Vyasparva
(0)
Author:
Durga BhagwatPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
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महाभारत भारतीय मनीषा की ऐसी पूँजीभूत अभिव्यक्ति है कि इसके बारे में यह कथन अतियुक्ति नहीं लगती कि जो कुछ भारत में है वह सब महाभारत में है, और जो इसमें नहीं है वह कहीं नहीं है। आश्चर्य नहीं कि ऐसे महाग्रन्थ का अध्ययन, मनन और उसकी व्याख्या किसी के लिए भी आसान नहीं है। उसके सामाजिक आशय के सम्यक स्वरूप को पहचानना अथवा विशद रूप में समझाना तो और भी कठिन है। इस कठिनाई के प्रत्युत्तरस्वरूप, मराठी भाषा की प्रमुख चिन्तक-साहित्यकार दुर्गा भागवत ने इस पुस्तक में, महाभारत के सत्य को उसके प्रमुख पात्रों के ज़रिये अत्यन्त सहज और लालित्यपूर्ण ढंग से व्याख्यायित किया है। ‘व्यासपर्व’ गहन चिन्तन और ललित अभिव्यक्ति के सहज सामंजस्य से निर्मित कृति है जिसमें विदुषी लेखक ने स्पष्ट किया है कि करुणा जब प्राणों में बस जाती है तभी धर्म का दर्शन होता है। उन्होंने इस जीवन-सत्य की ओर भी संकेत किया है कि मनुष्य मूलतः मनुष्य है; उसका लक्ष्य भी मनुष्य ही है। श्रीकृष्ण, भीष्म, द्रोण, गान्धारी, अश्वत्थामा, अर्जुन, दुर्योधन, कर्ण, विदुर, द्रौपदी, एकलव्य आदि की अद्भुत झाँकी इस पुस्तक में साकार उपस्थित हुई है जिनमें व्यक्तित्व और इतिहास ही नहीं, हमारा समय भी मुखरित होता है। निःसन्देह ‘व्यासपर्व’ भारतीय संस्कृति की एक बहुआयामी व्याख्या है। यह कृति गद्य भी है और काव्य भी, जो ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ के समन्वित स्वरूप को उद्भासित करती है। बार-बार पढ़ने और संग्रह करने योग्य एक अनुपम पुस्तक।
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महाभारत भारतीय मनीषा की ऐसी पूँजीभूत अभिव्यक्ति है कि इसके बारे में यह कथन अतियुक्ति नहीं लगती कि जो कुछ भारत में है वह सब महाभारत में है, और जो इसमें नहीं है वह कहीं नहीं है। आश्चर्य नहीं कि ऐसे महाग्रन्थ का अध्ययन, मनन और उसकी व्याख्या किसी के लिए भी आसान नहीं है। उसके सामाजिक आशय के सम्यक स्वरूप को पहचानना अथवा विशद रूप में समझाना तो और भी कठिन है। इस कठिनाई के प्रत्युत्तरस्वरूप, मराठी भाषा की प्रमुख चिन्तक-साहित्यकार दुर्गा भागवत ने इस पुस्तक में, महाभारत के सत्य को उसके प्रमुख पात्रों के ज़रिये अत्यन्त सहज और लालित्यपूर्ण ढंग से व्याख्यायित किया है।
‘व्यासपर्व’ गहन चिन्तन और ललित अभिव्यक्ति के सहज सामंजस्य से निर्मित कृति है जिसमें विदुषी लेखक ने स्पष्ट किया है कि करुणा जब प्राणों में बस जाती है तभी धर्म का दर्शन होता है। उन्होंने इस जीवन-सत्य की ओर भी संकेत किया है कि मनुष्य मूलतः मनुष्य है; उसका लक्ष्य भी मनुष्य ही है।
श्रीकृष्ण, भीष्म, द्रोण, गान्धारी, अश्वत्थामा, अर्जुन, दुर्योधन, कर्ण, विदुर, द्रौपदी, एकलव्य आदि की अद्भुत झाँकी इस पुस्तक में साकार उपस्थित हुई है जिनमें व्यक्तित्व और इतिहास ही नहीं, हमारा समय भी मुखरित होता है।
निःसन्देह ‘व्यासपर्व’ भारतीय संस्कृति की एक बहुआयामी व्याख्या है। यह कृति गद्य भी है और काव्य भी, जो ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ के समन्वित स्वरूप को उद्भासित करती है।
बार-बार पढ़ने और संग्रह करने योग्य एक अनुपम पुस्तक।
Book Details
