Global Gaon Ke Devta
Author:
RanendraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
ग्लोबल गाँव के देवता आदिवासी जनजीवन की ज्वलन्त गाथा है। असुर आदिवासी समुदाय को केन्द्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास उनकी लगातार बढ़ रही मुश्किलों का बयान करते हुए वर्तमान भारतीय समाज, संस्कृति, सियासत और सत्ता प्रतिष्ठान के सामने कई प्रासंगिक प्रश्न खड़े करता है। ये असुर आदिवासी ही हैं जिन्होंने आग और धातु की खोज की, धातु को गलाकर औजार बनाया। मानव सभ्यता और संस्कृति को आगे बढ़ाने में उनका योगदान किसी व्याख्या का मोहताज नहीं है लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि आज उन्हें अवरोध समझा जा रहा है? तमाम परिस्थितियों का सामना करते हुए हज़ारों सालों से जीवित रहते आए आदिवासी समुदायों के अस्तित्व पर आज संकट क्यों मंडरा रहा है? वस्तुतः यह उपन्यास हमारी सभ्यता-संस्कृति के उस अँधेरे अन्तराल को उजागर करता है जहाँ समाज के छोटे प्रभावी हिस्से द्वारा समाज के अधिकतर सामान्य हिस्से के लोगों को उनकी ज़मीन से उखाड़ने, उन्हें साधनहीन बनाने को ही ‘विकास’ माना जाता है। इसमें भी विडम्बना यह कि ख़ुद को मुख्यधारा कहने वाला प्रभावी हिस्सा यह कार्य सामान्य हिस्से की भलाई के नाम पर करता है। असुर आदिवासियों के सन्दर्भ में इस मुख्यधारा के नज़रिये का हवाला इस प्रकार है कि अतीत की अनगिनत किंवदन्तियाँ और मिथक उनके संहार की कथाओं से भरे पड़े हैं, तो वर्तमान में उनके पारम्परिक इलाकों की ज़मीन में दबे खनिजों के लिए उन्हें वहाँ से बेदख़ल किया जा रहा है। इस उपन्यास की कथा यूँ तो झारखंड की पृष्ठभूमि में रची गई है लेकिन यह दुनिया के उन तमाम लोगों के जीवन संघर्ष का प्रतीक प्रतीत होती है जो अपनी ज़मीन, अपनी आबोहवा को बचाने के लिए लड़ रहे हैं।
ISBN: 9789360864705
Pages: 152
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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पढ़ने में रुचिकर और सिर्फ पाठक की दृष्टि से कहूँ तो यह एक सफल, सशक्त और एक स्थायी प्रभाव छोड़नेवाला उपन्यास है। इसके कई चरित्र और घटनाएँ मुझे याद हैं और उनकी याद रहेगी। आंचलिकता केवल भाषिक परिवेश तक सीमित है। उपन्यास की भाषा ने मुझे बहुत आकृष्ट किया। इस उपन्यास ने
बहुत-से ऐसे शब्द हिन्दी को दिए हैं जो ज्यादा आसानी से आज की साधु हिन्दी ग्रहण कर सकती है। भाषा की दृष्टि से इस उपन्यास की यह महत्त्वपूर्ण देन रही।
–अज्ञेय
बुंदेलखंड का जन्म से मरण तक कोई ऐसा पहलू नहीं है जो इस उपन्यास में न आया हो और सो भी ‘फर्स्ट हैंड’। इस उपन्यास के कई गुण हैं मगर सबसे बड़ा गुण है, गोविन्द मिश्र के बयान का अन्दाज जो बातों को शुरू से अन्त तक कहानी बनाए रखता है। यह पुस्तक हमारे उपन्यास साहित्य में एक नक्षत्र की तरह चमकती रहेगी।
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‘वामा-बोधिनी’ सिर्फ़ वामाओं में बोधोदय रचती है, ऐसा नहीं है। नवनीता देव सेन की यह उपन्यासिका, उसका व्यतिक्रम है जो आधुनिक बंगला साहित्य में, निस्सन्देह एक साधारण संयोजन है। उपन्यास का केन्द्र-बिन्दु, हालाँकि औरत ही है, लेकिन इसमें पुरुष-विरोधी हुंकार नहीं है, बल्कि उसके प्रति ममत्व-भाव है। सोलहवीं शती के मैमनसिंह की एक बंगाली महिला कवि की जीवनगाथा, बीसवीं शती की तीन अलग-अलग औरतों की कथा में घुल-मिल गई है। एक चिरन्तन मानवी की व्यथा-कथा; जिसमें रचे-बुने गए हैं, अतल मन की गहराइयों के अनगिनत अहसास!
