Hindi Aalochana Aur Bhaktikavya
Author:
Rustam RoyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
‘हिन्दी आलोचना और भक्तिकाव्य’ में रुस्तम राय ने हिन्दी आलोचना के मूल्य-निर्माण की प्रक्रिया, काव्य में लोकमंगल की अवधारणा और उसका संधान, सौन्दर्यानुभूति की पहचान, भक्तिकाव्य की सामाजिक भूमिका, काव्यानुभूति की विशुद्धता और भक्तिकाव्य की प्रगतिशीलता पर विस्तार-पूर्वक विचार किया है। उन्होंने हिन्दी आलोचना के मूल्य-निर्माण की प्रक्रिया के साथ-साथ हिन्दी आलोचकों के भक्तिकाव्य विषयक मूल्यांकन को विस्तृत रूप से प्रस्तुत करते हुए अपने मौलिक विचार भी प्रकट किए हैं। एक प्रकार से हिन्दी आलोचना और भक्तिकाव्य, दोनों पर इस किताब में पुनर्विचार का प्रयत्न है और भक्तिकाव्य से हिन्दी आलोचना के अंतरंग सम्बन्ध की नई व्याख्या भी। लेखक ने सगुण-निर्गुण और उसके सामाजिक आधारों पर विचार करते हुए न केवल भक्त कवियों के आन्तरिक द्वन्द्व को बल्कि आलोचकों के मतों के अन्तर्विरोध को भी उजागर किया है।</p>
<p>कबीर और तुलसी के प्रसंग में उठनेवाले विवादों पर भी इस पुस्तक में चर्चा की गई है। इन दोनों कवियों की विश्व-दृष्टियों के अन्तर को रेखांकित करते हुए उनके आध्यात्मिक विचारों के बदले सामाजिक विचारों को प्राथमिकता दी गई है। इस पुस्तक में एक तरह से भक्तिकाव्य की आलोचना के माध्यम से हिन्दी आलोचना का इतिहास भी प्रस्तुत किया गया है।</p>
<p>समग्रतः इस पुस्तक में लेखक ने न केवल परिश्रम, सूझबूझ और आलोचकीय विवेक का परिचय दिया है, बल्कि मूल्यों की टकराहट और मूल्यांकनों के द्वन्द्व में उसने अपना स्वतंत्र विवेक नहीं खोया है। इसीलिए लेखक के निष्कर्षों से उसके निर्णय की क्षमता भी प्रकट होती है। निश्चय ही पुस्तक की प्रस्तुति स्तरीय, भाषा विषयानुकूल, प्रवाहपूर्ण और परिमार्जित है।</p>
<p>—डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय
ISBN: 9788119989553
Pages: 160
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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मनोहर श्याम जोशी सृजनात्मक लेखन की तरह ही अपने विशिष्ट वैचारिक लेखन के लिए भी जाने जाते रहे हैं। उनके वैचारिक लेखन का दायरा बहुत ही व्यापक रहा है। उन्होंने अमेरिकी साम्राज्यवाद, आतंकवाद तथा साम्प्रदायिकता जैसे ज्वलंत मुद्दों के साथ-साथ बच्चों के इम्तिहान, साइबर प्रेम, उत्तर आधुनिक फतवेबाजी, हिन्दी डे जैसे छोटे-छोटे मगर जरूरी मसलों पर भी कलम चलाई है। देश और समाज से जुड़े हर ज्वलंत सवाल से टकराते हुए उसकी विशेषताओं और विसंगतियों पर वे बिना किसी पूर्वाग्रह के बेवाक टिप्पणी करते हैं। जीवन और समय की विडम्बनाओं को उजागर करने के लिए भाषा की अभिव्यंजना शक्ति का सटीक इस्तेमाल उनके लेखन की ख़ास विशेषता रही है।
समय और समाज को देखने का उनका दृष्टिकोण विज्ञान की शिक्षा और पत्राकारिता की पृष्ठभूमि से निर्मित था जिसे हिन्दी के बौद्धिक संसार में दुर्लभ ही कहा जाएगा। अपने देश में ही नहीं पूरी दुनिया की हर छोटी-बड़ी घटना पर उनकी नजर रहती थी। पहले वे संवेदना के स्तर पर उससे जुड़ते थे, फिर एक पेशेवर राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक की तरह उसकी पड़ताल करते थे। एक संवेदनशील साहित्यकार और चेतनशील राजनीतिक टिप्पणीकार का अद्भुत संयोग उनके व्यक्तित्व में था जिसका उदाहरण हैं इस संकलन में शामिल वैचारिक टिप्पणियाँ।