-
ISBN9789360862268
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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है।‘विदाउट मर्सी’—‘माफी कभी नहीं’, रेनाट की सर्वाधिक चर्चित रचनाओं में से एक है। एक सम्पूर्ण और ख़ुशहाल परिवार—पति-पत्नी और एक बेटा, फिर एक दुर्घटना—जिसने सम्पूर्णता को तार-तार कर
दिया : स्त्री और पुरुष के बीच का भावनात्मक अन्तर इस उपन्यास में उभारा गया है। बेटे, येम की हत्या के बाद कैसे फीनुस और फ्रांका इस तकलीफ़ को अलग-अलग झेलते हैं, कैसे एक-दूसरे से दूर होते जाते हैं। एक तरफ़ फ्रांका येम को उसकी चीज़ों में जीवित रखना चाहती है, दूसरी तरफ़, फीनुस अलगाव ढूँढ़ता है। घरेलू ख़ुशहाली के नीचे की अनिश्चितता इस बार रेनाट की मनोविश्लेषक निगाह में आई है। उपन्यास में एक कोमल मोड़ भी आता है जब फीनुस और फ्रांका अपने टूटते रिश्ते को बचाने की कोशिश करते हैं।एहतियात से सधी हुई भाषा में उकेरा गया एक उपन्यास, धारदार, स्पष्ट पात्र-चित्रण...कभी न भूले जा सकनेवाली किताबों में से एक। ‘द बॉल्टीमॉर सन’ (प्रसिद्ध समाचार-पत्र)
बेहतरीन ढंग से बुनी हुई...असाधारण...अविस्मरणीय लेखक
—ग्वीन हाइमन रुबीयो (आइसी स्पार्क्स की लेखक)
Ek Naukrani Ki diary
- Author Name:
Krishna Baldev Vaid
- Book Type:

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Description:
प्रख्यात उपन्यासकार कृष्ण बलदेव वैद का यह उपन्यास हमारे नागर-समाज के उस उपेक्षित तबके पर केन्द्रित है जिसकी समस्याओं पर हम संवेदनशील तरीके से कभी बात नहीं करते मगर जिसके बिना हमारा काम भी नहीं चल पाता। शहरों के घरों में चौका-बरतन और सफाई इत्यादि करनेवाली नौकरानियों की रोजमर्रा की जिन्दगी और उनकी मानसिकता इसका केन्द्रीय विषय है। एक युवा होती नौकरानी की मानसिक उथल-पुथल को लेखक ने इस उपन्यास में बड़े ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया है तथा डायरी के माध्यम से बड़ी कुशलता पुर्वक से इस उपेक्षित वर्ग के साथ-साथ हमारे कुलीन समाज की विडम्बना को भी पहचानने-परखने का अवसर दिया है।
प्रवाहपूर्ण भाषा में लिखित यह उपन्यास फ्रायड के उस उपन्यास की याद दिलाता है जो उन्होंने एक युवा होती लड़की की मानसिकता का चित्रण करने के उद्देश्य से डायरी के रूप में लिखा था। यह उपन्यास आरम्भ से ही पाठक की जिज्ञासा को जगाने में सफल है। उपन्यास की नायिका शानो हिन्दी साहित्य का वह चरित्र है जिसे पाठक हमेशा याद रखेंगे।
Adhbuni Rassi : Ek Parikatha
- Author Name:
Sachchidanand Chaturvedi
- Book Type:

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Description:
रस्सी अगर अधबुनी रह जाए तो वह रस्सी नहीं कहलाती। रस्सीपन न हो तो रस्सी कैसी? बुननेवाले ने आख़िर पूरी क्यों नहीं बुनी? बुननेवाला मिले तभी तो पूछें। और वह नहीं मिलता। डमरुआ गाँव और उसमें रहनेवालों की ज़िन्दगी ऐसी ही एक अधबुनी रस्सी है। जीवन्तता में कोई कमी नहीं है। लेकिन यह एक कड़ी सच्चाई है कि जिजीविषा अपने आपमें कोई गारंटी नहीं—न निर्माण की और न नाश के निराकरण की। फिर यह भी कि जहाँ जिजीविषा, वहाँ आस्था। भले ही अधबुनी ज़िन्दगियाँ हों लेकिन ज़िन्दगीपन से भरपूर हैं —उनका यह पूरापन आकर्षित भी करता है और अपने अधबुनेपन पर करुणा भी उपजाता है। और सबसे ख़ास बात यह