हम सबकी ज़िन्दगी में परत-दर-परत अनगिनत युद्ध छिड़े हुए हैं—राजनीति बनाम नैतिक सच्चाई; प्रेम बनाम दायित्व; पांडित्य बनाम सृजनात्मक प्रतिभा; पुरुष शासित नीतिबोध बनाम जगत के भीतरी मूल्यबोध; सामाजिक सुनीति बनाम मानवीय आवेग—इन तमाम ख़तरनाक विषयों की लेखिका ने जाँच-परख की है। कमाल की बात यह है कि इसके बावजूद कहीं रस-भंग नहीं हुआ है, शिल्प ने कहीं भी जीवन के स्वाभाविक प्रवाह का अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि कथा-शैली में विलक्षण रूप से एक अभिनव तत्त्व का समावेश हुआ है।
अतीत और वर्तमान, अन्तर्जीवन और बाह्य जीवन, वक्तव्य और कथा-बयानी, गद्य और पद्य, यहाँ घुल-मिलकर एकमेक हो गए हैं। रिसर्च के दौरान लिए गए नोट्स, डायरी के पन्ने, प्रेमियों के ख़त, ग्रामीण बालाओं के गीत, नायिका की विचारधारा, सम्पादक का जवाब—इस सबको मिलाकर इस कथा में, बिलकुल नए रूप में, बेहद सख़्त लेकिन बहुमुखी सत्य का सृजन किया गया है, जो कथा के शिल्प में हीरे की तरह जड़ा हुआ है; हीरे ही की तरह शुभ्र-उज्ज्वल कठोर और अखंडित रूप में जगमगाता हुआ।
Paschat Mere Haath
- Author Name:
Harsh Ranjan
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- Description: लिखना तो काफी पहले शुरू कर दिया था, कलम ने चौदह साल का वनवास गुजारा और तब उसे एक पहचान मिली, संसार के एक कोने से आ रही एक पुकार के रूप में। आज की तारीख में मेरे तीन कहानी संग्रह आपके सामने आ गए हैं और दो कविता संग्रह की शुरुआत मैं पश्चात मेरे हाथ से कर रहा हूँ। मेरी कविताओं के आठ संग्रह तैयार हो गए थे लेकिन मैंने दो-दो संग्रह के एक संग्रह बनाकर उन्हे निकालने की सोची है। पश्चात मेरे हाथ संग्रह को मैं नया या कि पहली रचना नहीं कह सकता, जिस तरह से कहानियों के बारे में कहता हूँ लेकिन इनमे से कई कविताएं एक दौर की शुरुआत जरूर थे, एक धीमी शुरुआत। कविताओं में ये सब लक्षित होता है। ज़्यादातर कवितायें व्यक्ति के लिए हैं कुछ राजनैतिक रंग भी है, महीने भर का राशन जैसी कविताओं मे ये दिखता है। कई कविताओं मे खुद मेरे लिए आश्चर्यजनक है कि विचारों की जबर्दस्त तीक्ष्णता है.ऐसा होता है जब लोग एक क्षण में कई क्षण गुजारते हैं और अपने जीवन के विभिन्न दौरों में मैंने ये खूब किया है। मेरा खुद का सोचना है कि मैं लेखक से पहले कवि रहा हूँ और खुद से आशा करता हूँ कि मेरी कविताएं मेरी उम्मीदें पूरी करें। जीवन के उस महायुग के पश्चात जो मेरे हाथ है वो आपके सामने है।
Aakhiri Kalaam
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Doodhnath Singh
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Description:
यह कथा-कृति उपन्यास की सारी सीमाओं और लालचों को उलट-पुलट देती है। चरित्रों के टकराव से कथा का विकास—यह जो उपन्यास-लेखन की आदत बन चुकी है, यहाँ इस आदत से लगभग इनकार है। फिर भी यह कथा-कृति एक उपन्यास ही है। इसमें गद्य और वृत्तान्त का एक अजब संयोजन है, जहाँ से ढाँचागत वर्जनाएँ समाप्त होती हैं और कथा का विस्तार और खुलापन बातों और विचारों को आमंत्रित करते-से लगते हैं। गद्य और गल्प का एक नया रसायन तैयार होता है जो अपने रस और सुर से अद्भुत पठनीयता पैदा करता है। इस तरह यह उपन्यास गल्प की एक नई, अबाध निरन्तरता का प्रमाण है।
इस उपन्यास में मिथकीय संस्कृति के विश्लेषण की एक पवित्र और निहत्थी छटपटाहट है। मिथक को इतिहास में बदलने की कोशिशों का पर्दाफाश है; विचार, संरचना और संस्कृति पर एकल बहसों का निर्वेद है। इसी के भीतर कहानी के तार बिखरे पड़े हैं। इन्हीं तकलीफ़ों के भीतर से इतिहास के उन सूत्रों को ढूँढ़ने का प्रयत्न है, जो एक मिले-जुले समाज की बुनियाद हैं और जिनको उलट-पुलट देने की बर्बर आहटें इधर चौतरफ़ा सुनाई दे रही हैं। इसी तरह यह उपन्यास अपने समय के संसार की एक चित्र-रचना बनता है। अपने अतीत, इतिहास, मिथक और साहित्य-संस्कृति को उकेरता-उधेड़ता हुआ उसकी एक विस्फोटक और स्तब्धकारी पुनर्रचना सामने रखता है। उन बातों, अर्थों और व्याख्याओं को सामने लाता है, जो उसी में छुपी थीं लेकिन लोग और समाज, संस्कृति और विचार के धनुर्धर उसकी ओर से अक्सर आखें मूँदे रहते हैं।
अन्तत: यह उपन्यास हमारे अतीत और वर्तमान की एक नई ‘पोलेमिक्स' है। इंसाफ़ की इच्छा का एक दुखद-द्वंद्वात्मक संवाद है, जो अपने लोगों और अपनी जनता को ही सम्बोधित है।
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