Beech Ki Deewar
Author:
AmarkantPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
आज़ादी के बाद कथाकार के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित करनेवाले लेखकों में अमरकान्त का नाम सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। अमरकान्त की शक्ति-सम्पन्न कहानियाँ, जहाँ भारतीय समाज की आशा-आकांक्षाओं को गहरी संवेदना से रूपायित करती हैं, वहीं सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव के उसके संकल्पों को भी अभिव्यक्त करती हैं। अमरकान्त की रचनाओं में छद्म आधुनिकता नहीं है और उनकी भाषा साफ़-सुथरी तथा लेखन-शैली सर्वथा</p>
<p>नई और मौलिक है। उनकी कृतियाँ आज के जीवन की वास्तविकता को कई स्तरों पर उद्घाटित करती हैं और जब वे उनकी व्यंग्य की धार देते हैं तो वे एक ओर मानव-मन का आन्तरिक संस्कार करती हैं, वहीं दूसरी ओर आस्था, विश्वास व संघर्ष की प्रेरणा भी देती <br>हैं।</p>
<p>कहानियों की तरह ही अमरकान्त के कई उपन्यास भी महत्त्वपूर्ण हैं, जिनमें ‘सूखा पत्ता’ हिन्दी साहित्य की स्थायी निधि है। प्रस्तुत उपन्यास ‘बीच की दीवार’ मध्यम वर्ग की बदलती हुई परिस्थितियों एवं मनःस्थितियों का विश्लेषण करनेवाली एक विशेष कृति है। इसमें अमरकान्त ने आज के जीवन के अन्तर्द्वन्द्वों एवं अन्तर्विरोधों की प्रामाणिक तस्वीर प्रस्तुत की है। इस उपन्यास के केन्द्र में एक ऐसी नारी है, जो आज की अवसरवादी ज़िन्दगी के भँवर-जाल में फँसकर संघर्ष करती है, आगे बढ़ती है और विकास की वांछित मंज़िल प्राप्त करने में सफल होती है। पूरा उपन्यास जहाँ हमें आनन्दित करता है, वहीं सामाजिक बदलाव के लिए आस्था व विश्वास भी प्रदान करता है।
ISBN: 9788126716302
Pages: 144
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Gorakhgatha
- Author Name:
Ram Shankar Mishra
- Book Type:

-
Description:
महायोगी गोरक्षनाथ एक महान समाज-दृष्टा थे। भारतीय इतिहास में मध्यकाल को संक्रान्ति काल भी कहा जाता है। इस युग में भोगवाद की प्रतिष्ठा थी। उच्च वर्ग भोगवादी था और निम्न वर्ग भोग्य था। महायोगी गोरक्षनाथ ने सामाजिक पुनरुत्थान तथा सामाजिक नवादर्शों की प्रस्थापना के लिए उस भोगात्मक साधना का प्रबल विरोध किया। वे निम्न वर्ग और समाज के लिए आराध्य देवता के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे। योग और कर्म की सम्यक् साधना उन्होंने की थी।
गोरक्षनाथ योगमार्गी होते हुए भी एक महान रचनाधर्मी साधक थे। उन्होंने हिन्दी और संस्कृत भाषाओं में अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। गोरक्षनाथ के शब्दों में अनुशासन भी है और बेलाग फक्कड़पन भी। उनकी काव्याभिव्यक्तियों में कबीर की काव्य-वस्तु के स्रोत मिलते हैं। गोरक्षनाथ अन्याय तथा शोषण के प्रति तेजस्वी हस्तक्षेप थे। पीड़ितों एवं शोषितों को दुख तथा शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने जनन्दोलनों का भी प्रवर्तन किया था। वे यायावर थे। दक्षिणात्य और आर्यावर्त में भ्रमण करते रहे और जनभाषा तथा जनसंस्कृति का साक्षात्कार करते रहे। अनेक जनश्रुतियाँ उनके व्यक्तित्व को महिमामंडित करने के लिए प्रचलित हैं। लेकिन इस औपन्यासिक कृति में मिथकों को तद् रूपों में स्वीकार न करते हुए वैज्ञानिक दृष्टि से उनका विश्लेषण किया गया है। यात्रा-वृत्तान्त और जीवनी के आस्वाद से भरपूर यह उपन्यास भारतीय आध्यात्मिक इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण दौर से परिचित कराता है।
A Soldier's Daughter
- Author Name:
Nupur Luthra
- Book Type:

- Description: This is the life story of a young girl who is an army officer's daughter. Brought up in the private army quarters, she somehow prefers to lead an everyday civilian life. Despite her parents' (army officers) insistence, she opts out of any profession remotely related to "Army, Navy or Air-force". From schooling to college to professional life, she is perennially confused if she belongs to the elite army circle or the mundane civilian world. Having a first-hand experience of living both lives, she narrates the exciting events from her dual life. From the best of both lives to the worst, she gives an unbiased account of what it is to be a part of the army and yet lives a civilian life. An exciting account of a young girl who reveals what it is to live two lives at once!
Arkadipt
- Author Name:
Usha Priyamvada
- Book Type:

