🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Saundaryashastra Ke Tatva

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

कविता के सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता इसलिए है कि वह न सिर्फ़ मनुष्य के सर्जनात्मक अन्तर्मन की एक रचनात्मक प्रक्रिया है, बल्कि उसकी संरचना में अन्य कलाओं के तत्त्व और गुण भी समाहित होते हैं। भारतीय काव्य-चेतना की परम्परा के अनुसार भी काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में कविता के कलात्मक अंश और काव्येतर तत्त्वों के समागम की अवहेलना नहीं की गई है। इसलिए ललित कलाओं की व्यापक पृष्ठभूमि में काव्य का तात्त्विक अध्ययन ज़रूरी है। इसी को कविता का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन कहते हैं। लेकिन अनेक विद्वानों द्वारा समय-समय पर इस आवश्यकता को रेखांकित किए जाने के बावजूद हिन्दी आलोचना-साहित्य में अभी तक हम इस दिशा में छिटपुट निबन्धों, लेखों से आगे नहीं बढ़ सके हैं। जो काम सामान्यतः सामने आया है, वह अपेक्षित सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण और तात्त्विक विश्लेषण के अभाव के चलते सन्तोषजनक नहीं है। यह पुस्तक हिन्दी साहित्य की उस कमी को पूरा करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। इसमें सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन की अभी तक उपलब्ध परम्परा की पूर्वपीठिका में काव्य के प्रमुख तत्त्वों, यथा—सौन्दर्य, कल्पना, बिम्ब और प्रतीक का विशद और हृदयग्राही विवेचन किया गया है। अपने विषय में ‘प्रस्थान-ग्रन्थ’ बन सकने की क्षमतावाली इस पुस्तक में सौन्दर्यशास्त्र को व्यावहारिक आलोचना के धरातल पर उतारा गया है जिसका प्रमाण द्वितीय खंड में प्रस्तुत छायावादी कविता का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन है। इसकी दूसरी विशेषता है सौन्दर्यशास्त्र की स्वीकृत और अंगीकृत मान्यताओं के आधार पर काव्यशास्त्र की एक नई दिशा की ओर संकेत। कहा जा सकता है कि यह ग्रन्थ कई दृष्टियों से ज्ञान की परिधि का विस्तार करता है और हिन्दी साहित्य में सौन्दर्यशास्त्रीय या कलाशास्त्रीय मान्यताओं के सहारे निष्पन्न एक ऐसे अद्यतन काव्यशास्त्र का रूप उपस्थित करता है, जिसमें परम्परागत प्रणालियों के अनुशीलन से आगे बढ़कर नवीन चिन्तन और आधुनिक वैज्ञानिक उद्भावनाओं का भी उपयोग किया गया है।

Read more

₹ 250

₹ 200 20% off

Available

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

Frequently bought together
Saundaryashastra Ke Tatva This book ₹200
Adhyatmik Guruon Ke Prerak Vichar Swati Gautam ₹250
3 books selected ₹800 ₹750

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

कविता के सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता इसलिए है कि वह न सिर्फ़ मनुष्य के सर्जनात्मक अन्तर्मन की एक रचनात्मक प्रक्रिया है, बल्कि उसकी संरचना में अन्य कलाओं के तत्त्व और गुण भी समाहित होते हैं। भारतीय काव्य-चेतना की परम्परा के अनुसार भी काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में कविता के कलात्मक अंश और काव्येतर तत्त्वों के समागम की अवहेलना नहीं की गई है। इसलिए ललित कलाओं की व्यापक पृष्ठभूमि में काव्य का तात्त्विक अध्ययन ज़रूरी है। इसी को कविता का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन कहते हैं। लेकिन अनेक विद्वानों द्वारा समय-समय पर इस आवश्यकता को रेखांकित किए जाने के बावजूद हिन्दी आलोचना-साहित्य में अभी तक हम इस दिशा में छिटपुट निबन्धों, लेखों से आगे नहीं बढ़ सके हैं। जो काम सामान्यतः सामने आया है, वह अपेक्षित सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण और तात्त्विक विश्लेषण के अभाव के चलते सन्तोषजनक नहीं है।

यह पुस्तक हिन्दी साहित्य की उस कमी को पूरा करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। इसमें सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन की अभी तक उपलब्ध परम्परा की पूर्वपीठिका में काव्य के प्रमुख तत्त्वों, यथा—सौन्दर्य, कल्पना, बिम्ब और प्रतीक का विशद और हृदयग्राही विवेचन किया गया है। अपने विषय में ‘प्रस्थान-ग्रन्थ’ बन सकने की क्षमतावाली इस पुस्तक में सौन्दर्यशास्त्र को व्यावहारिक आलोचना के धरातल पर उतारा गया है जिसका प्रमाण द्वितीय खंड में प्रस्तुत छायावादी कविता का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन है।

इसकी दूसरी विशेषता है सौन्दर्यशास्त्र की स्वीकृत और अंगीकृत मान्यताओं के आधार पर काव्यशास्त्र की एक नई दिशा की ओर संकेत।

कहा जा सकता है कि यह ग्रन्थ कई दृष्टियों से ज्ञान की परिधि का विस्तार करता है और हिन्दी साहित्य में सौन्दर्यशास्त्रीय या कलाशास्त्रीय मान्यताओं के सहारे निष्पन्न एक ऐसे अद्यतन काव्यशास्त्र का रूप उपस्थित करता है, जिसमें परम्परागत प्रणालियों के अनुशीलन से आगे बढ़कर नवीन चिन्तन और आधुनिक वैज्ञानिक उद्भावनाओं का भी उपयोग किया गया है।

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
7th
Publication year
1967
Weight
596 grams
ISBN-13
9788119159710
Pages
306
Reading time
~10 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp