Ummid Hai, Aayega Vah Din
Author:
Emile ZolaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 360
₹
450
Available
यह उपन्यास मज़दूर आन्दोलन में स्वतःस्फूर्तता की महत्ता स्पष्ट करते हुए संघर्ष में सचेतनता के आविर्भाव और क्रमिक विकास की जटिल और मन्थर प्रक्रिया को तथा संघर्ष की विभिन्न मंज़िलों को इतने प्रभावी ढंग से दर्शाता है कि मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए आज भी यह एक ज़रूरी अध्ययन-सामग्री लगने लगता है। ज़ोला ने इस प्रक्रिया का प्रभावशाली चित्रण किया है कि किस प्रकार अल्पविकसित चेतना वाले मज़दूर नए विचारों के क़ायल होते हैं, किस प्रकार अपनी जीवन-स्थिति को नियति मानकर जीनेवाले मज़दूरों के सोचने-समझने का ढंग हड़ताल के प्रभाव में बदलने लगता है और किस प्रकार वे आन्दोलन द्वारा उठाए गए सवालों को समझने और उनके हल के बारे में सोचने की कोशिश करने लगते हैं।</p>
<p>उपन्यास मज़दूरों की हड़ताल के दौरान कार्यनीति या रणकौशल (टैक्टिक्स) से जुड़े प्रश्नों पर भी विस्तार में जाता है। मिसाल के तौर पर इसमें हड़ताल के दौरान तोड़-फोड़ की कार्रवाई और ‘फ्लाइंग पिकेट्स’ की सम्भावित भूमिकाओं पर भी विचार किया गया है। ‘फ्लाइंग पिकेट्स’ की हड़ताल के दौरान एक विशेष भूमिका दर्शाई गई है। यह इतिहास का तथ्य है कि फ़्रांसीसी कोयला खदानों में इनकी स्थापित परम्परा रही थी और 1869 की ल्वार हड़ताल के दौरान इनका विशेष रूप से इस्तेमाल किया गया था।</p>
<p>उपन्यास एक तरह से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के यूरोपीय मज़दूर आन्दोलन का एक लघु प्रतिरूप प्रस्तुत करता है। खदान मज़दूरों के एक छोटे से गाँव में तीन राजनीतिक धाराओं के सुस्पष्ट-सटीक प्रतिनिधियों की उपस्थिति हमें देखने को मिलती है। रासेनोर एक सुधारवादी है जो टकराव के बजाय वार्ताओं की राजनीति में विश्वास रखता है। सूवारीन अराजकतावादी है। एतिएन की अवस्थिति इन दोनों के बीच की बनती है। अनुभववादी ढंग से वह जुझारू वर्ग संघर्ष की सोच और क्रान्तिकारी जनदिशा की सोच की ओर आगे बढ़ता हुआ चरित्र है। पेरिस कम्यून के पूर्व, पहले इंटरनेशनल में भी यही तीन राजनीतिक धाराएँ कमोबेश प्रभावी रूप में मौजूद थीं।
ISBN: 9788126713851
Pages: 494
Avg Reading Time: 16 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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उपन्यास इस परिवर्तन के संक्रमणकाल पर भी दृष्टिपात करता है और यह प्रश्न भी छोड़ता है कि आज जब स्कूल, कॉलेज और तकनीकी संस्थाओं तक में ‘को-एड’ है तब यह कैसे सम्भव है कि लड़के-लड़की के बीच स्वाभाविक और प्राकृतिक आकर्षण न हो?