-
Description:
अर्कदीप्त अपने आप में डूबा, बहुत थोड़े में सन्तुष्ट, और जीवन को नितान्त अपनी दृष्टि से देखनेवाला बच्चा था; जिसे कुछ नहीं चाहिए था, जो मिलता उसी में सन्तुष्ट।
फिर उसके जीवन में प्रेम आया, जिसने उसके अन्तस को उस ऊर्जा से भरना शुरू किया; जो उसके अस्तित्व की वास्तविक ज़रूरत थी। पूर्ण प्रेम, अकुंठ समर्पण, सर्वांग साहचर्य। सौदामिनी और अर्कदीप्त ने परदेसी भूमि के मुक्त वातावरण में एक दूसरे के मन, आत्मा और देह में वह स्थान पाया जो नियति ने उन्हें उपहार की तरह दिया था। लेकिन सौदामिनी जब अपने अतीत से उत्पन्न कमिटमेंट फ़ोबिया के चलते कुछ पल अज्ञात में विलीन हुई; तो अर्कदीप्त अपने इस पहले प्रेम की टूटन से बिखरा, जला और फिर राख हो गया जिसे परिवार और शुभचिन्तकों ने परम्परा को सौंप दिया। लेकिन उसने दुख के सूरज को बुझने नहीं दिया, उसे अपनी आत्मा के क्षितिज पर अक्षुण्ण रहने दिया और फिर, जैसे ब्रह्मांड के आदेश पर, उसे अपनी खोई दिशा के संकेत मिलने लगे, और वह सब कुछ जहाँ का तहाँ छोड़कर चला गया; सबके लिए विलुप्त।
यह वरिष्ठ कथाकार उषा प्रियम्वदा का नया उपन्यास है। जीवन के सूक्ष्मतम विवरणों से समृद्ध और उन्हीं के बीच आत्मोपलब्धि के निर्णायक पलों को रेखांकित करती हुई एक समर्थ, परिपक्व लेखनी की रचना। यहाँ उपन्यास विधा अपने पूरेपन में घटित होती प्रतीत होती है। भाषा के उदार और सजीव विस्तार में कथा को अपने सम्पूर्ण में खुलने का अवकाश देती हुई। भारत, जर्मनी, डेनमार्क और अमेरिका के कई शहरों में फैली यह कथा प्रेम के विराट को उद्घाटित करती है और अनेकानेक पात्रों के माध्यम से जीवन के तमाम पहलुओं से होकर गुज़रती है।
Deerghatapa
- Author Name:
Phanishwarnath Renu
- Book Type:

-
Description:
आज के युग में जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला हो, चरित्रहीनता पराकाष्ठा पर हो, अपने और पराये का भाव-बोध जड़ जमाए बैठा हो, चारों ओर ‘हाय पैसा, हाय पैसा’ की अफरा-तफरी मची हो, ऐसे माहौल में शान्तिपूर्वक जीवन बसर कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं।
बेला गुप्त भी सहज जीवन जीना चाहती थी, लेकिन उनके साथ क्या हुआ? कई हादसों से गुज़रने के बावजूद वह टूटी नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य-पथ पर अग्रसर रही। लेकिन आज...?
आज वह टूट चुकी है। ईमानदारी, कार्य के प्रति निष्ठा—उसके लिए अब बेमानी हो चुकी है। जैसे सारी चीज़ों पर से उसका मोहभंग हो गया हो! और यही वजह है कि दूसरों के अपराधों को स्वीकार कर वह जेल-जीवन अपना लेती है।
‘दीर्घतपा’ फणीश्वरनाथ रेणु का एक मर्मस्पर्शी उपन्यास है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने जहाँ वीमेंस वेलफ़ेयर की आड़ में महिलाओं के यौन उत्पीड़न को उजागर किया है, वहीं सरकारी वस्तुओं की लूट-खसोट पर से पर्दा हटाया है।
Undertow
- Author Name:
John F. Deane
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Mitro Marjani
- Author Name:
Krishna Sobti
- Book Type:

