Daulati
Author:
Mahashweta DeviPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 360
₹
450
Unavailable
महाश्वेता देवी की रचनाओं की केन्द्रीय चेतना लोकधर्मी है। उनके लेखन का बुनियादी मन्तव्य दलितों की ज़िन्दगी को उभारकर सामने लाना है जो न केवल सामन्ती शोषण के शिकार हैं बल्कि जिन्हें तबाह करने में सरकारी नीतियों की भी बराबर की हिस्सेदारी है।</p>
<p>यह बात साफ़ हो चुकी है कि आदिवासी जन–जीवन की त्रासदी के बीज विषैली राजनीति में हैं और राजनीति की चालाक साज़िशों ने संगठित वर्ग–संघर्ष को विभाजित जाति–संघर्ष में तब्दील कर दिया है। ज़मींदारों ने भूमिहीन आदिवासियों के बीच धर्मों और जातियों के बँटवारे का सहारा लेकर उन्हें संगठित वर्ग की शक्ल में कभी नहीं आने दिया।</p>
<p>महाश्वेता जी के कथानक इन बारीक षड्यंत्रों को बेनक़ाब करते हैं। सरकारी कामकाज के असली चेहरों और ज़मींदारों के साथ सरकारी नुमाइंदों के आर्थिक रिश्तों को देखने–समझने के लिए जिस दृष्टि की ज़रूरत है, महाश्वेता जी की रचनाएँ उस दृष्टि को पैदा करती हैं।</p>
<p>इस पुस्तक के पृष्ठों पर तीन सशक्त उपन्यास छपे हैं। इन उपन्यासों का कथा–केन्द्र आदिवासी स्त्रियों की पीड़ित ज़िन्दगी है। तीन उपन्यासों की तीन प्रतिनिधि स्त्री पात्र हैं, दौलति, बासमती और गोहुअन। समान आर्थिक स्थितियों के बावजूद तीनों की सोच में बुनियादी फ़र्क़ है और यह फ़र्क़ आदिवासी स्त्री के मनोविज्ञान और उसकी संघर्ष–क्षमता को विभिन्न रूपों में उद्घाटित करता है।</p>
<p>स्त्री का क्रय–विक्रय, देह–व्यापार की कसैली विवशताएँ, ‘चुकी’ हुई वेश्याओं की तिरस्कृत वेदनाएँ और उनकी गुमनाम मौत; और इन सबके लिए ज़िम्मेवार सामन्ती व्यवस्था के दाँवपेंच—यह संक्षेप है ‘दौलति’ का।</p>
<p>दूसरा तेज़–तर्रार उपन्यास है ‘पलामौ’। आदिवासियों के शोषण को एक नए कोण से समझने की कोशिश, और आदिवासियों के विकास के सम्बन्ध में सरकारी दावों के खोखलेपन का पर्दाफ़ाश करनेवाला यह उपन्यास आदिवासी–जीवन का प्रतिबिम्ब है।</p>
<p>‘गोहुअन’ की कथा आदिवासी स्त्री के एक भिन्न स्वरूप को सामने रखती है। एक विषैले सर्प ‘गोहुअन’ के प्रतीक के ज़रिए आदिवासी स्त्री का स्वाभिमानी तेवर इस उपन्यास में बहुत गम्भीरता से व्यक्त ह़ुआ है।
ISBN: 9788171193295
Pages: 202
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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नीली दीवार की परछाइयाँ बहुत धीमे से मन के अन्तर्लोक में प्रवेश करती है। दो साँसों के बीच के अन्तराल में जैसे दीवार पर परछाइयाँ काँपती, सिहरती अपनी कहानी कहती हैं। रौशन बी, राहिला उर्फ़ तलजीत, अमू और अपूर्वा, इन सबके जरिए एक रहस्य बहुत परतों में, बहुत धीरे-से उजागर होता है, जैसे नेपथ्य में जो जीवन था उस पर से किसी ने पर्दा उठा दिया हो।
