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तसनीम ख़ान की ये कहानियाँ परिवार, समाज और राजनीति के अलग-अलग आयामों की गहरी पड़ताल और उनमें अंतर्निहित आख्यान को दर्ज करने की मुसलसल कोशिशों से उपजी हैं। कहानियों के परिवेश और भाषा में वर्णित संस्कृति को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है; अर्थात यह संसार कथाओं में बड़े विश्वसनीय ढंग से आया है। धर्म, स्त्री और पारिवारिक जीवन के जटिल अंतरसंबंधों को गहरी सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ कहती यह कहानियाँ अपने आप स्त्री के दुख और सांप्रदायिकता की बढ़ती विषबेल की पहचान करती चलती हैं। शीर्षक कहानी 'बावलिस्तान' मौजूदा भारतीय राजनीति और मीडिया के खोखले चरित्र को एक दिलचस्प स्थिति के सहारे नुमायाँ करती है तो वहीं ' अब्दुल की मौत' भी मौत के बाद की काल्पनिक परिस्थिति में सांप्रदायिकता की समस्या का परीक्षण करती है। कहानियों में गहरी रागात्मकता है, बोली का सुंदर रचाव है और स्पष्ट राजनैतिक समझ है ।
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तसनीम ख़ान की ये कहानियाँ परिवार, समाज और राजनीति के अलग-अलग आयामों की गहरी पड़ताल और उनमें अंतर्निहित आख्यान को दर्ज करने की मुसलसल कोशिशों से उपजी हैं। कहानियों के परिवेश और भाषा में वर्णित संस्कृति को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है; अर्थात यह संसार कथाओं में बड़े विश्वसनीय ढंग से आया है। धर्म, स्त्री और पारिवारिक जीवन के जटिल अंतरसंबंधों को गहरी सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ कहती यह कहानियाँ अपने आप स्त्री के दुख और सांप्रदायिकता की बढ़ती विषबेल की पहचान करती चलती हैं। शीर्षक कहानी 'बावलिस्तान' मौजूदा भारतीय राजनीति और मीडिया के खोखले चरित्र को एक दिलचस्प स्थिति के सहारे नुमायाँ करती है तो वहीं ' अब्दुल की मौत' भी मौत के बाद की काल्पनिक परिस्थिति में सांप्रदायिकता की समस्या का परीक्षण करती है। कहानियों में गहरी रागात्मकता है, बोली का सुंदर रचाव है और स्पष्ट राजनैतिक समझ है ।
Book Details
-
ISBN9789347125805
-
Pages230
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age0-11 yrs
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Country of OriginIndia
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‘आशा’ उपन्यास की नायिका स्वयं अपनी कहानी सुनाती है। सेठ कालिन्दी प्रसाद आशा अर्थात् जानकी बाई को अपनी रखैल बनाना चाहता है। निर्धन दुकानदार बाप की बेटी होने के कारण ही नवाब के हरम में पहुँचा दी जाती है और बाद में वहाँ से मुक्त होने पर जानकी बाई के रूप में नाचने-गाने का धन्धा करने लगती है। आशा नवाब और सेठ कालिन्दी प्रसाद दोनों के लिए ही स्त्री भोग की सामग्री है।
अगली कड़ी में सेठ कालिन्दी अपनी कहानी कहता है। उसका सबसे बड़ा कष्ट यह है कि रुपए के लालच में उसका पिता उसका विवाह बड़े घर की फूहड़ लड़की से कर देता है। पैसा उसके पास कितना ही हो, श्वसुर की सहायता से दूसरे विश्वयुद्ध में वह और भी कमाई करता है। लेकिन उसका पारिवारिक जीवन नरक बना हुआ है। अंग्रेज़ों और कांग्रेस दोनों के बीच सन्तुलन साधकर वह व्यापार में ख़ूब उन्नति करता है। असफल दाम्पत्य जीवन के कारण वह एक वेश्या से सम्बन्ध बनाता है और उसी से उत्पन्न बेटी का नाम वह रम्भा रखता है।
रम्भा, इसकी नियति भी बहुत भिन्न नहीं है। अलग कोठी में पाली-पोसी जाने के बावजूद उसे सोलह साल की उम्र में चालीस साल के सेठ सोनेलाल की रखैल बनने को बाध्य होना पड़ता है, क्योंकि उसके पिता सेठ कालिंदी चरण में यह साहस नहीं है कि समाज में यह कह सके कि वह उसकी बेटी है। सेठ सोनेलाल की रखैल बन जाने के बाद भी रम्भा अपने विकास के लिए संघर्ष करती है। पढ़कर एम.ए. करने के दौरान आनन्द के सम्पर्क में आती है। सोनेलाल का गर्भ धारण करके भी वह उससे घृणा करती है। आनन्द के सम्पर्क में आकर वह जनसेवा की ओर प्रवृत्त होती है और एक स्कूल चलाने लगती है।
Kissa Chamcham Pari Aur Gudiyaghar Ka
- Author Name:
Prakash Manu
- Book Type:

- Description:
हिंदी बाल साहित्य का पर्याय कहे जानेवाले प्रकाश मनु बच्चों के सिरमौर कथाकार हैं, जिनकी कहानियों और उपन्यासों को बच्चे खोज-खोजकर पढ़ते हैं। देश के कोने-कोने में फैले हजारों बच्चे उनके प्रशंसक हैं, जिन्हें मनुजी की कहानियों और नटखटपन से भरे उपन्यासों का इंतजार रहता है। उन्हें वे बड़ी दीवानगी से पढ़ते हैं, मन-ही-मन सराहते और आनंदविभोर हो उठते हैं। ‘किस्सा चमचम परी और गुडि़याघर का’ प्रकाश मनुजी के बाल उपन्यासों का ताजा संग्रह है, जिसमें बच्चों के लिए लिखे गए उनके तीन रोचक और बहुरंगी उपन्यास शामिल हैं—‘किस्सा चमचम परी और गुडि़याघर का’, ‘फागुन गाँव का बुधना और निम्मा परी’, तथा ‘सब्जियों का मेला’। ये तीनों इतने रसपूर्ण उपन्यास हैं, कि बच्चे एक बार पुस्तक हाथ में लेंगे, तो पूरा पढ़े बगैर छोड़ नहीं पाएँगे। प्रकाश मनुजी उस्ताद किस्सागो हैं, इसीलिए उनके बाल उपन्यासों में किस्सागोई का जादू पाठकों पर इस कदर तारी होता है कि लगता है, उपन्यास के पात्र सजीव होकर, उनके आसपास ही साँस ले रहे हैं। फिर इन तीनों उपन्यासों में धरती की सुंदरता की बड़ी अद्भुत छवियाँ हैं, जो बाल पाठकों को खूब लुभाएँगी और आनंदमग्न कर देंगी। बेशक, प्रकाश मनुजी के बाल उपन्यासों की यह दिलचस्प पुस्तक बच्चों और बाल साहित्यकारों के लिए एक अनमोल उपहार से कम नहीं है, जिसे वे हमेशा सँजोकर रखेंगे।
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