है कि लेखक ने कथा बड़ी सहजता से कही है। पूरे भरोसे के साथ उसने पात्रों और उनके परिवेश का पाठकों से परिचय करवाया है और सहृदय पाठक पाता है कि परिचय एक अविस्मरणीय आत्मीयता में बदल गया है। कहना होगा कि औपन्यासिकता कोई अधबुनी नहीं रह गई है। लेखक का यह पहला उपन्यास है लेकिन इसे निस्संकोच ‘मैला आँचल’ और ‘अलग अलग वैतरणी’ की परम्परा में रखा जा सकता है और यह कोई कम उपलब्धि की बात नहीं। डमरुआ गाँव और उसमें रहनेवालों को जानना जैसे स्वयं को और अपने परिवेश को नए सिरे से पहचानना है। जिस सहजता के साथ डमरुआ एकाएक बीसवीं शती के उत्तरार्ध का भारत बन जाता है, वह पाठक के लिए एक सुखद विस्मयकारी घटना है। कथा-रस और यथार्थ का ऐसा संयोग बहुत ही कम देखने को मिलता है और ‘अधबुनी रस्सी : एक परिकथा’ उपन्यास इसीलिए पाठक के अनुभव संसार को अतुलनीय समृद्धि देने में सक्षम बन सका है। कथ्य सहज, शिल्प सहज और फिर भी रस्सी के अधबुनी रह जाने की अत्यन्त विशिष्ट कथा उपन्यास को बार-बार पढ़ने को प्रेरित करती है। कोई विस्मय की बात नहीं, अगर यह उपन्यास भविष्य में इने-गिने महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में एक गिना जाए।
—वेणुगोपाल
Anadi Anant
- Author Name:
Madhu Bhaduri
- Book Type:

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Description:
'कालचक्र' और 'ज्वार' के बाद मधु भादुड़ी का यह तीसरा उपन्यास है। भारतीय विदेश सेवा में कार्यरत और प्राय: विदेश में ही रहनेवाला कोई साहित्यकार तेजी से बदल रहे भारतीय यथार्थ पर क्या इतनी पैनी नजर रख सकता है कि एक औपन्यासिक रचना के साथ पूरा न्याय कर सके ? मधु भादुड़ी ने अपने रचना कर्म से साबित किया है कि वे ऐसा कर सकती हैं। बगैर किसी दार्शनिक अतिरेक के, रोजमर्रे की ब्यौरेवार जिंदगी से गुजरते हुए वे मानवीय नियति के प्रश्नों से टकराती हैं और इसी क्रम में नियति निर्धारित करनेवाले कारकों पर रोशनी भी डालती हैं।
'अनादि अनंत' कलेवर की दृष्टि से एक छोटा उपन्यास है लेकिन इसमें एक भारतीय स्त्री के उत्पीड़ित से उत्पीड़क बनने और अपने इस परिवर्तन के जरिए अपनी विडंबना ही उजागर करने की एक बड़ी कथा कही गई है। जो साहित्यिक रूढ़ियाँ भारतीय स्त्री की सामाजिक हैसियत को लेकर सुदूर अतीत से बनी चली आ रही हैं और जो नई रूढ़ियाँ इस विषय में हाल के दौर में बनी हैं, दोनों पर ही यह उपन्यास कड़ा आघात पहुँचानेवाला साबित होगा, ऐसा हमारा विश्वास है ।
साथ की तीनों कहानियाँ, 'मुनिया', 'टेस्टर्ज टी' और 'अस्पताल' मधु भादुड़ी की किस्सागोई की बानगी हैं। वैसी ही सघन घटनात्मकता और क्लाइमेक्स की स्थितियाँ इनमें मौजूद हैं, जैसी आपको शास्त्रीय कहानियों से अपेक्षित होती हैं। एक लेखिका के बतौर मधु भादुड़ी की यह तीसरी प्रस्तुति आपको रोमांचित करेगी और हिंदी लेखक के विश्वव्यापी होते दायरे के प्रति आश्वस्त भी।
Koi Baat Nahin
- Author Name:
Alka Saraogi
- Book Type:

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Description:
“तभी हवा का एक झोंका न जाने क्या सोचकर एक बड़े से काग़ज़ के टुकड़े को शशांक के पास ले आया। उसने घास से उठाकर उसे पढ़ा—‘आदमी का मन एक गाँव है, जिसमें वही एक अकेला नहीं रहता।’ शशांक ने सोचा, आदमी मन में ही तो अपने को और अपनी सारी बातों को छिपाकर रख सकता है...’’