-
Description:
रघुवीर सहाय की पंक्ति है—जिसका भाव है कि इस दुनिया के सिर पर अँधेरे में अगर मैं एक डंडा मारूँ तो यह किस भाषा में चीखेगी? मित्रो इस कहानी में संयुक्त परिवार की भीरु आत्मतुष्ट दुनिया के सिर पर पड़नेवाले डंडे की चोट है।
चरित्र की दृष्टि से मित्रो हिन्दी कहानी की अभूतपूर्व पात्र है। इस गृहस्थी में पता नहीं कहाँ से टपक पड़ी है, उसने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है। ऐसा सजीव, सदेह पात्र किसी परिवार को तोड़ देता, पति को पागल कर देता, हत्या हो जाती। लेकिन मित्रो को ऐसे धर्मभीरु, मध्यवर्गीय, परिवार में डालकर कृष्णा सोबती ने बेलौस टक्कर की योजना की है। यह टक्कर बहुत तेज़ है लेकिन ख़तम नहीं होती। विरोधी स्थितियाँ पूरी कथा-अवधि में सक्रिय रहती हैं अनेक दाँव-पेंच करती हुई। पूरी कहानी इस टक्कर से स्पन्दित है।
मित्रो इसलिए भी अभूतपूर्व है कि बहुत सहज है। यह अभूतपूर्वता असामान्यता नहीं, वास्तविकता से उपजी है। मित्रो जैसे व्यक्ति समाज में थे, उन्हें साहित्य में नहीं लाया गया था—हिन्दी कहानी में नहीं लाया गया था। मित्रो कोई मनोविश्लेषणात्मक या असामान्य पात्र नहीं।
हिन्दी में उस जैसी स्त्री का प्रवेश पहली बार हुआ। कृष्णा सोबती ने ऐसे भरपूर पात्र को केन्द्र में रखकर यह कहानी लिखी, यह नई बात है। इसके लिए बहुत साहस, निर्ममता और ममता की ज़रूरत पड़ी होगी। यह सब बहुत-बहुत आत्मीय परिचय, पात्र से तादात्म्य के बिना सम्भव नहीं था।
—विश्वनाथ त्रिपाठी
कुछ कहानियाँ : कुछ विचार पुस्तक से
Ateet Ke Chalchitra
- Author Name:
Mahadevi Verma
- Book Type:

- Description: ‘अतीत के चलचित्र’ हिन्दी गद्य की एक अप्रतिम रचना है। इतने दिनों बाद आज भी संवेदना के वे धरातल अछूते और अपूर्व हैं जिनकी सृष्टि इन रेखाचित्रों द्वारा हुई थी। मानवीय सहानुभूति और संवेगों की गहनता के लिए इन्हें चिरकाल तक हिन्दी साहित्य का शीर्षस्थ पद प्राप्त रहेगा।
Agnisnan Evam Anya Upanyas
- Author Name:
Rajkamal Chaudhary
- Book Type:

- Description: राजकमल चौधरी की लेखनी जीवन के सांगोपांग चित्रण, जीवन जीनेवालों के समाज और प्रकृति से सम्बन्धित सन्दर्भों के साथ-साथ चलती है। नारी समलैंगिकता, यौन-विकृति, फ़िल्म-कल्चर, महानगरों के निम्नवर्गीय समुदाय आदि विषयों को राजकमल ने अपने उपन्यास लेखन का मूल केन्द्र बनाया। हिन्दी में लिखे इनके लगभग सभी उपन्यास इन्हीं विषयों पर आधारित हैं। निम्न मध्यवर्ग से उच्च मध्यवर्ग के बीच के इनके सारे पात्र अपनी आवश्यकताओं की अभिलाषा एवं उनकी पूर्ति हेतु घनघोर समस्याओं, विवशताओं से आक्रान्त दिखते हैं। कतरा-भर सुख-सुविधा के लिए, अपनी अस्मिता बचा लेने के लिए जहाँ व्यक्ति को घोर संघर्ष करना पड़े, वहीं से राजकमल का हर उपन्यास शुरू होता है। इस संकलन में राजकमल चौधरी के पाँच उपन्यास संग्रहीत किए गए हैं—‘अग्निस्नान’, ‘शहर था शहर नहीं था’, ‘देहगाथा’, ‘बीस रानियों के बाइस्कोप’ और ‘एक अनार : एक बीमार’। सभी उपन्यास बीती सदी के पाँचवें दशक से आई शिल्पगत और कथ्यगत नवीनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके उपन्यासों में शिल्प एवं कथ्य प्रयोग अनूठे और एक सीमा तक चौंकानेवाले हैं। राजकमल की रचनाओं पर अक्सर अश्लीलता का आरोप लगता रहा है लेकिन जब स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की चर्चा चिकित्साशास्त्र के पन्नों पर अश्लील नहीं है, व्यक्ति के दैनिक क्रियाकलाप में अश्लील नहीं है, तब वह साहित्य में आकर कैसे अश्लील हो जाएगी? यदि मुट्ठी-भर लोग पूरे देश के आम नागरिक की सुख-सुविधा अपने फ़्लैट में क़ैद कर लेते हैं, अभावग्रस्त और विवश नारियों को थोड़े से अर्थ के बल पर अपने बिस्तर पर खिलौना बनाकर इसे वैध और उचित ठहराते हैं और यह आचरण अश्लील नहीं है तो फिर इसकी चर्चा कैसे अश्लील है? जनजीवन में घटती किसी भी घटना के चित्रण में राजकमल ने अश्लीलता खोजने की इच्छा नहीं की, बल्कि अश्लीलता खोजनेवालों को यहाँ तक हिदायत दे डाली कि साहित्य में अश्लीलता आरोपित करनेवाले पुलिस मनोवृत्ति के लोग उनकी किताब न पढ़ें।
Hemant Ka Panchhi
- Author Name:
Suchitra Bhattacharya
- Book Type:

-
Description:
क़ामयाब पति, दो-दो बुद्धिमान बेटे और अपनी घर-गृहस्थी में डूबी अदिति, उम्र के चालीसवें के मध्य तक पहुँचते-पहुँचते अचानक महसूस करती है कि वह भयंकर अकेली है। पति अपनी नौकरी में व्यस्त है, दोनों बेटे भी अपने-अपने आकाश में पंख फैलाए उड़ने लगे हैं। अकेली अदिति अब अपने दिन या तो अपने आपसे या पिंजरे की मैना से बातें करती हुई गुज़ारती है। उन्हीं दिनों उसकी ज़िन्दगी में हेमेन मामा दाख़िल होते हैं, उन्हीं की प्रेरणा से जाग उठती है—एक नई अदिति धीरे-धीरे वह अपनी रची-गढ़ी दुनिया में मग्न हो जाती है। ब्याह से पहले वह लेखन के क, ख, ग से परिचित हो चुकी थी। अब वह दुबारा लिखना शुरू करती है। अब जब वह अपने पति, सन्तान और गृहस्थी को नई निगाह से तौलना-परखना शुरू कर देती है, तो शुरू होता है—ज़बर्दस्त टकराव। भयंकर दर्द के काले बादल घिर आते हैं।
अदिति क्या सिर्फ़ सुप्रतिम की पत्नी-भर है? मात्रा बच्चों की माँ है? वह क्या सिर्फ़ ख़ून-मांस की मशीन-भर है, जिससे सिर्फ़ यह अपेक्षित है कि बेहद सहज-स्वाभाविक तरीक़े से गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ाती रहे? इस दायरे से बाहर क्या अदिति का कोई अस्तित्व नहीं?
सुचित्रा भट्टाचार्य की सशक्त क़लम ने ‘हेमन्त का पंछी’ में औरत के इसी सच की बेचैन तलाश को उकेरा है।
Premasharam
- Author Name:
Premchand
- Book Type:

-
Description:
‘प्रेमाश्रम’ प्रेमचन्द का सर्वप्रथम उपन्यास है, जिसमें उन्होंने नागरिक जीवन और ग्रामीण जीवन का सम्पर्क स्थापित किया है और परिवार के सीमित क्षेत्र से बाहर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में पदार्पण करते हैं।
भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम की प्रथम झाँकी और भावनागत रामराज्य की स्थापना का स्वप्न ‘प्रेमाश्रम’ की अपनी विशेषता है। इसका उद्देश्य है—‘साम्य सिद्धान्त’। ‘प्रेमाश्रम’ में जीवन-मरण के गूढ़, जटिल प्रश्नों की मीमांसा है। सभी लोग पक्षपात और अहंकार से मुक्त हैं। आश्रम सारल्य, सन्तोष और सुविचार की तपोभूमि है। यहाँ न ईर्ष्या का सन्ताप है न लोभ और उन्माद, न तृष्णा का प्रकोप। यहाँ न धन की पूजा होती है और न दीनता पैरों-तले कुचली जाती है। आश्रम में सब एक-दूसरे के मित्र और हितैषी हैं। मानव-कल्याण ही सभी का चरम लक्ष्य है। इस बात का व्यावहारिक रूप हमें उपन्यास के ‘उपसंहार’ शीर्षक अंश में मिलता है।
Shah Aur Maat : Sujata Ki Diary
- Author Name:
Rajendra Yadav
- Book Type:

-
Description:
‘शह और मात’ दूसरे प्यार की जटिल और कटु कहानी है, जहाँ अपराध-भावना से पीड़ित प्रत्येक पात्र अपना पुनरान्वेषण करता है और अन्त में अपने को एक यंत्रणादायक भ्रान्ति और छलना से घिरा पाता है।
उपन्यास की भाषा अपनी ताज़गी, अभिव्यंजना और शक्ति के लिए बार-बार प्रशंसित हुई है। इस उपन्यास को पढ़ना एक अद्भुत—लेकिन बेहद आत्मीय—अनुभव से गुज़रना है, जो अपने को देखने की नई दृष्टि देता है।
‘शह और मात’...एक शुद्ध मनोवैज्ञानिक उपन्यास है, इसमें दो व्यक्तियों के प्रति तीसरे व्यक्तित्व (यानी सुजाता) की प्रतिक्रियाओं का वर्णन है। अचरज की बात यह है कि देशकाल की स्थितियों से प्रायः कोई मदद न लेते हुए भी लेखक इस उपन्यास को इतना नाटकीय और सजीव बना देता है! सुजाता की उदय से सम्बद्ध दिलचस्पी क्रमशः अधिक तीखी और गहरी होती जाती है। यह दिलचस्पी बहुत कुछ बौद्धिक क़िस्म की है, उपन्यास की नाटकीयता भी एक ख़ास तरह का बौद्धिक मनोवैज्ञानिक विनोद करती है। उपन्यास की नाटकीयता और रोचकता का एकमात्र रहस्य उसकी मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता एवं यथार्थ की अनुकारिता है। उपन्यास का प्रत्येक पन्ना रोचक है।
—डॉ. देवराज
Sukhi Ghar Society
- Author Name:
Vinod Das
- Book Type:

