Shesh Kadambari
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‘सोशल वर्क’ और ‘सोशल जस्टिस’ इन दो शब्दों के बीच के स्पेश का मोहक किन्तु मार्मिक प्रतिबिम्बन है अलका सरावगी का उपन्यास—‘शेष कादम्बरी’। वृद्ध और युवा जीवन-दृष्टि के फ़र्क़ को रेखांकित करनेवाला यह उपन्यास अलका सरावगी के जीवन्त लेखन का ऐसा प्रतीक है जिसमें उन्नीसवीं सदी में जन्मे, रूबी दी के मामा देवीदत्त का व्यक्तित्व रूबी दी के लिए ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ का कारक बनकर उभरता है। इस ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ की गिरफ़्त में रूबी दी अपनी किशोरावस्था में ही आ चुकी हैं और इससे उबरने के प्रयास में वे एकरेखीय ‘सोशल-वर्क’ के आडम्बर से जुड़ी रहीं और अन्ततः अपनी नातिन ‘कादम्बरी’ में अपनी शेष कथा देखने को बाध्य हुईं। जीवन और उपन्यास का तालमेल बैठाने के लिए अलका सरावगी ने परिचित ढाँचे से बाहर निकलकर यह रेखांकित किया है कि ‘शेष कादम्बरी’ ऐसा जीवन है जिसमें उपन्यास का प्रवाह या फिर जीवन का <br>उद् दात है। अलका सरावगी की यह औपन्यासिक कृति उपभोक्तावादी मूल्यों के बरक्स उदारवादी मूल्यों की स्थापना भी करती है। आधुनिक जीवन के पेचोखम का रूपायण इस उपन्यास को अविस्मरणीय बनाता है।
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‘सोशल वर्क’ और ‘सोशल जस्टिस’ इन दो शब्दों के बीच के स्पेश का मोहक किन्तु मार्मिक प्रतिबिम्बन है अलका सरावगी का उपन्यास—‘शेष कादम्बरी’। वृद्ध और युवा जीवन-दृष्टि के फ़र्क़ को रेखांकित करनेवाला यह उपन्यास अलका सरावगी के जीवन्त लेखन का ऐसा प्रतीक है जिसमें उन्नीसवीं सदी में जन्मे, रूबी दी के मामा देवीदत्त का व्यक्तित्व रूबी दी के लिए ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ का कारक बनकर उभरता है। इस ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ की गिरफ़्त में रूबी दी अपनी किशोरावस्था में ही आ चुकी हैं और इससे उबरने के प्रयास में वे एकरेखीय ‘सोशल-वर्क’ के आडम्बर से जुड़ी रहीं और अन्ततः अपनी नातिन ‘कादम्बरी’ में अपनी शेष कथा देखने को बाध्य हुईं। जीवन और उपन्यास का तालमेल बैठाने के लिए अलका सरावगी ने परिचित ढाँचे से बाहर निकलकर यह रेखांकित किया है कि ‘शेष कादम्बरी’ ऐसा जीवन है जिसमें उपन्यास का प्रवाह या फिर जीवन का <br>उद् दात है। अलका सरावगी की यह औपन्यासिक कृति उपभोक्तावादी मूल्यों के बरक्स उदारवादी मूल्यों की स्थापना भी करती है। आधुनिक जीवन के पेचोखम का रूपायण इस उपन्यास को अविस्मरणीय बनाता है।
Book Details
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ISBN9788126708574
-
Pages200
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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“रूमानी शायर जिस्म पर भी जिस्म से लिखता है,’’ मैंने कहा।
