Punarnava
Author:
Hazariprasad DwivediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 319.2
₹
399
Available
जिसे प्रायः सत्य कहा जाता है, वह वस्तुस्थिति का प्रत्यक्षीकरण मात्र है। लोग सत्य को जानते हैं, समझते नहीं। और इसीलिए सत्य कई बार बहुत कड़ुवा तो लगता ही है, वह भ्रामक भी होता है। फलतः जनसाधारण ही नहीं, समाज के शीर्ष व्यक्ति भी कई बार लोकापवाद और लोकस्तुति के झूठे प्रपंचों में फँसकर पथभ्रष्ट हो जाते हैं।</p>
<p>‘पुनर्नवा’ ऐसे ही लोकापवादों से दिग्भ्रान्त चरित्रों की कहानी है। वस्तुस्थिति की कारण-परम्परा को न समझकर वे समाज से ही नहीं, अपने-आपसे भी पलायन करते हैं और कर्तव्याकर्तव्य का बोध उन्हें नहीं रहता। सत्य की तह में जाकर जब वे उन अपवादों और स्तुतियों के भ्रमजाल से मुक्त होते हैं, तभी अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय उन्हें मिलता है और नवीन शक्ति प्राप्त कर वे नए सिरे से जीवन-संग्राम में प्रवृत्त होते हैं।</p>
<p>‘पुनर्नवा’ ऐसे हीन चरित्र व्यक्तियों की कहानी भी है जो युग-युग से समाज की लांछना सहते आए हैं, किन्तु शोभा और शालीनता की कोई किरण जिनके अन्तर में छिपी रहती है और एक दिन यही किरण ज्योतिपुंज बनकर न केवल उनके अपने, बल्कि दूसरों के जीवन को भी आलोकित कर देती है।</p>
<p>‘पुनर्नवा’ चौथी शताब्दी की घटनाओं पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास है, लेकिन जिन प्रश्नों को यहाँ उठाया गया है, वे चिरन्तन हैं और उनके प्रस्तुतीकरण तथा निर्वाह में आचार्य द्विवेदी ने अत्यन्त वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है।
ISBN: 9788126718788
Pages: 310
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Qayas
- Author Name:
Zilani Bano
- Book Type:

- Description: ास’ एक असाधारण उपन्यास है जहाँ रोज़मर्रा की साधारण सामग्री से गम्भीर और कलात्मक परिष्कृत कृति ने आकार लिया है। इस सामग्री से कोई भी और लेखक अतिनाटकीय बम्बइया कृति बना डालता है। ‘क़यास’ में अतिनाटकीयता है ज़रूर लेकिन उसे उपन्यासकार ने सहलाने की जगह, उसका मज़ाक बनाया है। इस उपन्यास की भाषा उचित ही ऊँचे स्तर की है, इसमें प्रयुक्त उपमाएँ और रूपक ज़रा भी कृत्रिम हुए बिना काव्यात्मक और नैसर्गिक हैं। पूरे उपन्यास में एक भी शब्द फ़िज़ूल नहीं है। मुझे यह पढ़कर सन्तोष से बहुत अधिक हासिल हुआ। लखना उर्फ़ लखन लाल का चरित्र ठीक ही अविस्मरणीय है, उपन्यास में उसे गौरवमय स्थान दिया गया है। यह उसी के एकालाप से ख़त्म होता है। Quote - हिन्दी उपन्यास मध्यवर्गीय जीवन और उसके रिश्तों के उत्सव में अपना गौरव मानता रहा है। उदयन वाजपेयी का ‘क़यास’ उन थोड़े-से उपन्यासों में है जो बिना किसी यथार्थवादी फर्नीचर के कोलाहल को मुमकिन कर देता है। इस उपन्यास में काव्यात्मक छरहरापन है। —कृष्ण बलदेव व
Sensation of A Soul
- Author Name:
Jyoti Patel
- Book Type:

- Description: Despite their contrasting personas, two people get conjoined and manifest that true love stories never have final; a woman’s fingers fling away from the keypad at the very instant of reading startling news. A man founds himself standing in silence amidst talks, unable to react to the love of his life. A couple never praises each other until someday; a guy always prefers to look up at the sky and think enormously about his precious life and death. There are some sorrowful and amicable poetries and thought-provoking stories. The affecting poems and captivating stories in this book share the Theme of relationship, adoration, passion, love, hope, faith, desire, dreams and life. The inner meanings are even more profound than the words used in this splendid and awe-inspiring book. The sensation of a soul is sure to touch the hearts of many readers, brings out the best moments of one’s life and encourages people to evaluate their inner selves and the world around them with advanced eyes.
Vakratund
- Author Name:
Mahendra Madhukar
- Book Type:

-
Description:
वक्रतुण्ड अर्थात गणपति श्री गणेश के अनेक रूप हैं—विघ्नहर्ता से लेकर विघ्नकर्ता तक। सत्व के प्रति सरस-सदय और तमस के प्रति कठिन-कठोर। उनके इस स्वभाव ने मनुष्यों के हृदय में श्री गणेश के लिए विशेष भक्ति उत्पन्न की है क्योंकि वे उन्हें एकदम अपने लगते हैं—करुणामय, उदार, सहज, समस्त आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति करने वाले। ऐसा नहीं कि उन्हें क्रोध नहीं आता किन्तु उनका कोप भक्तों के लिए नहीं होता। उनके लिए तो वे अभय देने वाले हैं। मनुष्य तो मनुष्य, तमाम इतर जीवों के भी वे शरणदाता-त्राता हैं।
विघ्नों से भरे संसार में ऐसे कृपालु श्री गणेश की अगणित लीलाएँ हैं। इन्हीं लीलाओं से ‘वक्रतुण्ड’ में उनका आख्यान रचा गया है जो पाठकों को एक अलग ही आश्वस्ति और त्राण देता है कि यदि आप दूसरों के प्रति सात्विकता से भरे रहेंगे तो वक्रतुण्ड आपकी राह में आने वाली हरेक वक्रता को अनुकूलता में बदल देंगे।
एक अत्यन्त पठनीय पौराणिक उपन्यास।
Anandmath
- Author Name:
Bankim Chandra Chatterjee
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक ‘आनन्दमठ’ में 1770 ई. से 1774 ई. तक के बंगाल का चित्र खींचा गया है। यह उपन्यास या ऐतिहासिक उपन्यास से बढ़कर है। ऋषि बंकिम ने इसमें उस युग का सिर्फ़ फ़ोटो नहीं खींचा, बल्कि राष्ट्र-विप्लब के भँवर में फँसे कुछ ऐसे जीवन्त मनुष्यों के चित्र दिए हैं, जो आज भी हमें बड़े अपने लगते हैं। इनमें सामान्य स्त्री-पुरुष भी हैं और महापुरुष भी। वे आज भी हमें राष्ट्रोत्थान का मार्ग दिखाते हैं। यह मार्ग है संघर्ष का, अन्याय से लोहा लेने का। गीता की जो टेक है—युध्यस्व-युद्ध करो, वही टेक है ‘आनन्दमठ’ की। ‘भगवतगीता’ और ‘आनन्दमठ’, इन दोनों में पलायनवाद नहीं है। इसलिए हमारे स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान ‘गीता’ को जो महत्त्व मिला, उससे कम महत्त्व ‘आनन्दमठ’ को नहीं दिया गया। इसीलिए ‘आनन्दमठ’ के सन्तान-व्रतधारियों का गीत ‘वन्दे मातरम’ हमारा राष्ट्रगीत है।
Kunwari Dharati
- Author Name:
Ivan Sergeyevich Turgenev
- Book Type:

- Description: ‘कुँआरी धरती’ तुर्गेनेव का छठा और अन्तिम उपन्यास है। इसकी पृष्ठभूमि में ज़ारकालीन रूस का क्रान्तिकारी आन्दोलन और उसमें शामिल युवा हैं। देश के अशान्त सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य से असन्तुष्ट ये युवा उसकी कुँआरी धरती में क्रान्ति के बीज बोना चाहते हैं। वे आत्मकेन्द्रित अभिजातों के विरोधी हैं और कष्ट में पड़े जन-सामान्य के हमदर्द। ऐसे ही एक युवा के ज़रिये तुर्गेनेव इस उपन्यास में तत्कालीन रूस की सामाजिक जड़ता के बीच परिवर्तनकामी आदर्शवाद की जटिलताओं की पड़ताल करते हैं। इस उपन्यास में पुराने और उभरते नए रूस के मध्य वैचारिक संघर्ष का बारीक चित्रण किया गया है, जिसके निहितार्थों का सार्वकालिक महत्त्व है।
Samar Gatha
- Author Name:
Howard Fast
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Facts Fictions Imaginations
- Author Name:
Bhupen N Sarma
- Book Type:

- Description: Truth is that few questions accelerated My beeps of heart are still unanswered. Were those evictions prudent? Why distress come always for most of the innocent commoners after every changing of game?? Are there any remedies??? Who has to take care???? I am still in pursuit and shall remain.
Tedhi Lakeer
- Author Name:
Ismat Chugtai
- Book Type:

-
Description:
इस्मत चुग़ताई का यह उपन्यास कई अर्थों में बहुत महत्त्व रखता है। पहला तो ये कि यह उपन्यास इस्मत के और सभी उपन्यासों में सबसे सशक्त है। दूसरे, इस्मत को क़रीब से जाननेवाले, इसे उनकी आपबीती भी मानते हैं। स्वयं इस्मत चुग़ताई ने भी इस बात को माना है। वह स्वयं लिखती हैं, ‘‘कुछ लोगों ने ये भी कहा कि ‘टेढ़ी लकीर’ मेरी आपबीती है—मुझे ख़ुद आपबीती लगती है। मैंने इस नाविल को लिखते वक़्त बहुत कुछ महसूस किया है। मैंने शम्मन के दिल में उतरने की कोशिश की है, इसके साथ आँसू बहाए हैं और क़हक़हे लगाए हैं। इसकी कमज़ोरियों से जल भी उठी हूँ। इसकी हिम्मत की दाद भी दी है। इसकी नादानियों पर रहम भी आया है, और शरारतों पर प्यार भी आया है। इसके इश्क़–मुहब्बत के कारनामों पर चटखारे भी लिए हैं, और हसरतों पर दु:ख भी हुआ है। ऐसी हालत में अगर मैं कहूँ कि मेरी आपबीती है तो कुछ ज़्यादा मुबालग़ा तो नहीं...’’
‘टेढ़ी लकीर’ एक किरदारी उपन्यास है जैसे ‘उमरावजान अदा’। ‘टेढ़ी लकीर’ की कहानी शम्मन के इर्द–गिर्द घूमती नज़र आती है। शम्मन को चूँकि अच्छा माहौल और अच्छी तरबीयत नहीं मिली, इसी वजह से उसके अन्दर इतना टेढ़ापन पैदा हो गया जहाँ उसकी नज़र में मुहब्बत मुहब्बत नहीं रही, रिश्ते रिश्ते नहीं रहे, जीवन जीवन नहीं रहा। सब कुछ मज़ाक़ बनकर रह गया। शम्मन के किरदार का विश्लेषण किया जाए तो वह मनोविकारों का गुलदस्ता नज़र आएगी। इस किरदार के बारे में इस्मत ने एक इंटरव्यू में कहा था ‘‘...ये नाविल जब मैंने लिखा तो बहुत बीमार थी, घर में पड़ी रहा करती थी। इस नाविल की हीरोइन ‘शम्मन’ क़रीब–क़रीब मैं ही हूँ। बहुत–सी बातें इसमें मेरी हैं। वैसे आठ–दस लड़कियों को मैंने इस किरदार में जमा किया है, और एक लड़की को ऊपर से डाल दिया है। जो मैं हूँ। इस नाविल के हिस्सों के बारे में मैं सिर्फ़ इतना बता सकती हूँ कि कौन–से हिस्से मेरे हैं और कौन–से दूसरों के !...’’
इस उपन्यास को इस्मत चुग़ताई ने उन यतीम बच्चों के नाम समर्पित किया है जिनके अभिभावक जीवित हैं। दरअसल यह व्यंग्य है उन माता–पिताओं पर जो बच्चे तो पैदा कर लेते हैं पर पालन–पोषण ठीक से नहीं करते। इन्हीं कारणों से यह उपन्यास उर्दू भाषा में जितना लोकप्रिय हुआ, उम्मीद है हिन्दी के पाठकों में भी लोकप्रिय होगा।
Ve Din
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
निर्मल वर्मा के कथा-शिल्प में उसी तरह मौजूद रहता है, जैसे हमारे जीवन में—लगातार मौजूद लेकिन अदृश्य। उससे हमारे दुःख और सुख तय होते हैं, वैसे ही जैसे उनके कथा-पात्रों के होते हैं। कहानी का विस्तार उसमें बस यह करता है कि इतिहास के उन मूक और भीड़ में अनचीन्हे ‘विषयों’ को एक आलोक-वृत्त से घेरकर नुमायाँ कर देता है, ताकि वे दिखने लगें, ताकि उनकी पीड़ा की सूचना एक जवाबी सन्देश की तरह इतिहास और उसकी नियन्ता शक्तियों तक पहुँच सके। इस प्रक्रिया में अगर उनकी कथा कुछ ऐसे व्यक्तियों को रच देती है जिनकी वैयक्तिकता की आभा हमारे लिए ईर्ष्या का कारण हो उठे, तो यह उनका व्यक्तिवाद नहीं है, व्यक्ति के स्तर पर एक वैकल्पिक मनुष्य का ख़ाक़ा तैयार करने की कोशिश है।