- Description: v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main">‘सुखी घर सोसाइटी’ उपन्यास महानगर मुम्बई के उपनगर स्थित एक रिहाइशी परिसर का ऐसा वृत्तान्त है जिसमें क़स्बे के एक मुहल्ले की तरह विविधवर्णी जीवन की आपाधापी है, वहीं उसमें महानगर के अन्तर्द्वन्द्व, रहवासियों की हताशाएँ और उनके दैनिक संघर्ष की छोटी-छोटी ऐसी मार्मिक कथाएँ भी हैं जो रिसते ज़ख़्मों की तरह हमेशा उनके भीतर दुखती रहती हैं। लेकिन इसकी कथा-भूमि केवल महानगर तक सीमित नहीं है। इसमें गाँव से उखड़े हाशियों पर रहनेवालों की व्यथा-कथाएँ भी हैं जो महानगर पर्यटन के लिए नहीं, रोजी-रोटी के लिए आते हैं और हर दिन वहाँ तिल-तिल मरते हुए अपने गाँव लौटने का सपना देखते रहते हैं। विस्थापन की टीस, पानी की किल्लत, समय पर काम के लिए पहुँचने के लिए लोकल ट्रेन की रगड़ा-रगड़ी, बदबूदार सीवर की जानलेवा सफ़ाई, बार में नाचती देह बेचने की मजबूरी, स्थानीय भाषा न बोल पाने पर पिटाई-धुनाई जैसी तमाम ज़िल्लतों और घृणा के बीच मनुष्य अपने भीतर प्रेम सरीखी कोमल अनुभूति को किस तरह बचाता है, यह उपन्यास इसका अद्भुत आख्यान है। इसमें जहाँ मुम्बई के इतिहास की हल्की झलक है, वहीं देश की दरकती हुई लोकतान्त्रिक व्यवस्था का वर्तमान भी है। उपन्यास में वर्तमान और इतिहास की सहज आवाजाही हमें विस्मित करती है। इसे पढ़ते हुए जहाँ बार-बार इस बात की पुष्टि होती है कि इतिहास को बीते समय का कंकाल मानने से इसकी स्याह छायाएँ कई बार वर्तमान की ज़मीन को भी ऊसर बनाती हैं। हालाँकि, इसके कथ्य में समय की अनुभूति इतनी गहरी है कि वह ऐतिहासिकता भी रचती चलती है। सोसाइटी के बहुसंख्य फ़्लैटों की तरह इसकी कथा में विविध चरित्रों का रंगारंग संसार गुंफित है। इस उपन्यास का हर अध्याय अपने आप में एक स्वतंत्र कहानी पढ़ने का विरल अनुभव देता है जबकि हर अध्याय अपने में स्वायत्त होने के बावजूद अपने पूर्व के अध्याय की कोख से निकला भी लगता है। कहना न होगा कि काव्यात्मक भाषा में अपने समय की धड़कनों को जीवित यथार्थ की तरह अपनी रक्त की धमनियों में पढ़ना आज के अमानवीय दौर में मनुष्य बने रहने के लिए एक सकारात्मक कारवाई है जिसकी सृजनात्मक कसौटी पर विनोद दास का यह उपन्यास पूरी तरह खरा उतरता है।
Naukar Ki Kameez
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
- Rating:
- Book Type:

- Description: ‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल तिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
Koi Baat Nahin
- Author Name:
Alka Saraogi
- Book Type:

-
Description:
“तभी हवा का एक झोंका न जाने क्या सोचकर एक बड़े से काग़ज़ के टुकड़े को शशांक के पास ले आया। उसने घास से उठाकर उसे पढ़ा—‘आदमी का मन एक गाँव है, जिसमें वही एक अकेला नहीं रहता।’ शशांक ने सोचा, आदमी मन में ही तो अपने को और अपनी सारी बातों को छिपाकर रख सकता है...’’
‘कोई बात नहीं’ जैसे एक मंत्र है—हार न मानने की ज़िद और नई शुरुआतों के नाम। समय के एक ऐसे दौर में जब प्रतियोगिता जीवन का परम मूल्य है और सारे निर्णय ताक़तवर और
समर्थ के हाथ में हैं, वेदना, जिजीविषा और सहयोग का यह आख्यान ऐसे तमाम मूल्यों का प्रत्याख्यान है।
मोटे तौर पर इसे शारीरिक रूप से कुछ अक्षम एक बेटे और उसकी माँ के प्रेम और दु:ख की
साझेदारी की कथा के रूप में देखा जा सकता है, पर इसका मर्म एक सुन्दर और सम्मानपूर्ण जीवन की आकांक्षा है, बल्कि इस हक़ की माँग है। शशांक सत्रह साल का एक लड़का है जो दूसरों से अलग है क्योंकि वह दूसरों की तरह चल और बोल नहीं सकता। कलकत्ता के एक नामी मिशनरी स्कूल में पढ़ते वक़्त अपनी ग़ैरबराबरी को जीते हुए, उसका साबिका उन तरह-
तरह की दूसरी ग़ैरबराबरियों से भी होता रहता है, जो हमारे समाज में आसपास कुलबुलाती रहती है। स्कूल में शशांक का एकमात्र दोस्त है—एक एंग्लो-इंडियन लड़का आर्थर सरकार जो उसी की तरह एक क़िस्म का जाति-बाहर या आउटकास्ट है—अलबत्ता बिलकुल अलग कारणों से।
शशांक का जीवन चारों तरफ़ से तरह-तरह के कथा-क़िस्सों से घिरा है। एक तरफ़ उसकी आरती मौसी है, जिसकी प्रायः खेदपूर्वक वापस लौट आनेवाली कहानियों का अन्त और आरम्भ शशांक को कभी समझ में नहीं आता। दूसरी तरफ़ उसकी दादी की कहानियाँ हैं—दादी के अपने घुटन-भरे बीते जीवन की, बार-बार उन्हीं शब्दों और मुहावरों में दोहराई जाती कहानियाँ, जिनका कोई शब्द कभी अपनी जगह नहीं बदलता। लेकिन सबसे विचित्र कहानियाँ उस तक पहुँचती हैं जतीन दा के मार्फ़त, जिनसे वह बिना किसी और के जाने, हर शनिवार विक्टोरिया मेमोरियल के मैदान में मिलता है। ये सभी कहानियाँ आतंक और हिंसा के जीवन से जुड़ी कहानियाँ हैं जिनके बारे में हर बार शशांक को सन्देह होता है कि वे आत्मकथात्मक हैं, पर इस सन्देह के निराकरण का उसके पास कोई रास्ता नहीं है।
तभी शशांक के जीवन में वह भयानक घटना घटती है जिससे उसके जीवन के परखच्चे उड़ जाते हैं। ऐसे समय में यह कथा-अमृत ही है जो उसे इस आघात से उतारता है; साथ ही उसे संजीवन मिलता है उस सरल, निश्छल, अद् भुत प्रेम और सहयोग से जो सब कुछ के बावजूद दुनिया को बचाए रखता आ रहा है। और तब उसकी अपनी यह कथा, जो आरती मौसी द्वारा लिखी जा रही थी, पुनः जीवित हो उठती है—कथामृत के आस्वादन से जागी कथा।
Pavallai
- Author Name:
K. Chinnappa Bharti
- Book Type:

-
Description:
समाजवादी विचारधारा के जाने-माने तमिल उपन्यासकार कु. चिन्नप्प भारती की कृति ‘पवलाई’ उनकी अन्य रचनाओं से अलग पहचान रखती है, कथा और वस्तु-शिल्प दोनों के लिहाज़ से। इसमें वर्ग संघर्ष या मज़दूर समस्याओं को नहीं उछाला गया है, प्रत्युत अपने सच्चे प्रेम को शाश्वत बनाने के लिए एक नारी द्वारा छेड़ी गई ज़बर्दस्त मुहिम इसका केन्द्रबिन्दु है। जाति-बिरादरी के निहित स्वार्थों के चलते प्रेमी को छोड़कर पड़ोसी गाँव के पेरियण्णन का हाथ पकड़ने को मजबूर पवलाई मन-मन्दिर में प्रेमी को देवता के रूप में स्थापित करके गृहस्थी के जुए को कन्धे पर ढोते हुए समर्पित पत्नी और कुशल गृहिणी के रूप में पति और गाँववालों का मन मोह लेती है। गाँव में प्रेमी लकवा का शिकार होता है तो उसे सहारा देने के लिए पति को तज देती है। इधर शादी के चन्द महीनों बाद पवलाई के पिछले प्रेम के बारे में जान लेने पर भी पेरियण्णन इसी प्रत्याशा मन ही मन उसे क्षमा कर देता है कि वह अबोध अवस्था की सहज दुर्बलता थी जो दुहराई नहीं जाएगी।
बचपन से ही अनाथ और जीवन-संघर्षों से अनुभव-प्राप्त पेरियण्णन इतना सुलझा हुआ है कि पत्नी की निष्ठा पर कभी सवाल नहीं उठाता। किन्तु दस साल की सुखमय गृहस्थी पवलाई के साहसिक क़दम के कारण ताश के घर के समान गिर जाती है। परियण्णन हताश तो होता है, पर मानसिक सन्तुलन नहीं खोता। पत्नी द्वारा बुरा-भला कहने पर भी उत्तेजित नहीं होता। पवलाई के व्यंग्य-बाणों को अपने तर्कों से निरस्त करता वह सीधा-सादा गृहस्थ विदेहराज जनक की दार्शनिकता और युधिष्ठिर की क्षमाशीलता को भी मात कर देता है।
उसके जीवन में विधवा तंकम्मा का प्रवेश परिस्थितिजन्य था और यह उजास भी अल्पकालिक ही रही। विधवा नारी के दाम्पत्य जीवन के प्रति समाज के कटाक्ष और विधवा पुत्र को हेय दृष्टि से देखने की कुटिल मनोवृत्ति को सहन न कर पाने से तंकम्मा अपने जीवन का अन्त कर लेती है और यों पेरियण्णन के जीवन में फिर से अँधेरा छा जाता है। समाज के इन अर्थहीन आचार-विचारों से विरक्त पेरियण्णन अपने आड़े वक़्तों में साथ देनेवाले दलित नौकर रामन को अपनी जायदाद का वारिस घोषित करते हुए अपने आपको भी उसी को सौंप देता है। इस तरह तीन-चार पात्रों के मानसिक संघर्षों के बारी-बारी से चित्रण के चलते एक पूरा समाज अपनी आस्थाओं और अन्धविश्वासों के साथ पाठक के सामने साकार होता है...
Kathghare
- Author Name:
Ballabh Sidharth
- Book Type:

-
Description:
“जब कभी अपनी अजीबोग़रीब हरकतों के पीछे अपने अन्तश्चेतन की प्रेरणाओं को एक कोलाज में रखकर देखता हूँ तो एक अजीब-सा चित्र बनता है मेरे व्यक्ति का। सिर से जानवर। धड़ से मनुष्य जैसा। सुअर मानव।...वाराह अवतार। बस इसमें से अवतार की दिव्यता हटा दें। गले तक कटीले, आशाओं और कामनाओं से भरी जीवन की अपनी चिथड़ा-चिथड़ा हुई गठरी को सँभाले। अपनी इसी गर्हित भूमिका में अपनी सार्थकता और मुक्ति की तलाश करता हुआ...”
—इसी उपन्यास से।
बाहर से एक छोटी-सी जीवन स्थिति लेकिन गहरे में कितने-कितने द्वन्द्वों, तनावों, समझौतों की दुनिया जिसमें हर व्यक्ति पल-प्रतिपल टूट रहा है, ढह रहा है...फिर भी अपने को बचाए रखने की कोशिश-दर-कोशिश किए जा रहा है। भ्रष्ट और जर्जर आदमी के ढाँचे में मनुष्यता की दीप्ति जलती हुई। इसलिए आशा अब भी है!
बल्लभ सिद्दार्थ ने इस छोटे-से उपन्यास को लिखने में दस से ज़्यादा वर्ष लगाए हैं। पात्र गिने-चुने हैं पर प्रत्येक के भीतर कितना विशाल संसार...कहानी छोटी-सी—गिने-चुने लोगों का जीवन-संघर्ष, पर ज्यों-ज्यों वह खुलता है, आधुनिक भारतीय समाज की हज़ारों विसंगतियों को उकेरता है...और सब कुछ लेखक की कलात्मक छुअन से—जहाँ फैलाकर कुछ नहीं कहा जाता, इशारा-भर कर दिया जाता है।
अगर साहित्य ज़िन्दा रहने की ताक़त पाने के लिए पढ़ा जाता है तो ‘कठघरे’ एक उम्दा मिसाल है, जिसकी जीवन-दर्शन से भरी कितनी पंक्तियों को संचित किया जा सकता है, उनसे लटककर जीवन काटा जा सकता है।
Dhuppal
- Author Name:
Bhagwaticharan Verma
- Book Type:

-
Description:
यह एक निर्विवाद तथ्य है कि अपने कथा-कृतित्व में अनेकानेक व्यक्ति-चरित्रों को उकेरनेवाले साधनाशील रचनाकारों का अपना जीवन भी किसी महान कृति से कम महत्त्व नहीं रखता, इसलिए उन विविध जीवनानुभवों को यथार्थतः काग़ज़ पर उतार लाना एक महत्त्वपूर्ण सृजनात्मक उपलब्धि ही माना जाएगा। इस नाते सुविख्यात कृती-व्यक्तित्व भगवतीचरण वर्मा की यह कथाकृति आत्मकथात्मक उपन्यासों में एक उल्लेखनीय स्थान की हक़दार है।
क़स्बे का एक बालक कैसे भगवतीचरण वर्मा के रूप में स्वनामधन्य हुआ, इसे वह स्वयं भी नहीं जानता। जानता है तो सिर्फ़ उस जीवन-संघर्ष को जिसे वह ‘धुप्पल’ करार देता है।
आत्मकथा न लिखकर भगवती बाबू ने यह उपन्यास लिखा, यह बात उनके रचनाशील मन की अनवरत सृजनात्मक सक्रियता की ही सूचक है। ‘धुप्पल’ में जो गम्भीरता है, वह भगवती बाबू के चुटीले भाषा-शिल्प के बावजूद, अपनी तथ्यात्मकता का स्वाभाविक परिणाम है। लेखक के साथ-साथ इसमें एक युग मुखर हुआ है, जिसके अपने अन्तर्विरोध अगर लेखकीय अन्तर्विरोध भी रहे तो उन्होंने उसके सृजन को ही धारदार बनाया। इसलिए ‘धुप्पल’ सिर्फ़ ‘धुप्पल’ ही नहीं, लेखकीय संघर्ष का सार्थक दस्तावेज़ भी है।
Bisat Par Jugnu
- Author Name:
Vandana Rag
- Book Type:

-
Description:
‘बिसात पर जुगनू’ सदियों और सरहदों के आर-पार की कहानी है। हिन्दुस्तान की पहली जंगे-आज़ादी के लगभग डेढ़ दशक पहले के पटना से शुरू होकर यह 2001 की दिल्ली में ख़त्म होती है। बीच में उत्तर बिहार की एक छोटी रियासत से लेकर कलकत्ता और चीन के केंटन प्रान्त तक का विस्तार समाया हुआ है। गहरे शोध और एतिहासिक अन्तर्दृष्टि से सम्पन्न इस कथा में इतिहास के कई विलुप्त अध्याय और उनके वाहक चरित्र जीवन्त हुए हैं। यहाँ 1857 के भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम की त्रासदी है तो पहले और दूसरे अफीम युद्ध के बाद के चीनी जनजीवन का कठिन संघर्ष भी। इनके साथ-साथ चलती है, समय के मलबे में दबी पटना कलम चित्र-शैली की कहानी, जिसे ढूँढ़ती हुई ली-ना, एक चीनी लड़की, भारत आई है। यहाँ फिरंगियों के अत्याचार से लड़ते दोनों मुल्कों के दु:खों की दास्तान एक-सी है और दोनों ज़मीनों पर संघर्ष में कूद पड़नेवाली स्त्रियों की गुमनामी भी एक-सी है। ऐसी कई गुमनाम स्त्रियाँ इस उपन्यास का मेरुदंड हैं। ‘बिसात पर जुगनू’ कालक्रम से घटना-दर-घटना बयान करनेवाला सीधा (और सादा) उपन्यास नहीं है। यहाँ आख्यान समय में आगे-पीछे पेंगें भरता है और पाठक से, अक्सर ओझल होते किंवा प्रतीत होते कथा-सूत्र के प्रति अतिरिक्त सजगता की माँग करता है।
—संजीव कुमार
Gujrat Pakistan Se Gujrat Hindustan
- Author Name:
Krishna Sobti
- Book Type:

-
Description:
रक्तरंजित इतिहास के उस हिंस्र और क्रूर अध्याय को क्यों तो याद करें और कैसे उसे भूल जाएँ! सदियों-सदियों के बाद देश में अवतरित होनेवाली आज़ादी हर हिन्दुस्तानी दिल में धड़कती रही थी। इस उमगती विरासत को राजनीतिक शक्तियों ने विभाजित कर देश का नया भूगोल और इतिहास बना दिया। नई सरहदें खींच दीं। सरहदों के आर-पार दौड़ती लाशों से भरी रेलगाडिय़ाँ स्टेशनों के बाहर अँधेरों में खड़ी कर दी जाती रहीं। हज़ारों-हज़ारों की भीड़ वाले क़ाफ़िले अपने ही क़दमों में गुम हो बेनाम ख़ामोशियों की धूल में जा मिले। फिर भी हर हिन्दुस्तानी के दिल में धड़कता यह अहसास था कि विभाजन के अँधेरों में उपजी 'आज़ादी' एक पवित्र शब्द है—हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और बरकतों का प्रतीक।
बँटवारे के बाद बना पाकिस्तान उस त्रासदी से पहले जिनके लिए अपना प्यारा हिन्दुस्तान था; वे लोग, अपने ही आज़ाद मुल्क में जिनके क़दम विस्थापित शरणार्थियों के भेस में पड़े, यह उपन्यास उन उखड़े और दर-ब-दर लोगों की रूहों का अक्स है।
यही वह समय था जब भारत की आज़ादी ने एक और कहानी लिखना शुरू की, जिसका मक़सद अपने औपनिवेशिक अतीत को धोना था। ‘रियासतों का विलय’ शुरू हो रहा था। इस उपन्यास का ताल्लुक़ इतिहास के इस अध्याय से भी है।
और सबसे नज़दीकी सम्बन्ध इस कृति का उस शख़्सियत से है जिसे हम कृष्णा सोबती के नाम से जानते हैं। बँटवारे के दौरान अपने जन्म-स्थान गुजरात और लाहौर को यह कहकर कि 'याद रखना, हम यहाँ रह गए हैं', वे दिल्ली पहुँची ही थीं कि यहाँ के गुजरात ने उन्हें आवाज़ दी और अपनी स्मृतियों को सहेजते-सँभालते वे अपनी पहली नौकरी करने सिरोही पहुँच गईं, जहाँ उनमें अपने स्वतंत्र देश का नागरिक होने का अहसास जगा; व्यक्ति की ख़ुद्दारी और आत्मसम्मान को जाँचने-परखने के लिए सामन्ती ताम-झाम का एक बड़ा फलक मिला। और मिले सिरोही रियासत के दत्तक पुत्र महाराज तेज सिंह— एक बच्चा, जो भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच सहमा खड़ा अपनी शिक्षिका से पूछ रहा था, 'मैम, बेदख़ल का मतलब क्या होता है?’
उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास में लगभग सभी घटनाएँ और पात्र वास्तविक हैं।
Love In Jamshedpur
- Author Name:
Ajitabha Bose
- Rating:
- Book Type:

- Description: Do you remember who was your first crush? Did you too dream of marrying her? Everyone does somehow, isn't it? So did Arnab! When he saw simpi for the very first time, he fell in for a forever-love. Yet, the dream took a different turn when she rejected him time and again. What lies ahead? Will Arnab be able to impress his first love? Or will he fail, again? Bestselling author, ajitabha Bose brings to you a true tale of love based in the small town of Jamshedpur.
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book