अनघ के पास भावों की गहराई है, शब्दों और भाषा की जादूगरी है जिसके माध्यम से बहुत मीठेपन में, बहुत बिम्बात्मक तरीक़े से परत-दर-परत कथा खुलती है। भाषा की नज़ाकत के साथ-साथ कथा का रहस्य-रूमान, अवसाद, सुख सब तरंगित होता चलता है। इस उपन्यास में गाँव है, शहर है, देश है, विदेश है, वर्तमान है, अतीत भी है। सारी दुनिया हमारे सामने कभी प्रगट तो कभी सांकेतिक रूप में किसी दृश्य-परिदृश्य की तरह से बहती चलती है। अनघ बहुत प्रत्यक्ष का शिल्प नहीं चुनते। हर बार वो उतनी ज़मीन छोड़ते चलते हैं जहाँ से पाठक भी अपनी कल्पना में उस दुनिया को अपने तरीक़े और नज़र से देखता चले। किताब जब ख़त्म होती है उसका आस्वाद आपके मन में बना रहता है।
राहिला की बीमारी और उसके पिता द्वारा छोड़े जाने की कथा, रौशन बी का अपने चाचा, ताऊ द्वारा बेचा जाना और अमू का बिन पिता के बड़े होना, इन परिस्थितियों के गिर्द अनकहे की, चुप्पियों और तकलीफ़ों की एक दुनिया अनघ बसाते हैं जिसकी उदास छाया बहुत देर तक बनी रहती है—पुराने ज़ख़्म की टीस जैसे। उनके लिखे में एक इंटेंस किस्म का रचाव दिखता है जो पाठक की उँगली थाम उसे उन बीहड़ गलियों में लिए चलता है जिसकी स्मृति में हम कभी प्रसन्न और कभी अनमने उदास हो उठते हैं।
Srijan Ka Rasayan
- Author Name:
Shivmurti
- Book Type:

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Description:
रचना किसी विस्मय से कम नहीं है। शब्दों में जैसे एक समूचा संसार साकार हो उठता है। रचनाकार स्वयं इस रहस्य से अभिभूत रहता है कि कैसे अतीत का कोई क्षण भाषा में कौंध उठता है। स्मृति के अपार विस्तार में शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गन्ध के असंख्य अनुभवों में से कब कौन सृजन का सहयात्री बन जाए, कहना कठिन है।
वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति के गद्य का अनूठा आयाम उद्घाटित करती पुस्तक ‘सृजन का रसायन’ संस्मरण के शिल्प में उनकी रचना-प्रक्रिया को रेखांकित करती है। शिवमूर्ति का जीवन अनुभवों का भंडार है। गाँव और गाँव-जवार के जाने कितने चरित्र उनके लेखन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। जिस कथारस व दृश्यधर्मिता के साथ ठेठ देसी अन्दाज़ में वे वृत्तान्त साधते हैं, वह अद्भुत है। गाँव के छोटे-छोटे विवरणों के अलावा जियावन दरजी, डाकू नरेश, धन्नू बाबा, संतोषी काका और जुल्म का विरोध करनेवाला जंगू—सब पुस्तक के पृष्ठों पर जाग उठते हैं।
शिवमूर्ति ने माता-पिता, परिवार, रिश्तेदारों और गाढ़े समय के साथियों को कृतज्ञ आत्मीयता के साथ याद किया है। बकरी चराते, अन्य श्रम साध्य काम करते, मेले में मजमा लगाते हुए वे किस तरह सफलता की राह पर आगे बढ़े, किस तरह सर्जना के संसार में विकसित हुए, प्रतिष्ठा प्राप्त की, इसका वर्णन अत्यन्त पठनीय है।
स्त्रियाँ ‘सृजन का रसायन’ की आत्मा हैं। माँ, नानी, पत्नी, परदेसिन मइया, जग्गू बहू, मनी बहू आदि अनेक चरित्र। और हाँ, ‘पितु मातु सहायक स्वामि सखा’ सरीखी शिवकुमारी। शिवमूर्ति और शिवकुमारी के विचित्र सम्बन्धों पर हिन्दी साहित्य में कौतूहल मिश्रित बहुत कुछ कहा-लिखा गया है। शिवमूर्ति इस पुस्तक में इस रिश्ते की दास्तान बयान करते हैं। जीवनानुभवों के साथ साहित्य के अनेक प्रश्नों के संवाद करती यह पुस्तक सचमुच अनूठी है।
Akbar
- Author Name:
Shazi Zaman
- Book Type:

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Description:
''हिन्दू गाय खाएँ, मुसलमान सूअर खाएँ...” 3 मई, 1578 की चाँदनी रात को कोई भी हिन्दुस्तान के बादशाह अबुल मुज़फ़्फ़र जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर की इस बात को समझ नहीं पाया। इसीलिए उस वक़्त उनकी इस कैफ़ियत को 'हालते अजीब’ कहा गया। सत्ता के शीर्ष पर खड़ा ये बादशाह अपनी ज़िन्दगी में कभी कोई जंग नहीं हारा। लेकिन अब एक बहुत बड़ी और ताक़तवर सत्ता उसके सब्र का इम्तिहान ले रही थी। बादशाह अकबर का संयम टूट रहा था और उनकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा संघर्ष शुरू होने को था।
कई रोज़ पहले लगभग पचास हज़ार शाही फ़ौजियों ने सल्तनत की सरहद के क़रीब एक बहुत बड़ा शिकारी घेरा बाँधा था। बादशाह अकबर के पूर्वज अमीर तैमूर और चंगेज़ ख़ान के तौर-तरीक़े के मुताबिक़ ये घेरा पल-पल कसता गया और अब वो वक़्त आ पहुँचा जब शिकार बादशाह सलामत के पहले वार के लिए तैयार था। लेकिन उस मुक़ाम पर आकर बादशाह अकबर ने एक हैरतअंगेज़ क़दम उठा लिया...
ये उपन्यास लेखक ने बाज़ार से दरबार तक के ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर रचा है। बादशाह अकबर और उनके समकालीन के दिल, दिमाग़ और दीन को समझने के लिए और उस दौर के दुनियावी और वैचारिक संघर्ष की तह तक जाने के लिए शाज़ी ज़माँ ने कोलकाता के इंडियन म्यूजि़यम से लेकर लन्दन के विक्टोरिया एंड ऐल्बर्ट तक बेशुमार संग्रहालयों में मौजूद अकबर की या अकबर द्वारा बनवाई गई तस्वीरों पर ग़ौर किया, बादशाह और उनके क़रीबी लोगों की इमारतों का मुआयना किया और 'अकबरनामा’ से लेकर 'मुन्तख़बुत्तवारीख़’, 'बाबरनामा’, 'हुमायूँनामा’ और 'तजि्करातुल वाक़यात’ जैसी किताबों का और जैन और वैष्णव सन्तों और ईसाई पादरियों की लेखनी का अध्ययन किया। इस खोज में 'दलपत विलास’ नाम का अहम दस्तावेज़ सामने आया जिसके गुमनाम लेखक ने 'हालते अजीब’ की रात बादशाह अकबर की बेचैनी को क़रीब से देखा। इस तरह बनी और बुनी दास्तान में एक विशाल सल्तनत और विराट व्यक्तित्व के मालिक की जद्दोजहद दर्ज है। ये वो शख़्सियत थी जिसमें हर धर्म को अक़्ल की कसौटी पर आँकने के साथ-साथ धर्म से लोहा लेने की हिम्मत भी थी। इसीलिए तो इस शक्तिशाली बादशाह की मौत पर आगरा के दरबार में मौजूद एक ईसाई पादरी ने कहा, ''ना जाने किस दीन में जिए, ना जाने किस दीन में मरे।”
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