‘कोई बात नहीं’ जैसे एक मंत्र है—हार न मानने की ज़िद और नई शुरुआतों के नाम। समय के एक ऐसे दौर में जब प्रतियोगिता जीवन का परम मूल्य है और सारे निर्णय ताक़तवर और
समर्थ के हाथ में हैं, वेदना, जिजीविषा और सहयोग का यह आख्यान ऐसे तमाम मूल्यों का प्रत्याख्यान है।
मोटे तौर पर इसे शारीरिक रूप से कुछ अक्षम एक बेटे और उसकी माँ के प्रेम और दु:ख की
साझेदारी की कथा के रूप में देखा जा सकता है, पर इसका मर्म एक सुन्दर और सम्मानपूर्ण जीवन की आकांक्षा है, बल्कि इस हक़ की माँग है। शशांक सत्रह साल का एक लड़का है जो दूसरों से अलग है क्योंकि वह दूसरों की तरह चल और बोल नहीं सकता। कलकत्ता के एक नामी मिशनरी स्कूल में पढ़ते वक़्त अपनी ग़ैरबराबरी को जीते हुए, उसका साबिका उन तरह-
तरह की दूसरी ग़ैरबराबरियों से भी होता रहता है, जो हमारे समाज में आसपास कुलबुलाती रहती है। स्कूल में शशांक का एकमात्र दोस्त है—एक एंग्लो-इंडियन लड़का आर्थर सरकार जो उसी की तरह एक क़िस्म का जाति-बाहर या आउटकास्ट है—अलबत्ता बिलकुल अलग कारणों से।
शशांक का जीवन चारों तरफ़ से तरह-तरह के कथा-क़िस्सों से घिरा है। एक तरफ़ उसकी आरती मौसी है, जिसकी प्रायः खेदपूर्वक वापस लौट आनेवाली कहानियों का अन्त और आरम्भ शशांक को कभी समझ में नहीं आता। दूसरी तरफ़ उसकी दादी की कहानियाँ हैं—दादी के अपने घुटन-भरे बीते जीवन की, बार-बार उन्हीं शब्दों और मुहावरों में दोहराई जाती कहानियाँ, जिनका कोई शब्द कभी अपनी जगह नहीं बदलता। लेकिन सबसे विचित्र कहानियाँ उस तक पहुँचती हैं जतीन दा के मार्फ़त, जिनसे वह बिना किसी और के जाने, हर शनिवार विक्टोरिया मेमोरियल के मैदान में मिलता है। ये सभी कहानियाँ आतंक और हिंसा के जीवन से जुड़ी कहानियाँ हैं जिनके बारे में हर बार शशांक को सन्देह होता है कि वे आत्मकथात्मक हैं, पर इस सन्देह के निराकरण का उसके पास कोई रास्ता नहीं है।
तभी शशांक के जीवन में वह भयानक घटना घटती है जिससे उसके जीवन के परखच्चे उड़ जाते हैं। ऐसे समय में यह कथा-अमृत ही है जो उसे इस आघात से उतारता है; साथ ही उसे संजीवन मिलता है उस सरल, निश्छल, अद् भुत प्रेम और सहयोग से जो सब कुछ के बावजूद दुनिया को बचाए रखता आ रहा है। और तब उसकी अपनी यह कथा, जो आरती मौसी द्वारा लिखी जा रही थी, पुनः जीवित हो उठती है—कथामृत के आस्वादन से जागी कथा।
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