Sab Likhni Kai Likhu Sansara : Padmavat Aur Jayasi Ki Duniya
- Author Name:
Mujeeb Rizvi
- Book Type:

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कम-ओ-बेश पचास साल की मेहनत के बाद तैयार किया गया प्रोफ़ेसर मुजीब रिज़वी का ये शोध ग्रंथ जनता के सामने उस समय आ रहा है जब वो स्वयं इस दुनिया में नहीं रहे। सन् 1950 की दहाई में शुरू किए गए इस ग्रन्थ पर आख़िरकार 1979 में ‘अलीगढ़ यूनिवर्सिटी’ ने डॉक्टरेट की उपाधि दी थी। यह शोध-ग्रन्थ न सिर्फ़ मलिक मुहम्मद जायसी की तमाम रचनाओं का एक मौलिक विश्लेषण पेश करता है, अपितु वो हमें सूफ़ी साहित्य की बहुत-सी मान्यताओं और अभिव्यक्तियों से जायसी के माध्यम से पहली बार परिचित कराता है। मुजीब रिज़वी यह साबित कर देते हैं कि फ़ारसी और सूफ़ी साहित्य के ज्ञान के बिना जायसी को पढ़ना दुष्कर ही नहीं नामुमकिन भी है। जायसी का काव्य-संसार एक बेहतरीन संगम है जिसमें भारतीय काव्य, लोक, साहित्यिक, धार्मिक और भाषाई परिभाषाएँ अरबी-फ़ारसी रिवायतों से इस तरह समागम हैं कि एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
सूफ़ी शब्दों में कहा जाए तो मुजीब रिज़वी ये दर्शाते हैं कि जायसी के रचना-संसार में फ़ारसी और भारतवर्ष की साहित्यिक-धार्मिक रिवायतें एक रूह दो कालिब हैं। निस्सन्देह जायसी की इस उत्कृष्टता को उजागर करने के लिए मुजीब रिज़वी जैसे बहुभाषीय, सहिष्णु और विलक्षण विद्वान की आवश्यकता थी जिसमें भक्ति-भाव, तसव्वुफ और साहित्य का विशिष्ट समागम हो। ये किताब जायसी, सूफ़ी प्रेमाख्यानों, अवधी संस्कृति और साहित्य की तमाम सम्भावनाओं को समेटे हुए उन विषयों पर हमारी समझ पर गहरा असर डालती है।
Chhayavad Aur Uske Kavi
- Author Name:
Vijay Bahadur Singh
- Book Type:

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महान हिन्दी आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की कक्षा में बैठकर जिस एक छात्र ने अपने आचार्य की सीमाओं को आक्रामक शैली में इंगित किया उसका नाम नन्द दुलारे वाजपेयी था। उसी छात्र ने यह भी घोषित किया कि उनकी लिखी हुई पुस्तकें और उनके तैयार किए हुए विद्यार्थी, जिनमें मैं भी एक होने का गर्व करता हूँ, किन्तु मैं उनकी प्रतिध्वनि नहीं हूँ, क्योंकि प्रतिध्वनि कभी मूल ध्वनि की बराबरी नहीं कर सकती। अस्तु, मेरी अपनी ध्वनि है।
यही आलोचक नन्द दुलारे वाजपेयी अपने आचार्य शुक्ल से छायावादी काव्य को लेकर असहमत होकर इस परिभाषा और व्याख्या पर उतर आया कि कविता जिस स्तर पर पहुँचकर अलंकार-विहीन हो जाती है। वहाँ वह वेगवती नदी की भाँति हाहाकार करती हुई हृदय को स्तम्भित कर देती है। उस समय उसके प्रवाह में अलंकार ध्वनि वक्रोक्ति आदि न जाने कहाँ बह जाते हैं और सारे सम्प्रदाय न जाने कैसे मटियामेट हो जाते हैं।'
शुक्ल जी को युग प्रवर्तक आलोचक मानते हुए भी आचार्य वाजपेयी ने उनकी प्रबन्ध काव्य सम्बन्धी अवधारणा के विपरीत यह स्थापित किया कि प्रगीतों में ही कवि का व्यक्तित्व पूरी तरह प्रतिबिम्बित होता है।'
शुक्लोत्तर आलोचना के इस सर्वप्रथम आलोचक आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने हिन्दी में स्वच्छन्दतावादी आलोचना का प्रवर्तन किया। यह पुस्तक इसी का एक जीवन्त दस्तावेज है।विजय बहादुर सिंह
Hindi Kahani : Antarvastu ka shilp
- Author Name:
Rahul Singh
- Book Type:

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स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी के महत्त्वपूर्ण रचनाकारों के बहाने यह किताब कहानी आलोचना के इलाके की एक बड़ी कमी को पूरा करती है। कविता और उपन्यासों को लेकर छिटपुट ढंग से ही सही आलोचना का जैसा एक स्टैंड बनता है, कहानी को लेकर वैसा व्यवस्थित विचार अक्सर सामने नहीं आ पाता है। ऐसे में यह पुस्तक अपने तरीके से आजादी बाद के एक अहम कालखंड के कहानीकारों और उनकी रचनात्मकता के साथ कहानी के सामान्य परिदृश्य का एक दिलचस्प और अर्थवान खाका खींचती है।
वे कहानीकार जिन्होंने अपने कौशल से कहानी की क्षमता को बढ़ाया, अपने समय के सवालों से दो-चार हुए, और जो भारतीय समाज के बहुमुखी बदलाव को सफलतापूर्वक पकड़ सके, ऐसे सभी प्रमुख कथाकार यहाँ चर्चा के केन्द्र में हैं। जनवादी विचार से समृद्ध संजीव और स्वयं प्रकाश हों, भाषा को कलात्मक सूझ से बरतने वाले प्रियंवद और आनन्द हर्षुल हों, कहानी विधा की गहरी समझदारी रखनेवाले लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित रहे अरुण प्रकाश और नवीन सागर हों, दलित स्वानुभव से कहानी को समृद्ध करने वाले ओमप्रकाश वाल्मीकि हों या कहानी के क्षितिज पर परिघटना की तरह प्रकट होने वाले उदय प्रकाश, शिवमूर्ति, अखिलेश और योगेन्द्र आहूजा हों, सभी का एक आस्वादपरक क्रिटीक इस पुस्तक में शामिल है।
इन सभी कथाकारों ने अपने-अपने मोर्चे से मानवीय मूल्यों के पक्ष में लगातार संघर्ष किया, समय को समझने और समझाने के लिए घटनाओं और चरित्रों की एक बड़ी आकाशगंगा रची। निस्सन्देह आने वाले वक्त में उनकी रचनाएँ बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के भारत को समझने में दस्तावेजों की तरह काम आएँगी। प्रखर युवा आलोचक राहुल सिंह ने यहाँ संकलित एक-एक आलेख में प्रयास किया है कि प्रत्येक लेखक की अपनी विशेषताओं के रेखांकन के साथ उनके दौर के सामाजिक-राजनीतिक मिजाज को भी पकड़ा जा सके, और यह वे सफलतापूर्वक कर सके हैं।
Venuvan
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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राष्ट्रकवि दिनकर के इस 'वेणुवन' में लेख भी हैं, निबन्ध भी और काल्पनिक संवाद भी। यह चिन्तन-मनन के अभयारण्य की तरह है जिसका आकर्षण और प्रभाव अन्त तक बना रहता है।
इसमें शामिल हर पाठ अपने रंग में रँगने की क्षमता रखता है। 'अर्धनारीश्वर' में दिनकर नर-नारी को एक द्रव्य की ढली दो प्रतिमाएँ मानते हुए रेखांकित करते हैं कि 'जिस पुरुष में नारीत्व नहीं, वह अधूरा है और जिस नारी में पुरुषत्व नहीं, वह भी अपूर्ण है।' वहीं 'कलाकार की सफलता' में कहते हैं कि कलाकार की सफलता की कसौटी केवल यह हो सकती है कि उसकी कृतियों से समाज आन्दोलित हुआ है या नहीं, और यदि हुआ है तो उसकी रचनाओं से प्रभावित होनेवाला सांस्कृतिक धरातल क्या है? ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ में जन्मभूमि की महत्ता को तुलसीदास, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, इकबाल आदि के जरिए बहुत ही काव्यात्मक तरीके से प्रस्तुत करते हैं। 'कबीर साहब से भेंट' काल्पनिक ही सही, लेकिन दिनकर ने अपने तात्कालीन समस्याओं के मद्देनजर अद्भुत और अविस्मरणीय संवाद को रचा है।
इसी तरह ‘मैथिल कोकिल विद्यापति’, ‘विद्यापति और ब्रजबुलि’, ‘महादेवी जी की वेदना’, ‘साहित्य का नूतन ध्येय’, ‘निर्गुण पन्थ की सामाजिक पृष्ठभूमि', 'बौद्धधर्म की विश्व-व्यापकता', 'आदर्श मानव राम', 'संस्कृति संगम–1, 2', 'शांति की समस्या' पाठों के जरिए दिनकर साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन, स्वतंत्रता आदि के परिप्रेक्ष्य में मूल और मूल्यों से जुड़े कई सवालों से न सिर्फ टकराते हैं, बल्कि किसी न किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की सफल कोशिश भी करते हैं।
कहने की आवश्यकता नहीं कि जिस तरह बुद्ध का वेणुवन उनकी तप-साधना का स्थल था, यह पुस्तक 'वेणुवन' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के चिन्तन का विरल प्रतिफल है।
Nayi Kavita : Vols. 1-3
- Author Name:
Ramswaroop Chaturvedi
- Book Type:

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‘नयी कविता’ वाद-मुक्त धरातल को केन्द्र में मानकर सन् 54 में प्रकाशित हुई। प्रगतिवाद मार्क्सवाद से प्रेरित होकर हिन्दी साहित्य में स्थापित हुआ और प्रयोगवाद वैज्ञानिक चेतना को आधार मानकर अस्तित्व में आया। जबकि ‘नयी कविता’ विशुद्ध काव्य भूमि की नवीनता से उपजी है और 1954 से 67 तक आठ अंक उत्तरोत्तर समृद्ध के साथ प्रकाशित हुए। ‘नयी कविता’ के पहले अंक ने हिन्दी में अपनी क्रान्तिकारी उपस्थिति दर्ज की और विरोध की भूमिका भी स्वाभाविक रूप से प्रखरतर होती गई। किंचित् कविता का विरोधात्मक आशय न समझकर उसे ही विरोध का आधार मान लिया गया।
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविताओं ने मुझे नयी कविता की शक्ति के प्रति आश्वस्त किया और अजित कुमार की चार पंक्तियों की कविता विरोध का प्रतीक बन गई और साथ ही नवीनता का उद्घोष भी।
‘नयी कविता : नयी अभिरुचि’, ‘नयी कविता : सन्तुलन’ और ’नयी कविता : अर्थ की लय’ जैसे सम्पादकीय विचारोत्तेजक सिद्ध हुए। ‘नयी कविता’ के सैद्धान्तिक पक्ष को उजागर करने में मैंने व्यापक सहयोग प्राप्त किया और साहित्य में उसकी मान्यता निर्विवाद प्रमाणित हुई। जो युगान्तर कविता के भीतर घटित हुआ। वह कवियों को निरन्तर प्रेरित करता रहा और आज भी कीर्तिमान के रूप में स्थापित है।
—जगदीश गुप्त
Premchand : Sahityik Vivechan
- Author Name:
Nandulare Vajpeyi
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- Description: महान कथाकार प्रेमचन्द के सम्पूर्ण कथा–साहित्य को उसकी सभी विशेषताओं और विफलताओं के साथ विश्लेषित करने का प्रयास यहाँ लेखक ने किया है। आरम्भ में प्रेमचन्द को हिन्दी कथा–साहित्य की परम्परा में स्थापित करते हुए परवर्ती अध्यायों में उनके सात प्रमुख उपन्यासों का अलग–अलग मूल्यांकन किया गया है। दो परिशिष्टों में प्रेमचन्द सम्बन्धी आचार्य वाजपेयी के फुटकर मन्तव्यों को समेकित किया गया है। साथ ही ‘हंस’ के आत्मकथा विशेषांक से उत्पन्न हुए विवादों से सम्बन्धित पत्र–व्यवहार भी उद्धृत किए गए हैं। पुस्तक के आरम्भ में डॉ. शिवकुमार मिश्र द्वारा प्रेमचन्द सम्बन्धी आचार्य वाजपेयी की मान्यताओं का ऐतिहासिक तथा समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया गया है, जो पुस्तक के इस नए संस्करण को विशेष महत्त्वपूर्ण बनाता है।
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