इस उपन्यास के चरित्रों की पीड़ा और उस पीड़ा को पहचानने, अंगीकार करने की उनकी इच्छा और क्षमता उन्हें हमारे मौजूदा असहिष्णु समाज के लिए मूल्यवान बनाती है। वह चाहे रायन हो, इंदी हो, फ्रांज हो या मारिया, उनमें से कोई भी अपने दुख का हिसाब हर किसी से नहीं माँगता फिरता। चेकोस्लोवाकिया की बर्फ़-भरी सड़कों पर अपने लगभग अपरिभाषित-से प्रेम के साथ घूमते हुए ये पात्र जब पन्नों पर उद्घाटित होते हैं, तो हमें एक टीसती हुई-सी सान्त्वना प्राप्त होती है, कि मनुष्य होने का जोखिम लेने के दिन अभी लद नहीं गए।
‘वे दिन’ निर्मल वर्मा का प्रथम उपन्यास है। यह क्रिसमस के चन्द शान्तिपूर्ण दिनों की गाथा है, एक अवसादपूर्ण प्रेमकथा जो बर्फ़ और धूप, छुट्टियों के ख़ालीपन, पुराने शहर के पुलों और टावरों के बीच चुपचाप चलती है। हर पात्र का अपना अतीत है, जो यूरोप की युद्धोत्तर पीढ़ी की अभिशप्त छाया से जुड़ा है, और उपन्यास के विभिन्न पात्रों को जोड़नेवाली एक ‘रहस्यमय’ नियति भी है, जो छोटी-से-छोटी घटना को अर्थवत्ता प्रदान करती है।
Lal Teen Ki Chhat
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
निर्मल वर्मा हिन्दी के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से हैं जिन्हें अपने जीवनकाल में ही अपनी कृतियों को क्लासिक बनते देखने का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ है। प्रायः सभी आलोचक इस बात पर सहमत हैं कि हिन्दी में कहानी कहने की कला को एक निर्णायक मोड़ देने का श्रेय उन्हें है। उन्होंने भाषा को भी बदला और उसके प्रयोग की विधि को भी। उनके गद्य को पढ़ते हुए अपनी ही भाषा की सम्प्रेषणीयता हमें चकित कर देती है।
‘लाल टीन की छत’ उनका बेहद चर्चित उपन्यास है। यह उपन्यास उन्होंने 1970 में लिखना आरम्भ किया और अप्रैल 1974 में पूर्ण किया। दिल्ली, लन्दन और शिमला में लिखे गये इस उपन्यास में निर्मल वर्मा की रचनात्मकता अपने पूर्ण उत्कर्ष पर दिखाई देती है।
‘लाल टीन की छत’ एक ऐसी अकेली लड़की की गाथा है जो अपने छोटे भाई के साथ एक पहाड़ी शहर में रहती है। सर्दी की लम्बी, सूनी छुट्टियों में वह इधर-उधर भटकती रहती है। उसने अपने इर्द-गिर्द एक मायावी जाल-सा बुन लिया है जिसमें वह अधिकांश समय खुद अपनी सच्ची-झूठी स्मृतियों से खेलती रहती है। वह एक ऐसी सीमा पर खड़ी है, जिसके पीछे बचपन छूट चुका है और आनेवाला समय अनेक संकेतों और सन्देशों से भरा है। एक छोर पर अजीब-सा आतंक है, दूसरे छोर पर एक असहनीय सम्मोहन, और इन दोनों के बीच जो अँधेरी भूलभुलैया फैली है, यह उपन्यास उसके कोनों को छूता, पकड़ता, छोड़ता हुआ चलता है।
Chakke Tale
- Author Name:
Hermann Hesse
- Book Type:

-
Description:
यह ज़रूरी नहीं कि विधिवत् स्कूली शिक्षा प्राप्त करनेवाले छात्र ही महान बनते हैं। सच तो यह है कि जिनसे स्कूली अध्यापक घृणा करते हैं, सज़ा देते हैं, जो झगड़ालू कहे जाते हैं, भगाए जाते हैं, अक्सर वही लोग बाद में अपने सुकृत्यों से महान बन जाते हैं। और फिर अगली पीढ़ी के स्कूली अध्यापक छात्रों के सामने इन्हीं लोगों को अनुकरणीय उदाहरण के रूप में पेश करते हैं।
प्रस्तुत उपन्यास में जहाँ वर्तमान शिक्षा-पद्धति और उसके चलते विद्यार्थियों में व्याप्त तनाव को रेखांकित किया गया है, वही एक युवक की ऐसी मार्मिक कथा है जो परिवार, समाज और व्यवस्था की अपेक्षाओं के चक्के तले दबकर दम तोड़ देता है। सुविख्यात जर्मन लेखक हेरमन हेस्से का बहुचर्चित मार्मिक उपन्यास है ‘चक्के तले’।
Vakeel Paradhi
- Author Name:
Laxman Gaiakwad
- Book Type:

- Description: ब्रिटिश शासनकाल में जिन समुदायों को अपराधी के श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया था, उनमें एक पारधी समाज भी है। कभी जंगलों में रहकर अपना जीवनयापन करने वाले इस समाज ने स्वतंत्रता संग्राम में भी खासी भूमिका निभाई थी। आजादी मिलने के बाद देश की सरकार ने उन्हें अपराधी के कलंक से तो मुक्त कर दिया लेकिन पुलिस, प्रशासन और पुलिस की दृष्टि में उन्हें सम्मान आज तक नहीं मिला। यह उपन्यास इसी पारधी समाज की यंत्रणा, पुलिस द्वारा उसके उत्पीड़न और प्रशासनिक उपेक्षा की मार्मिक कहानी बयान करता है। दलित-दमित समाज के हित में लगातार कलम चलाते आ रहे मराठी लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ ने इस उपन्यास में बताया है कि रोजी-रोटी की तलाश में खानाबदोश जीवन जीने वाले इस समाज के लोगों को पुलिस किस तरह झूठे मामलों में फँसाकर कैद कर लेती है, फिर अपने अनसुलझे मामलों में उनसे झूठी गवाही दिलवाती है, और उनकी औरतों के साथ बदसलूकी करती है। अपने इस यातनाग्रस्त समाज के लिए लड़ने को हौसले के साथ वकील बनने का सपना सँजोने वाले एक बालक के रास्ते में ताकतवर समाज द्वारा पैदा की जाने वाली अड़चनों के माध्यम से इसमें पारधी समाज के प्रति शेष समाज के रवैये को भी बखूबी स्पष्ट किया गया है। उपन्यास से हमें पारधी समाज के सांस्कृतिक और परिवेशगत जीवन-मूल्यों, उनके दैनिक जीवन की अन्य समस्याओं और सामाजिक संरचना का भी प्रामाणिक परिचय मिलता है।
Qabze Zaman
- Author Name:
Shamsurrahman Farooqui
- Book Type:

- Description: यह छोटा-सा उपन्यास उर्दू की क़िस्सागोई की बेहतरीन मिसाल है। इक्कीसवीं, सोलहवीं और अठारहवीं सदियों के अलग-अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मिज़ाज तथा उनके अपने वक़्तों की बोली-बानी में रचा गया है। जो फ़ारूक़ी साहब इस फ़न के उस्ताद लेखकों में एक हैं। कहानी बयान करने पर उन्हें कमाल हासिल है। इस उपन्यास की मुख्य विषय-वस्तु यह क़िस्सा है कि दिल्ली का एक सिपाही जिसका घर जयपुर के किसी गाँव में था, अपनी लड़की की शादी के लिए रुपए-पैसे का बन्दोबस्त करके अपने घर को चला लेकिन रास्ते में उसे डाकुओं ने लूट लिया। ख़ाली हाथ जयपुर पहुँच उसने लोगों से सुना कि वहाँ एक दानी तवायफ़ रहती है जो मदद कर सकती है। सिपाही ने उससे तीन सौ रुपए का क़र्ज़ लिया और जाकर अपनी बेटी की शादी की। वापसी में वह क़र्ज़ लौटाने जब उसके पास गया तो पता चला कि तवायफ़ गुज़र चुकी है और पैसे वापस लेने को कोई वारिस भी नहीं है। यह सोचकर कि मृत आत्मा की क़ब्र पर फ़ातिहा पढ़ता चलूँ, जब पहुँचा तो देखा कि क़ब्र फटी हुई है और उसमें एक दरवाज़ा-सा कहीं जाता दिखाई दे रहा है। वह उसमें अन्दर गया तो वहाँ एक महल में उस तवायफ़ से मिला। उसने पैसे वापस करना चाहा तो यह कहकर कि यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है, तवायफ़ ने उसे महल से निकलवा दिया। महल के बाहर एक मैदान था, बाग़ थे। वह वहाँ पर कोई तीन घंटे घूमा और जब बाहर निकला तो देखा कि दुनिया में तीन सौ साल का अरसा बीत चुका है। यह उपन्यास उसके इन दोनों वक्तों की दुनियाओं की उनके अपने मिज़ाज में दिलचस्प अक्काशी करता है और क्योंकि यह सारा क़िस्सा बयान किया है इक्कीसवीं सदी के एक शख़्स ने तो हमारा यह वक़्त भी इसमें आ गया है। इस तरह इस छोटे से उपन्यास की काया में तीन बड़े ज़मानों को समेट दिया गया है... “मालूम होता है कि अल्लाह ताला अपने किसी शख़्स के लिए लम्बे ज़माने को भी मुख़्तसर कर देता है जबकि वह दूसरों के लिए तवील ही रहता है।’’
Murdon Ka Tila
- Author Name:
Rangeya Raghav
- Book Type:

-
Description:
भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का इतिहास मुअनजोदड़ो के उत्खनन में मिली सिन्धु घाटी की सभ्यता से शुरू होता है। इस सभ्यता का विकसित स्वरूप उस समय की ज्ञात किसी सभ्यता की तुलना में अधिक उन्नत है। प्रसिद्ध उपन्यासकार रांगेय राघव ने अपने इस उपन्यास ‘मुर्दों का टीला’ में उस आदि सभ्यता के संसार का सूक्ष्म चित्रण किया है। मोअन-जो-दड़ो सिन्धी शब्द है। उसका अर्थ है—मृतकों का स्थान अर्थात् ‘मुर्दों का टीला’।
‘मुर्दों का टीला’ शीर्षक इस उपन्यास में रांगेय राघव ने एक रचनाकार की दृष्टि से मोअन-जो-दड़ो का उत्खनन करने का प्रयास किया है। इतिहास की पुस्तकों में तो इस सभ्यता के बारे में महज़ तथ्यात्मक विवरण ही मिल पाते हैं। लेकिन रांगेय राघव के इस उपन्यास के सहारे हम सिन्धु घाटी सभ्यता के समाज की जीवित धड़कनें सुनते हैं।
सिन्धु घाटी सभ्यता का स्वरूप क्या था? उस समाज के लोगों की जीवन-व्यवस्था का स्वरूप क्या था? रीति-रिवाज कैसे थे? शासन-व्यवस्था का स्वरूप क्या था? इन प्रश्नों का इतिहाससम्मत उत्तर आप इस उपन्यास में पाएँगे। भारतीय उपमहाद्वीप की अल्पज्ञात आदि सभ्यता को लेकर लिखा गया यह अद्वितीय उपन्यास है। रांगेय राघव का यह उपन्यास प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति में प्रवेश का पहला दरवाज़ा है।
Dastan-E-Laapata
- Author Name:
Manzoor Ehtesham
- Book Type:

-
Description:
किसी भी व्यक्ति के निजी और आत्मीय संसार में उसके समय की राजनीति और हालात किस तरह सेंध लगा सकते हैं, इसका एक बेचैन कर देनेवाला दस्तावेज़ है, सुपरिचित कथाकार मंज़ूर एहतेशाम का बहुचर्चित उपन्यास ‘दास्तान-ए-लापता’।
दरअसल संसार लोगों का ही नहीं, ‘लापताओं’ का भी मंच है। अन्य प्रजातियों की तरह यहाँ ‘लापता’ भी जन्म लेते हैं, बड़े होते हैं और आख़िर थककर अपने अन्त को प्राप्त होते हैं।
‘दास्तान-ए-लापता’ दास्तान है ज़मीर अहमद ख़ान की, जिसने ज़िन्दगी की शुरुआत में बहुत विश्वास से कहा था, ‘‘मुझे सच्चा प्यार चाहिए, बस।’’ और यह भी कि ‘‘मैं उसे हासिल करके दिखाऊँगा!’’ ‘दास्तान-ए-लापता’ इस क्रूर दुनिया में उसके बड़े होने का दस्तावेज़ है। ‘दास्तान-ए-लापता’ ज़मीर अहमद ख़ान सहित उन सब लोगों की कहानी है जो जाने-अनजाने किसी परिवार या व्यवस्था की परिधि से छूट जाते हैं। ‘दास्तान-ए-लापता’ उन लोगों की कथा है जो चाहते हुए भी अन्धी दौड़ का हिस्सा नहीं बन पाते, जो हर बार अपने अन्तर्विरोधों के साथ सिर्फ़ अपने भीतरी तहख़ानों में उतर पाते हैं। यह उन लोगों की कथा है जो ज़िन्दगी की हर असफलता में अतीत के शाप सुनते हैं, जो अपनी छोटी-छोटी बेईमानियों को आत्मा में पैबन्द की तरह लगाकर चलते हैं और एक दिन सबके देखते-देखते अपने भीतर लापता हो जाते हैं।
कथानक में पीड़ा की एक धुँधली लकीर बराबर चलती है। अपने देश-काल से असुविधाजनक सवाल पूछते-पूछते यह लकीर मंज़ूर एहतेशाम के पिछले उपन्यास ‘सूखा बरगद’ से ‘दास्तान-ए-लापता’ तक अनायास खिंच आई है। हालाँकि यहाँ पाठक को भ्रमित करने के लिए सांसारिक घटनाक्रम है, परिवारों और व्यक्तियों का सनकीपन है, फिर भी लेखक का कोई भी शिल्पगत प्रयोग इस लकीर को पूरी तरह ढक नहीं पाता।
एक तरह से ‘दास्तान-ए-लापता’ मंज़ूर एहतेशाम के पिछले उपन्यास ‘सूखा बरगद से’ प्रस्थान है। जहाँ इससे पहले लेखक का सरोकार एक अल्पसंख्यक समाज था, वहाँ इस बार अल्प या बहुसंख्यक की परिभाषा को बेमानी करता एक अकेला आदमी है, जो परिधि से बाहर की ओर चल निकला है, एक क्रमशः अदृश्य होता आदमी, जो लोप होने से पहले इस कथानक के परिदृश्य में अपने पदचिह्न छोड़ता है, अपनी सुप्त पीड़ा के साथ, शायद आख़िरी बार...
Madarsa
- Author Name:
Manzoor Ehtesham
- Book Type:

-
Description:
‘दास्तान-ए-लापता’ और ‘सूखा बरगद’ जैसे चर्चित उपन्यासों के लेखक मंज़ूर एहतेशाम की यह नई औपन्यासिक कृति समकालीन हिन्दी उपन्यास के लय-ताल रहित परिदृश्य में एक सुखद हस्तक्षेप है। यह उपन्यास पुनः स्थापित करता है कि सिर्फ़ कहानी बता देना और प्रचलित विमर्शों की जुमलेबाज़ी का बघार डालते हुए ‘पोलिटिकली करेक्ट’ मोर्चे पर सीना तानकर खड़े हो जाना ही अच्छे उपन्यास की गारंटी नहीं है। हर उपन्यास को अपनी भाषा और संरचना में अपनी ही एक लय का आविष्कार करना पड़ता है, और यही वह चीज़ है जो उसे दशकों और सदियों तक पढ़नेवाले के दिलो-दिमाग़ का हिस्सा बनाती है।
यह उपन्यास सफलतापूर्वक इस ज़िम्मेदारी को अंजाम देता है। देश और काल के विभिन्न चरणों में आवाजाही करता हुआ यह उपन्यास स्मृतियों की पगडंडियों पर जैसे चहलक़दमी करते हुए, अपने पात्रों के भीतरी और बाहरी बदलावों की प्रक्रिया से गुज़रता है; उन सवालों से रूबरू होता है जो समय हमारे भीतर रोपता रहता है और उन यंत्रणाओं से भी जिनकी ज़िम्मेदारी तय करना कभी आसान नहीं होता।
किसी भी उम्दा रचना को लेकर यह कहना कभी सम्भव नहीं होता कि इसका उद्देश्य अमुक है, अथवा इससे हमें अमुक सन्देश प्राप्त होता है। वह हमारे ही जीवन का एक ज़्यादा उजले प्रकाश में बुना गया चित्र होता है जिससे हम जाने कितनी दिशाओं से रोशनी पाते हैं, और एक ज़्यादा खुली और रौशन जगह में अपना नया ठिकाना बनाते हैं।
ठिकानों और वक़्तों की उधेड़-बुन में रोशनी की किरचें पकड़ता हुआ यह उपन्यास पाठकों को निश्चय ही अनुभूति का एक नया धरातल देगा।
Anaro
- Author Name:
Manjul Bhagat
- Book Type:

- Description: ''कहाँ गया गंजी का बाप?...दिल डूब रहा है...अनारो, तू डूब चली...उड़ चली तू...अनारो, उड़ मत...धरती? धरती कहाँ गई?...पाँव टेक ले...हिम्मत कर...थाम ले रे...नन्दलाल! हमें बेटी ब्याहनी है!...यहाँ तो दलदल बन गया!...मैं सन गई पूरी की पूरी...हाय! नन्दलाल...गंजी...छोटू!'' महानगरीय झुग्गी कॉलोनी में रहकर कोठियों में खटनेवाली अनारो की इस चीख़ में किसी एक अनारो की नहीं, बल्कि प्रत्येक उस स्त्री की त्रासदी छुपी है जो आर्थिक अभावों, सामाजिक रूढ़ियों और पुरुष अत्याचार के पहाड़ ढोते हुए भी सम्मान सहित जीने का संघर्ष करती है। सौत, ग़रीबी और बच्चे; नन्दलाल ने उसे क्या नहीं दिया? फिर भी वह उसकी ब्याहता है, उस पर गुमान करती है और चाहती है कि कारज-त्यौहार में वह उसके बराबर तो खड़ा रहे। दरअसल अनारो दु:ख और जीवट से एक साथ रची गई ऐसी मूरत है, जिसमें उसके वर्ग की सारी भयावह सच्चाइयाँ पूँजीभूत हो उठी हैं।
Parchhaiyan
- Author Name:
Mahima Mehta
- Book Type:

-
Description:
‘परछाइयाँ’ आत्म-कथा नहीं, जीवन-गाथा है। इसमें जीवन के अनुभवों और निष्कर्षों को अनावृत्त किया गया है। इस पुस्तक की पंक्तियों में पाठक स्वयं अपने जीवन में घटित घटनाओं की अनुभूति करता चलता है। मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों का सूक्ष्मता और सरलता से किया गया विश्लेषण श्रीमती महिमा मेहता के संवेदनशील मन को भी उजागर कर देता है। जीवन में संघर्ष क्या होता है और उससे जूझने के लिए सकारात्मक एवं आस्थावादी दृष्टि कैसी भूमिका निभाती है, इसका दिग्दर्शन कराती है ‘परछाइयाँ’। इन परछाइयों में जो चित्र उभरते चलते हैं उनको कुशल चितेरे की भाँति उकेरने में लेखिका अत्यन्त सफल रही है।
इस संस्मरणात्मक उपन्यास में केवल घटनाएँ नहीं, अपने समय की परिक्रमा है। वह जो बीत गया है, वह अब नहीं लौटता, लेकिन स्मृतियों में बस जाता है। प्रसाद जी के ‘आँसू’ की रचना विकल वेदना के उभरने पर सम्भव हुई थी, लेकिन यह संस्मरणात्मक उपन्यास जीवन के एकाकीपन का सहचर है।
महिमा जी गद्य लेखन करती हैं और सहज-सरल भाषा में अपने संवेगों को सम्प्रेषित करती हैं। वे ऐसे समय में लिख रही हैं जब शारीरिक पीड़ा व्यथित करती है और इस एकाकीपन में स्मृतियाँ ही साथ देती हैं। पाठक आश्चर्यचकित होगा कि उन स्मृतियों के सकारात्मक पहलुओं को लेखिका किस कुशलता से चित्रित करती हैं। मूल्यों के क्षरण के इस युग में ये प्रकाश-स्तम्भ का काम करेंगी।
लेखिका का विश्वास है कि कुछ मूल्य ऐसे होते हैं जो जीवन को जीने योग्य बनाते हैं। यही मूल्य हैं जिन्हें महिमा जी ने प्रयासपूर्वक सँजोया ही नहीं, अपनी स्मृति का हिस्सा बनाया है। आज के युग में उन मूल्यों के सजीव चित्रण ने ‘परछाइयाँ’ को विशिष्टता प्रदान की है।
Rah Gayeen Dishayen Esi Paar
- Author Name:
Sanjeev
- Book Type:

-
Description:
सृष्टि और संहार, जीवन और मृत्यु के बफर-जोन पर खड़े आदमी की नियति से साक्षात्कार करता संजीव का यह उपन्यास हिन्दी साहित्य में जैविकी पर रचा गया पहला उपन्यास है। उपन्यास के पारम्परिक ढाँचे में ग़ैर-पारम्परिक हस्तक्षेप और तज्जनित रचाव और रसाव इसकी ख़ास पहचान है। निरन्तर नए से नए और वर्जित से वर्जित विषय के अवगाहनकर्ता संजीव ने इसमें अपने ही बनाए दायरों का अतिक्रमण किया है और अपने ही गढ़े मानकों को तोड़ा है।
मिथ, इतिहास, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नए से नए विषय तथा चिन्तन की प्रयोग भूमि है यह उपन्यास और यह जीवन और मृत्यु के दोनों छोरों के आर-पार तक ढलकता ही चला गया है, जहाँ काल अनन्त है, जहाँ दिशाएँ छोटी पड़ जाती हैं, जहाँ गहराइयाँ अगम हो जाती हैं और व्याप्तियाँ अगोचर...!
Peeth Pichhe Ka Aangan
- Author Name:
Anirudh Umat
- Book Type:

- Description: ठ पीछे का आँगन' आज दिन-भर रुक-रुक कर, चाव और प्यार से, पढ़ता रहा और तुम्हारी कलाकारी से अभिभूत होता रहा। पिछले तीन-चार सालों में शायद ही किसी उपन्यास को मैंने इतने प्यार से पढ़ा हो। पहले वाक्य ने ही मुझे जकड़ लिया : 'अन्तहीन काली ऊन'। अँधेरे को ऐसी अनूठी उपमा शायद ही किसी और ने दी हो। मैंने पढ़ते हुए इतने निशान लगाए हैं, इतने वाक्य के नीचे लकीरें खींची हैं कि कोई देखे तो हैरान हो। ज़ाहिर है कि मैं तुम्हारे इस उपन्यास से बहुत प्रभावित, बहुत आश्वस्त, बहुत चमत्कृत हुआ हूँ। पहले उपन्यास (‘अँधेरी खिड़कियाँ’) में जो सम्भावनाएँ थीं, इसमें वे साकार हो गई हैं। सबसे अधिक मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि तुम सारे उपन्यास में बहुत संयत हो—और तुमने एक तरह से (फिर) स्थापित कर दिया है कि उपन्यास में अमूर्तन सम्भव ही नहीं, सुन्दर भी हो सकता है, कि प्रयोग अराजकता का पर्याय नहीं, कि 'प्रयोगवादी' उपन्यास भी उपन्यास ही है—साधारण यथार्थ के बग़ैर, भाषा और शिल्प के सहारे, आन्तरिकता के सहारे, मानवीय लाचारियों के सहारे... कहने का मतलब यह कि तुमने अपने इस काम से मुझे प्रभावित ही नहीं किया, मोह भी लिया। —कृष्ण बलदेव व
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book