Aasan Arooz
Author:
Dr. AzamPublisher:
Shivna PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Available
Urdu Grammer Book
ISBN: 9789381520024
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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नामवर जी के व्याख्यानों की यह दूसरी पुस्तक है। ये व्याख्यान नामवर जी के उत्तरवर्ती समय की वैचारिकता की स्पष्ट झलक देते हैं। पूर्ववर्ती लेखन में वैचारिक संघर्ष के क्रम में समय-समय पर वे ‘आलोचना’ के बारे में अपनी राय रखते रहे, परन्तु आलोचना में स्वीकृत अवधारणाओं की विस्तृत समीक्षा करने और हिन्दी आलोचना की पूरी परम्परा पर एक साथ विचार करने के अवसर कम ही आए। इन व्याख्यानों में व्यक्त विचार वस्तुतः नामवर जी के सम्पूर्ण रचनात्मक जीवन के सार की तरह देखे जा सकते हैं। यह एक तरह से ‘मधु कोष’ है।
पुस्तक चार खंडों में बँटी हुई है। पहले खंड में संकलित दोनों व्याख्यान ‘नामवर के निमित्त’ के कार्यक्रमों में दिए गए थे। इधर के वर्षों में एक आलोचक के रूप में उनकी सभी प्रमुख चिन्ताएँ यहाँ एक साथ मौजूद हैं। दूसरे खंड के व्याख्यान नामवर जी की आलोचना की मूल दृष्टि को स्पष्ट करने में मदद करते हैं। इनका परिप्रेक्ष्य स्पष्टतः वैचारिक और अवधारणात्मक है।
तीसरे खंड के व्याख्यानों का सम्बन्ध हिन्दी की आलोचना विशेषतः उसके समकालीन परिदृश्य से है। आलोचना के समक्ष मौजूद संकटों को पहचानने की कोशिश करते ये व्याख्यान ज़रूरी विवादों के परिप्रेक्ष्य में अपना पक्ष मज़बूती से रखते हैं। चौथे खंड में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा और राहुल सांकृत्यायन पर केन्द्रित व्याख्यान हैं। आचार्य द्विवेदी पर एक शृंखला में दिए गए तीन व्याख्यानों में पहली बार उनकी रचनात्मकता की विशिष्टता का प्रकटन होता है।
नामवर जी की परवर्ती आलोचना में राहुल सांकृत्यायन के विचारों की एक अनुगूँज सुनी जा सकती है। डॉ. रामविलास शर्मा से संस्कृति सम्बन्धी विवादों का एक सिरा यहाँ तक भी जाता हुआ, स्पष्टतः देखा जा सकता है।
Hindi Gadya : Vinyas Aur Vikas
- Author Name:
Ramswaroop Chaturvedi
- Book Type:

- Description: वर्तमान युग गद्य है, अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में। इस दृष्टि से गद्य की प्रकृति और उसके विकास को समझने का क्रम आधुनिक साहित्य की समग्र परम्परा को देखने-परखने की प्रक्रिया तो है ही, एक व्यापक स्तर पर वह समूची हिन्दी जाति की मानसिकता को समझने का यत्न भी है। आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी की अभिनव कृति ‘हिन्दी गद्य : विन्यास और विकास’ यही काम करती है। गद्य विषयक तथ्य-सामग्री यहाँ जितनी विश्वसनीय है, उतना ही गद्य का विवेचन अपने में स्वयं गद्य का मानक रूप बन सका है। इस द्विस्तरीय उपलब्धि का अनुमान पुस्तक के किसी भी अंश को पढ़ने पर आसानी से हो सकता है। फिर गद्य के प्रसार और विस्तार में काव्य-रूपों का उदय कैसे होता है, यह मौलिक विवेचन प्रस्तुत अध्ययन की निजी विशेषताओं में से एक है। ग्रन्थ का विवेचन-क्रम तीन खंडों में चलता है। प्रथम खंड में गद्य की सामान्य प्रकृति का विश्लेषण है, द्वितीय में हिन्दी गद्य के एक हज़ार वर्षों का विकास-क्रम सोदाहरण विस्तार में अंकित हुआ है, और तीसरे तथा अन्तिम खंड में हिन्दी के प्रमुख गद्यकारों का सम्रग्र तथा स्वतंत्र रूप से विवेचन है। अन्त में कई परिशिष्टों के अन्तर्गत गद्यविषयक कुछ सामान्यत: दुर्लभ सामग्री सँजोई गई है, जो हर स्तर के अध्येता के लिए रुचिकर और उपयोगी दोनों होगी। यों गद्य आज जैसे समस्त जीवन में परिव्याप्त है उसके अनुकूल ही इस अध्ययन को परिपूर्ण बनाने का आलोचकीय यत्न है विविध वर्ग के पाठकों की तुष्टि कर सकने के लिए।
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