Jo Bacha Raha
Author:
Nand ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Available
वरिष्ठ रचनाकार नन्द चतुर्वेदी विविध विधाओं में लिखते रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक संस्मरण और आलोचना के मिश्रण से बने लेखों का संग्रह है। अनेक अनुभवों से समृद्ध इन लेखों में रचनाकारों का मूल्यांकन है, जीवन-शैली का विश्लेषण है, सिद्धान्तों की यात्रा है और सर्वोपरि उस दृष्टि की तलाश है जिसके बिना दिशाएँ विलुप्त हो जाती हैं।</p>
<p>नन्द चतुर्वेदी ने नईम, रजनीकान्त वर्मा, जीवनानन्द दास, लोहिया, मीराँ, हरीश भादानी, गणपतचन्द भंडारी और मदन डागा आदि पर लिखते हुए उनके सकारात्मक पक्षों को सामने रखा है। आलोचनात्मक दृष्टि सक्रिय है...लेकिन तर्कों और तथ्यों को विस्मृत नहीं किया गया है। व्यक्तिगत रिश्ता होते हुए भी लेखकीय तटस्थता लेखों की उल्लेखनीय विशेषता है। वे कई जगह भ्रान्तियों का निवारण भी करते चलते हैं।</p>
<p>इन लेखों के केन्द्र में केवल साहित्यकार नहीं हैं। पत्रकारिता के साथ कुछ ऐसे व्यक्तियों का ज़िक्र भी है जिनमें आदर्शों की झलक दिखाई देती है। मौसाजी, मास्साब रामचन्द्रजी और नेमिचन्द भावुक पर लिखते समय नन्द चतुर्वेदी ने यह ध्यान रखा है। यह कहना ज़रूरी है कि लेखों की भाषा में पर्याप्त पारदर्शिता है, जिससे अर्थ चमक उठता है, जैसे—'पोप और शंकराचार्य शान्ति और सद्भाव की प्रार्थनाओं के बावजूद वास्तविकताओं की बात नहीं करते और न उन व्यवस्थापकों को अपराधी करार देते हैं जो शोषकों के अगुआ हैं। ईश्वर को आगे करने से इस सारी व्यवस्था के अपराधी चरित्र को वैधता हासिल होती है और शोषकों को हैसियत मिल जाती है।’ इन लेखों को पढ़ते हुए ‘संवाद’ की अनुभूति होती है, यह बहुत सुखद है।
ISBN: 9788126726172
Pages: 160
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Shiv Kumar Yadav
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- Description: यह पुस्तक २१ वीं सदी की बदलती हुई सभ्यता , संस्कृति और प्रकृति के द्वन्द्व का आलोचनात्मक रचाव है । इस समयावधि की सामाजिक , राजनीतिक एवं सांस्कृतिक हलचल हिलोरों को जितनी प्रामाणिकता के साथ यहाँ प्रस्तुत किया गया है , वह बहुत महत्त्वपूर्ण और अलग है । इसमें जीवन, समाज, देश और प्रकृति को यथार्थवादी दृष्टि से देखती कविताओं की सूक्ष्म परख है । आज की हिन्दी कविताएँ किस तरह से अपने समय प्रदूषण का प्रतिकार करते हुए मानवता का महाआख्यान रच रही हैं इसे भी इस पुस्तक से समझा जा सकता है । इसमें उदारीकरण , निजीकरण , पूँजीवाद और बाजारवाद के छल - छद्म से बदलते समाज की स्पष्ट छवि देखी जा सकती है । यहाँ निराला , मुक्तिबोध , धूमिल , त्रिलोचन , केदारनाथ सिंह , अरुण कमल , मदन कश्यप आदि की कविताओं के साथ - साथ इक्कीसवीं सदी की दलित, स्त्री और आदिवासी हिन्दी कविता का गहन विवेचन और विश्लेषण प्रस्तुत है ।
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