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Akbar Allahabadi Par Ek Aur Nazar

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उर्दू के विख्यात आलोचक, उपन्यासकार, कवि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के ये तीन आलेख अकबर इलाहाबादी को एक नए ढंग से देखते हैं और अकबर की कविता और उनके चिन्तन को बिलकुल नए मायने देते हैं। आमतौर पर व्यंग्य को दूसरी श्रेणी का साहित्य कहा जाता रहा है। यह इस कारण भी हुआ कि अंग्रेज़ी साम्राज्य शिक्षण की रोशनी में अकबर के विचार पुराने, और पुराने ही नहीं पीछे की तरफ़ लौट जाने का तक़ाज़ा करते मालूम होते थे। शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने पहली बार इस भ्रम को तोड़ा है और इन आलेखों में बताया है कि व्यंग्य को दूसरी श्रेणी का साहित्य कहना बहुत बड़ी भूल है। वे अकबर इलाहाबादी को उर्दू के छह सबसे बड़े शायरों में मानते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि अकबर नई चीज़ों के ख़िलाफ़ नहीं थे, मगर वो यह भी जानते थे कि अंग्रेज़ों ने ये नई चीज़ें हिन्दुस्तानियों के उद्धार के लिए नहीं, बल्कि अपनी उपनिवेशीय शक्तियों को फैलाने और बढ़ाने के लिए स्थापित की थीं। फ़ारूक़ी इन आलेखों में बताते हैं कि कल्चर भी उपनिवेशीय आक्रमण का प्रतीक और माध्यम बन जाता है। अकबर कहते हैं कि अंग्रेज़ पहले तो तोप लगाकर साम्राज्य को क़ायम करते हैं, फिर ग़ुलामों की ज़हनियत को अपने अनुकूल बनाने के लिए उन्हें अपने ढंग की तालीम देते हैं। फ़ारूक़ी कहते हैं कि इन बातों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि तथाकथित उन्नति लानेवाली चीज़ों के पीछे दरअसल उपनिवेश और साम्राज्य को फैलाने की पॉलिसी थी। उनका कहना है कि अकबर इलाहाबादी पहले हिन्दुस्तानी हैं, जिन्होंने इस बात को पूरी तरह महसूस किया और साफ़–साफ़ बयान किया। फ़ारूक़ी पहले आलोचक हैं जिन्होंने इन आलेखों में अकबर इलाहाबादी और उनके व्यंग्य को, पोस्ट कोलोनियल दृष्टिकोण से देखने की भरपूर कोशिश की है। फ़ज़्ले हसनैन और ताहिरा परवीन ने उर्दू से हिन्दी में अनुवाद करते समय ग्राह्यता व भाषिक प्रवाह का विशेष ध्यान रखा है ।

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उर्दू के विख्यात आलोचक, उपन्यासकार, कवि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के ये तीन आलेख अकबर इलाहाबादी को एक नए ढंग से देखते हैं और अकबर की कविता और उनके चिन्तन को बिलकुल नए मायने देते हैं। आमतौर पर व्यंग्य को दूसरी श्रेणी का साहित्य कहा जाता रहा है। यह इस कारण भी हुआ कि अंग्रेज़ी साम्राज्य शिक्षण की रोशनी में अकबर के विचार पुराने, और पुराने ही नहीं पीछे की तरफ़ लौट जाने का तक़ाज़ा करते मालूम होते थे। शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने पहली बार इस भ्रम को तोड़ा है और इन आलेखों में बताया है कि व्यंग्य को दूसरी श्रेणी का साहित्य कहना बहुत बड़ी भूल है। वे अकबर इलाहाबादी को उर्दू के छह सबसे बड़े शायरों में मानते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि अकबर नई चीज़ों के ख़िलाफ़ नहीं थे, मगर वो यह भी जानते थे कि अंग्रेज़ों ने ये नई चीज़ें हिन्दुस्तानियों के उद्धार के लिए नहीं, बल्कि अपनी उपनिवेशीय शक्तियों को फैलाने और बढ़ाने के लिए स्थापित की थीं। फ़ारूक़ी इन आलेखों में बताते हैं कि कल्चर भी उपनिवेशीय आक्रमण का प्रतीक और माध्यम बन जाता है।

अकबर कहते हैं कि अंग्रेज़ पहले तो तोप लगाकर साम्राज्य को क़ायम करते हैं, फिर ग़ुलामों की ज़हनियत को अपने अनुकूल बनाने के लिए उन्हें अपने ढंग की तालीम देते हैं। फ़ारूक़ी कहते हैं कि इन बातों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि तथाकथित उन्नति लानेवाली चीज़ों के पीछे दरअसल उपनिवेश और साम्राज्य को फैलाने की पॉलिसी थी। उनका कहना है कि अकबर इलाहाबादी पहले हिन्दुस्तानी हैं, जिन्होंने इस बात को पूरी तरह महसूस किया और साफ़–साफ़ बयान किया।

फ़ारूक़ी पहले आलोचक हैं जिन्होंने इन आलेखों में अकबर इलाहाबादी और उनके व्यंग्य को, पोस्ट कोलोनियल दृष्टिकोण से देखने की भरपूर कोशिश की है।

फ़ज़्ले हसनैन और ताहिरा परवीन ने उर्दू से हिन्दी में अनुवाद करते समय ग्राह्यता व भाषिक प्रवाह का विशेष ध्यान रखा है ।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2012
Weight
210 grams
ISBN-13
9788126722884
Pages
87
Reading time
~3 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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