ—ईश्वर की तरह तरंगायित कि क्या उस समाज का विध्वंस आवश्यक नहीं, जिसमें मनुष्य अपनी अस्मिता को सुरक्षित नहीं रख पाये? जहाँ उसका अस्तित्व स्वयं उसके हाथों से छीन लिया जाये ? और यदि ये प्रश्न जन-मानस को मथने लगते हैं तो निश्चय है कि मुक्ति की सम्भावनाएँ भी विद्यमान हैं।
Uttarayan
- Author Name:
Rangnath Tiwari
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Description:
रवीन्द्रनाथ टैगोर हमारे लिए प्रकाश और समरसता की आस्था के जीवित प्रतीक रहे हैं। वे मुक्त पंछी के समान आँधी और तूफ़ान के बीच शाश्वत-काल के संगीत की रचना करते रहे हैं। उनकी उत्कृष्ट कला कभी भी स्वतंत्रता के हित में मानवीय संकटों और जनता के वीरतापूर्ण संघर्षों के प्रति उदासीन नहीं रही। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा है—वे महान प्रहरी हैं। टैगोर ने संकट के क्षणों में अपने देशवासियों और दुनिया की स्पष्ट और निर्भय दृष्टि से पहरेदारी की है। हम आज जो कुछ भी हैं और जो कुछ हमने सीखा है, वह सब उनकी कविता और प्रेम की अजस्र सरिता से अभिसिंचित हैं या जुड़े हुए हैं।
—रोमां रोलां
Bhookh
- Author Name:
Mahashweta Devi
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Description:
विकास और समानता के दावों के घटाटोप के नीचे असन्तोष सुलगता रहता है। राजसत्ता आँख मूँदे रहती है और स्थिरता एवं शान्ति का दावा करती रहती है। जब तक असन्तोष को क्रोध का रास्ता नहीं मिलता, तब तक ‘सब कुछ ठीकठाक है’ का भ्रम बना रहता है। छोटे-छोटे संघर्ष चलते रहते हैं और अभिजन यथास्थिति के मुग़ालते में डूबे रहते हैं। इस कथ्य को आधार बनाकर लिखा गया उपन्यास।
भूख स्थानीय स्तर की एक बड़ी लड़ाई की दास्तान है। बिहार का पठारी ज़िला पलामू का गाँव खेड़ा। काग़ज़ पर शासन बिहार की सरकार का और वास्तविक क़ब्ज़ा लरातू के आदमख़ोर कुँवर का। बचे-खुचे सामन्ती दलदल की उपज कुँवर की जो जंगल का राजा, जंगल के उत्पाद का लुटेरा और आदिवासियों की अस्मत को खिलौने की तरह उछालने वाला है। तेतरी के साथ बलात्कार, बेगार-बँधुआ बनाए गए आदिवासी, सुलगता असन्तोष और दिशा देती परिवर्तनकामी शक्तियाँ कुँवर को चुनौती देती हैं। नौकरशाही कुँवर के सामने लाचार है। लेकिन दलितों के असन्तोष का क्रान्तिकारी दावानल जब भड़कता है तो कुँवर मारा जाता है।
प्रख्यात बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी ने अन्याय के घृणित रूपों और उसके विरुद्ध चल रहे जन-संघर्ष की दहकती कथा पाठकों के समक्ष रखी है।
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