लेखक ने वर्जनाओं से रहित जीवन जीनेवाली युवा पीढ़ी के प्रति एक सार्थक समझ को जाग्रत् करने के साथ-साथ परम्परावादी सोच की कठोर नियमावली के बीच जीनेवाले रूढ़िवादी समाज के प्रति एक समन्वयवादी सोच को बनाने का प्रयास भी किया है।
आधुनिक युवाओं की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्याओं पर एक रोचक उपन्यास जो अपनी सहज भाषा-शैली से पाठक के अन्तर्मन को स्पर्श करता है।
Gokul Mathura Dwarka
- Author Name:
Raghuveer Chaudhary
- Book Type:

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Description:
मूल गुजराती में समादृत इस कथात्रयी ‘गोकुल मथुरा द्वारिका’ के नायक हैं श्रीकृष्ण, जो कथा में आद्योपान्त यवनिका के पीछे तिरोहित रहते हैं, किन्तु पाठक पग-पग पर उनका सान्निध्य पाता चलता है—अदृश्य, अगोचर किन्तु अनुभूति में व्याप्त। फिर ऐसे श्रीकृष्ण का जीवन-चरित लिखते हुए लेखक ने गोकुल मथुरा द्वारिका जैसे स्थलवाचक नाम क्यों दिए? श्रीकृष्ण का जीवन तो समग्र भारतवर्ष के साथ सम्बद्ध है?
गोकुल मथुरा द्वारिका कहते ही क्या सम्पूर्ण कृष्ण हमारे मानसपटल पर नहीं आ उपस्थित होते?
गोकुल के लोकनायक कृष्ण!
मथुरा के युगपुरुष कृष्ण!
द्वारिका के योगेश्वर कृष्ण!
अपने-अपने में परिपूर्ण मगर एक दूसरे की सर्वथापूरक यह उपन्यास-त्रयी हिन्दी पाठकों को उस श्रीकृष्ण से परिचित करवाने का प्रयास है जो रसेश्वर से योगेश्वर बने हैं।
एक से बढ़कर एक चुनौतियों का सामना करनेवाला यह चरित्र प्रत्येक युग के लिए प्रेरणादायक है। वे समग्र रूप में पुरुषोत्तम हैं। आनन्द रूप में अनुभव-गम्य हैं।
‘अमृता’ उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठक जगत के बीच सुख्यात और ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ विजेता रघुवीर चौधरी की यह उपन्यास-त्रयी इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इसमें मिथक की गरिमा और कथात्मकता की रक्षा करते हुए आधुनिक जीवन और परिवेश की झलक भी पाठकों को स्पष्ट रूप में मिल जाती है।
Khuda Sahi Salamat Hai
- Author Name:
Ravindra Kaliya
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Description:
अगर ‘झूठा सच’ बँटवारे का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है, तो बँटवारे के बावजूद भारत में हिन्दू-मुस्लिम जनता के सहजीवन का मार्मिक उद्घाटन ‘ख़ुदा सही सलामत है’ में सम्भव हुआ है। हजरी, अज़ीज़न, गुलबदन, शर्मा, सिद्दीकी, पंडित, पंडिताइन, गुलाबदेई, लतीफ़, हसीना, उमा, लक्ष्मीधर, ख़्वाजा और प्रेम जौनपुरी जैसे जीवन्त और गतिशील पात्र अपनी तमाम इनसानी ताक़त और कमज़ोरियों के साथ हमें अपने परिवेश का हिस्सा बना लेते हैं। शर्मा और गुल का प्रेम इन दो धाराओं के मिश्रण को पूर्णता तक पहुँचाने को है कि साम्प्रदायिकता की आड़ लेकर रंग-बिरंगे निहित स्वार्थ उनके आड़े आ जाते हैं। जैसे प्रेम क़ुर्बानी माँगता है, वैसे ही महान सामाजिक उद्देश्य भी। यह उपन्यास अन्तत: इसी सत्य को रेखांकित करता है।
