Samkaleen Rang-Paridrishya
About the book
इस पुस्तक के लेख और समीक्षाएँ लेखक की लम्बी यात्रा के दस्तावेज़ हैं। इनमें नाटक और रंगमंच से जुड़े हर पहलू पर न सिर्फ़ व्यापक रूप से चर्चा की गई है, बल्कि कई समकालीन सवालों और समस्याओं का हल भी तलाशने की कोशिश की गई है। थियेटर के व्यावसायिक होने की चिन्ताओं पर विमर्श जहाँ कई ज़रूरी बातों को रेखांकित करता है, वहीं भारतीय रंगमंच-निर्देशन और अभिनय की दुनिया की विरल प्रतिभाओं के अप्रतिम योगदान के अतिरिक्त जिन विशिष्ट निर्देशकों-अभिनेताओं ने अपने अद्वितीय प्रस्तुतीकरण से रंग-जगत को अमिट स्मृतियों से समृद्ध किया—हबीब तनवीर, इब्राहिम अल्काज़ी, श्यामानन्द जालान, ब.व. कारन्त—उन पर भी पर्याप्त सामग्री दी गई है। हिन्दी रंगमंच के विकास की दिशा बहुमुखी रही है, उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए कुछ लेख ऐसे हैं जो न केवल रंगमंच के इतिहास के कुछ पहलुओं या स्थितियों को जानने में मदद करते हैं, बल्कि उनके परवर्ती प्रभावों की महत्ता को भी स्पष्ट करते हैं; जैसे—'इच्छा-शक्ति का इतिहास और इप्टा की सीमाएँ’, 'जब्तशुदा साहित्य, पत्रकारिता और पारसी थियेटर’, 'विद्रोही वृत्ति का मंत्र बना नीलदर्पण का प्रकाशन’, 'पचास वर्षों में भी सामाजिकचर्या नहीं बना : दिल्ली का रंगकर्म’, 'दिल्ली का पंजाबी रंगमंच’। पुस्तक के कुछ लेख संस्मरणात्मक हैं—'आपबीती के बहाने नाट्यालोचन पर एक विमर्श’, 'बुल्ला...की जाने...मैं कौन!’, 'कारन्त की समकालीनता’। 'क्रान्ति का विचार और संस्कृत नाटक’ इस लेख में प्रचलित छवि से हटकर, संस्कृत नाटक के एक अछूते पक्ष को लेखक ने नई दृष्टि के साथ उजागर किया है। वहीं नाट्य-पुस्तक हो या रंगकर्म सम्बन्धित कोई मुद्दा या गतिविधि, उसकी अन्तर्वस्तु से उठते या जुड़े इतर सवालों को, समीक्षा लिखते समय उसके शीर्षक के माध्यम से प्रतिध्वनित किया गया है—'विद्रोह के लुभावने स्वर’, 'युद्ध के निमित्त राष्ट्र-प्रेम और राजनीति’, 'औपनिवेशिक परिवेश में विदेशी भाषाओं के नाट्यानुवाद’, 'प्रासंगिकता के दबाव से घिरे कुछ नाटक’ आदि। 'समकालीन रंग-परिदृश्य’ लेखक के अपने विषय के प्रति वर्षों से लगाव, गहरी दिलचस्पी तथा अपने दृष्टिकोण की खोज का एक विशिष्ट परिणाम है।
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About the Book
इस पुस्तक के लेख और समीक्षाएँ लेखक की लम्बी यात्रा के दस्तावेज़ हैं। इनमें नाटक और रंगमंच से जुड़े हर पहलू पर न सिर्फ़ व्यापक रूप से चर्चा की गई है, बल्कि कई समकालीन सवालों और समस्याओं का हल भी तलाशने की कोशिश की गई है।
थियेटर के व्यावसायिक होने की चिन्ताओं पर विमर्श जहाँ कई ज़रूरी बातों को रेखांकित करता है, वहीं भारतीय रंगमंच-निर्देशन और अभिनय की दुनिया की विरल प्रतिभाओं के अप्रतिम योगदान के अतिरिक्त जिन विशिष्ट निर्देशकों-अभिनेताओं ने अपने अद्वितीय प्रस्तुतीकरण से रंग-जगत को अमिट स्मृतियों से समृद्ध किया—हबीब तनवीर, इब्राहिम अल्काज़ी, श्यामानन्द जालान, ब.व. कारन्त—उन पर भी पर्याप्त सामग्री दी गई है।
हिन्दी रंगमंच के विकास की दिशा बहुमुखी रही है, उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए कुछ लेख ऐसे हैं जो न केवल रंगमंच के इतिहास के कुछ पहलुओं या स्थितियों को जानने में मदद करते हैं, बल्कि उनके परवर्ती प्रभावों की महत्ता को भी स्पष्ट करते हैं; जैसे—'इच्छा-शक्ति का इतिहास और इप्टा की सीमाएँ’, 'जब्तशुदा साहित्य, पत्रकारिता और पारसी थियेटर’, 'विद्रोही वृत्ति का मंत्र बना नीलदर्पण का प्रकाशन’, 'पचास वर्षों में भी सामाजिकचर्या नहीं बना : दिल्ली का रंगकर्म’, 'दिल्ली का पंजाबी रंगमंच’।
पुस्तक के कुछ लेख संस्मरणात्मक हैं—'आपबीती के बहाने नाट्यालोचन पर एक विमर्श’, 'बुल्ला...की जाने...मैं कौन!’, 'कारन्त की समकालीनता’। 'क्रान्ति का विचार और संस्कृत नाटक’ इस लेख में प्रचलित छवि से हटकर, संस्कृत नाटक के एक अछूते पक्ष को लेखक ने नई दृष्टि के साथ उजागर किया है। वहीं नाट्य-पुस्तक हो या रंगकर्म सम्बन्धित कोई मुद्दा या गतिविधि, उसकी अन्तर्वस्तु से उठते या जुड़े इतर सवालों को, समीक्षा लिखते समय उसके शीर्षक के माध्यम से प्रतिध्वनित किया गया है—'विद्रोह के लुभावने स्वर’, 'युद्ध के निमित्त राष्ट्र-प्रेम और राजनीति’, 'औपनिवेशिक परिवेश में विदेशी भाषाओं के नाट्यानुवाद’, 'प्रासंगिकता के दबाव से घिरे कुछ नाटक’ आदि।
'समकालीन रंग-परिदृश्य’ लेखक के अपने विषय के प्रति वर्षों से लगाव, गहरी दिलचस्पी तथा अपने दृष्टिकोण की खोज का एक विशिष्ट परिणाम है।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2019
- Weight
- 602 grams
- ISBN-13
- 9788183619349
- Pages
- 400
- Reading time
- ~13 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14.5 × 22.5 cm
- Language
- Hindi
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