“आप जिस्मानी शायर हैं!”‘जिस्म जिस्म के लोग’ बदलते हुए जिस्मों की आत्मकथा है। ‘जिस्म जिस्म के लोग’ में—और हर जिस्म में—बदलते वक़्त और बदलते ताल्लुक़ात का रिकॉर्ड दर्ज है।
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यह उपन्यास एक मासूम लड़की के बारे में है जिसका नाम भी उसकी माँ ने मासूमा ही रखा था, लेकिन ज़माने ने जिसे बाद में नाम दिया—नीलोफ़र, और जो औरत होने से पहले ही ऐसी कुछ हो गई कि जो ख़ुद उसकी भी समझ से परे था।
इस्मत चुग़ताई की सधी क़लम का यह शाहकार अपने वक़्त की उस औरत की अक़्क़ाशी करता है जिसके पास अगर ख़ूबसूरत जिस्म न हो, उसे चाहनेवाले पतिंगे न हों, तो वह कुछ नहीं रह जाती और अगर हों तो भूखे-भेड़ियों की हवस की गेंद बनकर रह जाती है। इस्मत इस उपन्यास में औरत की यह हौलनाक़ तस्वीर खींचकर जैसे हर युग की औरतों को चेता रही हैं और कहने की ज़रूरत नहीं कि इक्कीसवीं सदी की चमक-दमक से चौंधियाई हमारी असंख्य उदास, नीम अँधेरी गलियों में आज भी ऐसी मासूम रूहें परवान चढ़ रही हैं, जिनको अगर एक मज़बूत चारदीवारी नसीब न हो तो वे जाने किस राह पर लावारिस पत्थर का टुकड़ा होकर जा रहें, जहाँ कोई भी आता-जाता उनसे खेले और ठुकराकर चलता बने।
नीलोफ़र होने के बाद मासूमा जिस मर्द-समाज के हवाले होती है, उसका रवैया औरत को लेकर आज भी वही है जो उत्तर-आधुनिकता और वैश्वीकरण के हड़बोंग से पहले था। इसलिए यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उर्दू में प्रकाशित होने के समय था। इसके अलावा इस्मत आपा की क़िस्सागोई समाज और आदमी की गहरी पहचान, ज़बान की मास्टरी और अपने पात्रों की तस्वीर-निगारी की महारत भारतीय साहित्य की कालजयी विरासत है, जो इस उपन्यास में भी अपने शबाब पर है।
Pardes
- Author Name:
Suchitra Bhattacharya
- Book Type:

- Description: इनसान अपना गाँव-देहात छोड़कर, रोज़ी-रोटी या कारोबार के चक्कर में किसी और शहर में आ बसता है। वहाँ की संस्कृति-विशेष, रहन-सहन, बोलचाल में घुल-मिल जाता है और उसी शहर में अपनी जड़ें जमा लेता है। यही होता है, अकसर होता है, अधिकतर होता है। पंजाब के गाँव-देहात की ज़मीन में उगा राजिन्दर परिवार जब ’84 के दंगे के सिख-विरोधी दंगों के चलते दिल्ली से उखड़कर कलकत्ता जैसे महानगर में पनाह लेता है और अपना छोटा-मोटा कारोबार भी जमा लेता है, तो यह शहर भी उसका अपना हो जाता है। परिवार का नौजवान बेटा, कुलदीप, अपने बंगाली मित्र राना की बहन रिमझिम से प्यार करने लगता है। मगर उनके भरे-पूरे ख़ुशहाल परिवार पर मौत की छाया तब उतर आती है, कि कलकत्ता घूमने आए राजिन्दर के बेटे और जीजा को आतंकवादी समझकर पंजाब पुलिस गोलियों से भून डालती है। इस अन्याय, अत्याचार और बेईमानी की आग में समूचा का समूचा परिवार जलकर भस्म हो जाता है। इस प्रतिकारहीन अँधेरे में नौजवान वर्ग का प्रतिनिधि कुलदीप, एक बूँद उजास की तलाश में दिशाहीन हो उठता है। उसका मोहभंग होता है। उसे अहसास होता है कि अपना गाँव–देस ही शायद उसकी पनाह है, बाक़ी हर जगह परदेस है, जहाँ वे महज़ प्रवासी हैं। कुलदीप वापस अपने गाँव जाने का फ़ैसला करता है, मगर तभी कुछेक जलते हुए सवाल उसे घेर लेते हैं—वहाँ जाकर भी क्या वह भूमिपुत्र हो सकेगा? अपनी ही नज़रों में क्या वह अजनबी नहीं होगा? इन तमाम सवालों का जवाब है, कथाकार सुचित्रा भट्टाचार्य का विस्मयकारी उपन्यास—‘परदेस’।