साम्प्रदायिकता के अलावा यह उपन्यास नारी-प्रश्न पर भी गहराई से विचार करता है। इसके महिला पात्र भेदभाव करनेवाली पुरुष मानसिकता की सारी गन्दगी का सामना करने के बावजूद अन्त तक अविचलित रहते हैं। अपनी समस्त मानवीय दुर्बलताओं के साथ चित्रित होने के बावजूद एक क्षण को भी ऐसा नहीं लगता कि उन्हें उनके न्यायोचित मार्ग से हटाया जा सकता है। उत्तर मध्यकालीन भारतीय संस्कृति की वारिस, तवायफ़ों के माध्यम से आनेवाली यह व्यक्तित्व सम्पन्नता काफ़ी मानीखेज़ है। यह हमें याद दिलाती है कि औपनिवेशिक आधुनिकता की आत्महीन राह पर चलते हुए हम अपना क्या कुछ गँवा चुके हैं।
1980 के दशक में हमारे शासकवर्ग ने साम्प्रदायिक मसलों को हवा देने का जो रवैया अपनाया था, वह ज़मीनी स्तर पर कैसे दोनों सम्प्रदायों के निहित स्वार्थों को खुलकर खेलने के नए-नए मौक़े मुहैया करा रहा था, और भारत की संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता इस घिनौने खेल को बन्द करनेवाला नहीं, इसे ढकने-तोपने वाला परदा बनी हुई थी, इसकी पड़ताल भी इस उपन्यास में आद्यन्त निहित है। आज़ाद भारत में ग़ैरमुस्लिम कथाकारों के यहाँ मुस्लिम समाज की बहुश्रुत अनुपस्थिति के बीच यह उपन्यास एक सुखद और आशाजनक अपवाद की तरह हमारे सामने है। अपनी इन्हीं ख़ूबियों के कारण यह उपन्यास ‘आग का दरिया’, ‘उदास नस्लें’, ‘झूठा सच’ और ‘आधा गाँव’ की परम्परा की अगली कड़ी साबित होता है।
—कृष्णमोहन
Rang Raachi
- Author Name:
Sudhakar Adeeb
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Description:
मीराँ अपना एकतारा और खड़ताल हाथों में लेकर बिना किसी भूमिका के गा उठीं— “सिसोदिया वंश के राणा यदि मुझसे रूठ गए हैं तो मेरा क्या कर लेंगे?... मुझे तो गोविन्द का गुण गाना है।... राणा जी रूठकर अपना देश बाख लेंगे।” दूसरे शब्दों में, देश में व्याप्त कुप्रथाओं एवं रूढ़ियों की रक्षा कर लेंगे।...किन्तु “यदि हरि रूठ जाएँगे तो मैं कुम्हला जाऊँगी। अर्थात् मेरी भक्ति व्यर्थ चली जाएगी।”
“मैं लोक-लज्जा की मर्यादा को नहीं मानती।... मैं निर्भय होकर अपनी समझ का नगाड़ा बजाऊँगी!... श्याम नाम रूपी जहाज़ चलाऊँगी... इस तरह मैं इस भवसागर को पार कर जाऊँगी!... मीराँ अपने साँवले गिरधर जी की शरण में हैं तथा उनके चरणकमलों से लिपटी हुई हैं!...”
इस प्रकार मीराँ का यह सात्त्विक विद्रोह ही तो था। अपनी मान्यताओं के प्रति उनकी दृढ़ता का प्रतीक। तत्कालीन झूठी लोक-मर्यादाओं की बेड़ियाँ जो शताब्दियों से स्त्री के पैरों में स्वार्थी पुरुष ने विभिन्न नियम संहिताएँ रचकर अपने हितलाभ के लिए पहना रखी थीं। मीराँ चुनौती दे रही थीं, उस सामन्ती युग में स्त्रियों के सम्मुख कड़ी कुप्रथाओं, कुपरम्पराओं का। वह अपूर्व धैर्य के साथ सामना कर रही थीं लौह कपाटों के पीछे स्त्री को धकेलने और उसे पत्थर की दीवारों की बन्दिनी बनाकर रखने, पति के अवसान के बाद जीते जी जलाकर सती कर देने, न मानने पर स्त्री का मानसिक और दैहिक शोषण करने की पाशविक प्रवृत्तियों का। मीराँ का सत्याग्रह अपने युग का अनूठा एकाकी आन्दोलन था जिसकी वही अवधारक थीं, वही जनक थीं और वही संचालक। मीराँ ने स्त्रियों के संघर्ष के लिए जो सिद्धान्त निर्मित किए उन पर सबसे पहले वे ही चलीं।
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