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Nayi Parampara Ki Khoj

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यह पुस्तक २१ वीं सदी की बदलती हुई सभ्यता , संस्कृति और प्रकृति के द्वन्द्व का आलोचनात्मक रचाव है । इस समयावधि की सामाजिक , राजनीतिक एवं सांस्कृतिक हलचल हिलोरों को जितनी प्रामाणिकता के साथ यहाँ प्रस्तुत किया गया है , वह बहुत महत्त्वपूर्ण और अलग है । इसमें जीवन, समाज, देश और प्रकृति को यथार्थवादी दृष्टि से देखती कविताओं की सूक्ष्म परख है । आज की हिन्दी कविताएँ किस तरह से अपने समय प्रदूषण का प्रतिकार करते हुए मानवता का महाआख्यान रच रही हैं इसे भी इस पुस्तक से समझा जा सकता है । इसमें उदारीकरण , निजीकरण , पूँजीवाद और बाजारवाद के छल - छद्म से बदलते समाज की स्पष्ट छवि देखी जा सकती है । यहाँ निराला , मुक्तिबोध , धूमिल , त्रिलोचन , केदारनाथ सिंह , अरुण कमल , मदन कश्यप आदि की कविताओं के साथ - साथ इक्कीसवीं सदी की दलित, स्त्री और आदिवासी हिन्दी कविता का गहन विवेचन और विश्लेषण प्रस्तुत है ।

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यह पुस्तक २१ वीं सदी की बदलती हुई सभ्यता , संस्कृति और प्रकृति के द्वन्द्व का आलोचनात्मक रचाव है । इस समयावधि की सामाजिक , राजनीतिक एवं सांस्कृतिक हलचल हिलोरों को जितनी प्रामाणिकता के साथ यहाँ प्रस्तुत किया गया है , वह बहुत महत्त्वपूर्ण और अलग है । इसमें जीवन, समाज, देश और प्रकृति को यथार्थवादी दृष्टि से देखती कविताओं की सूक्ष्म परख है । आज की हिन्दी कविताएँ किस तरह से अपने समय प्रदूषण का प्रतिकार करते हुए मानवता का महाआख्यान रच रही हैं इसे भी इस पुस्तक से समझा जा सकता है । इसमें उदारीकरण , निजीकरण , पूँजीवाद और बाजारवाद के छल - छद्म से बदलते समाज की स्पष्ट छवि देखी जा सकती है । यहाँ निराला , मुक्तिबोध , धूमिल , त्रिलोचन , केदारनाथ सिंह , अरुण कमल , मदन कश्यप आदि की कविताओं के साथ - साथ इक्कीसवीं सदी की दलित, स्त्री और आदिवासी हिन्दी कविता का गहन विवेचन और विश्लेषण प्रस्तुत है ।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2021
Weight
306 grams
ISBN-13
9789390625154
Pages
183
Reading time
~6 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21 cm
Language
Hindi

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