Trimurti
- Author Name:
R. S. Kelkar
- Book Type:

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Description:
यह आज़ादी के कुछ बरसों बाद की दिल्ली है और दिल्ली का सत्ता-तंत्र। स्वतंत्रता के लिए चले लम्बे संघर्ष, अनेक लोगों की क़ुर्बानी के बाद हासिल हुई गद्दियों का निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करते नेताओं, उनके छुटभैयों, टुटपुँजिया व्यवसायियों की कलुष-क्रीड़ा।
र.श. केलकर ने इस छोटे से उपन्यास में जिस दुनिया का चित्र खींचा है, भारतीय लोकतंत्र को उसके बहुत बाद तक भुगतने थे। कौड़ीमल एम.पी. हों, उनके लिए प्राइवेट सेक्रेटरी के तौर पर काम करनेवाली प्रतिभा हो, लाला रामभरोसे हों, या अन्य पात्र, धीर-धीरे इन सबको
व्यक्तियों के बजाय पतन के प्रतीक बन जाना था।
लाइसेंसों, ठेकों, ज्योतिषियों, बिना रीढ़ के बुद्धिजीवियों और धन के परजीवियों की एक पूरी दुनिया इस उपन्यास में हमें दिखाई देती है।
उपन्यास में ख़ास तौर पर देखने लायक़ है—दिल्ली की सड़कों-गलियों-बाज़ारों आदि का विवरण देनेवाली लेखक की भाषा जो एक कैमरे की तरह एक-एक चीज़ का विवरण देती चलती है। शब्द चित्र हो उठते हैं, और लेखक नि:संगतापूर्वक कहानी को उनके बीच से आगे लिए जाता है।
Kalindi
- Author Name:
Shivani
- Book Type:

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Description:
...“एक बुज़ुर्ग ने मुझे रोककर कहा—‘कालिंदी’ पढ़ रहा हूँ!...अहा कैसा चित्र खींचा है उन दिनों का। लगता है एक बार फिर उसी अल्मोड़ा में पहुँच गया हूँ।”
“मुझे लगा मुझे कुमाऊँ का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार मिल गया।”...शिवानी के यह शब्द उपन्यास की पाठकों तक सहज पहुँच और स्वयं उनकी अपने लाखों सरल, अनाम पाठकों के प्रति अगाध समर्पण भाव का आईना है।
डॉक्टर कालिंदी एक स्वयंसिद्धा लड़की है, जिसने अपने जीवन के झंझावातों से अपनी शर्तों पर मुक़ाबला किया। कुमाऊँ की स्त्री-शक्ति के सुदीर्घ शोषण और उसकी अदम्य सहनशक्ति और जिजीविषा का दस्तावेज़ यह उपन्यास नए और पुराने के टकराव और पुनर्सृजन की गाथा भी है। शिवानी की मातृभूमि अल्मोड़ा और उस अंचल के गाँवों की मिट्टी-बयार की गन्ध से भरी कालिंदी की व्यथा-कथा भारत की उन सैकड़ों लड़कियों की महागाथा है, जो आधुनिकता का स्वागत करती हैं, लेकिन परम्परा की डोर को भी नहीं काट पातीं। अपने पुरुष उत्पीड़कों और शोषकों के प्रति भी अनथक स्नेह-ममत्व बनाए रखनेवाली कालिंदी और उसकी एकाकिनी माँ अन्नपूर्णा क्या आज भी देश के हर अंचल में मौजूद नहीं?
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