Agyey Hone Ka Arth : Drishti Ka Vivek
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Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
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Price: ₹ 480
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600
Available
यह किताब अज्ञेय के बहुआयामी सर्जक व्यक्तित्व के साथ कई पीढ़ियों का संवाद है। अज्ञेय हमारे देश की एक ऐसी सांस्कृतिक शख्सियत थे जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व में भारतीयता के अनेक मायने, अन्तर्विरोध और अन्तर्दृष्टियां निहित हैं। अज्ञेय साहित्य की अलग-अलग 'विधाओं की प्रकृति में अन्तर की गहरी समझ रखते थे। इस पुस्तक में संग्रह किये गये तमाम लेखों में अज्ञेय की रचनाशीलता के विविध आयामों के साथ साक्षात्कार न केवल उनके साहित्य के विशेषज्ञों, बल्कि तमाम युवतर लेखकों द्वारा भी किया गया है। अज्ञेय व्यक्तित्व की अनन्यता, अद्वितीयता, मौलिकता को कितना भी महत्त्व क्यों न देते रहे हों, उनका 'व्यक्तित्ववाद' भी प्रबुद्ध बुर्जुवा व्यक्तिवाद था जिसमें लोकतंत्र, आधुनिकता, धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता निहित थी। अज्ञेय के काव्य में सतत निजता की सुरक्षा और अहं से निजात पाने का द्वन्द्व चलता रहता है। अज्ञेय उत्तरोत्तर इतिहास से ज़्यादा सनातनता को महत्त्व देते गए। उन्हें एक मूल, सनातन मनुष्य की तलाश थी, अपने भीतर भी और बाहर भी, जो इतिहास (जैसा कि उसे समझा जाता है) के बाहर ही संभव थी। मुक्ति की तलाश में वे अहं को समाज में घुलाने की राह नहीं अपनाते बल्कि अहं से निष्कृति के लिए वे क्रमशः प्रेम, प्रकृति और तथागत (जापानी बौद्ध चिन्तन की रहस्वादी जेन शाखा का प्रत्यय) तथा गैर-धार्मिक आध्यात्म की दूसरी चिन्तन-पद्धतियों की ओर अग्रसर होते दिखाई देते हैं। मुक्ति उनके लिए सत्य की ही तरह वैयक्तिक है जो उन्हें मौन की साधना, सन्नाटे का छन्द बन जाने की ओर ले जाती है। उनसे वाद-विवाद-संवाद का रिश्ता हर पीढ़ी के साहित्यानुरागी का बना रहेगा।
ISBN: 9789389742527
Pages: 296
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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अस्तित्ववादी चिंतकों ने बताया कि हमारे प्रत्येक सत्य और प्रत्येक कर्म में मानवीय संदर्भ और मानवीय आत्मपरकता निहित होती है तथा राज्यसत्ता, नौकरशाही, राजनीतिक दल—सभी निर्वैयक्तिक शक्तियाँ इस मानवीय आत्मपरकता को प्रतिबंधित करती रहती हैं।
अस्तित्ववाद ने इस बात पर बल दिया कि यथार्थ और अयथार्थ, आवश्यक और अनावश्यक के अंतर को समझने के लिए व्यक्ति और उसकी आत्मपरकता को प्राथमिकता देने से ही उसके चारों ओर फैली विसंगतियों को कम किया जा सकता है।
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासों को आलोचकों ने कुंठा, घुटन और अनगढ़ प्रतीक योजनाओं के कारण अस्तित्ववादी उपन्यास की संज्ञा से अभिहित किया है। हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में इस विषय से संबंधित जो शोध हुए हैं उनमें परीक्षण और जाँच कम, स्थापनाएँ अधिक हुई हैं। अस्तित्ववाद के प्रभाव को मानकर चलनेवाले लोगों ने संभवतः इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि हिंदी साहित्य की विधाओं में जो सिचुएशंस दिखाई पड़ती हैं वह अस्तित्ववाद के प्रभाव के कारण हैं अथवा बदलते हुए परिवेश के कारण।
यह पुस्तक अस्तित्ववादी विचारधारा की मूलचेतना 'अस्तित्व' की महत्त्वपूर्ण प्रवृत्तियों के सैद्धांतिक विवेचन की अपेक्षा उसकी सिचुएंशस (स्थितियों) के आधार पर कुछ महत्त्वपूर्ण हिंदी उपन्यासों की विवेचना का प्रयास है।
Bhakti Aur Sharnagati
- Author Name:
Vishnukant Shastri
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- Description: ‘तुलसिहिं बहुत भलो लागत’, जगजीवन राम ग़ुलाम को तुलसी की यह उक्ति आज के जीवन के कुहासे को काटकर ऊपर उठने की प्रेरणा देती रही है। राम के भक्त के समान मेरा जीवन हो सके, इसके लिए भक्ति और शरणागति को समझना अनिवार्य लगा। यह लेखन उसी समझ को प्रशस्त करने का उपक्रम है। भावुक पाठक इनको पढ़कर ‘भक्ति और शरणागति’ के गम्भीर अनुशीलन में प्रवृत्त होंगे।
Anvaya - Khand : 1
- Author Name:
Kunwar Narain
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Description:
कुँवर नारायण ने लगभग सात दशकों का समृद्ध साहित्यिक जीवन जिया है। वे विश्व के श्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं। उनके रचना-संसार पर समय-समय पर लिखा जाता रहा है तथा अनेक मर्मज्ञ लेखकों, कवियों एवं शोधार्थियों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्य पर कार्य किया है। उन पर अनेक ग्रन्थ लिखे व सम्पादित किए गए हैं और देशी-विदेशी संचयनों में उनकी कविताएँ शामिल हैं। अनेक भाषाओं में उनकी कृतियों के अनुवाद हुए हैं।
उन्होंने अपनी कविता-यात्रा में हमें कई नायाब संग्रह दिए हैं। जहाँ उनकी कविताएँ स्मृति और परम्परा से सम्पन्न हैं, वहीं उनकी कहानियाँ क़िस्सागो के रूप में उनके अलग मिज़ाज की बानगी देती हैं। एक समालोचक और गद्यकार के रूप में उनकी आलोचना, निबन्ध, डायरी, सिने-विवेचन और भेंटवार्ताओं की पुस्तकें साहित्य, कला, जीवन, समाज, राजनीति और संस्कृति पर उनके सारभूत चिन्तन की विरल उदाहरण हैं। विश्व कवियों के उनके अनुवाद काव्यानुवाद कौशल के परिचायक हैं। वे उच्च काव्यादर्श के कवि हैं जिसका पूर्ण परिपाक उनके प्रबन्ध काव्यों में देखने को मिलता है। ऐसे उच्चादर्शों के लिए वे अतीत, इतिहास और मिथक के पास जाते हैं जिनसे रूबरू होते हुए हम अपने समय का एक आधुनिक प्रतिबिम्ब देख पाते हैं। उनकी कविता इसी सदाशयता की कविता है। बिना शोरोगुल के कविता में वह ऐसी शहदीली मिठास पैदा कर देते हैं कि उसे पढ़ते ही सृष्टि से प्यार हो उठे।
कुँवर नारायण जितने अच्छे कवि, आलोचक और चिन्तक हैं, उतने ही अच्छे मनुष्य। उनसे मिलते हुए कभी उनके व्यक्तित्व का आतंक नहीं महसूस होता, अपने व्यक्तित्व की लघुता नहीं महसूस होती। उनके व्यक्तित्व और रचना-संसार पर हमारे समय के सुधी चिन्तकों और साहित्यिकों के आकलन का यह खंड उन पर लिखी गई समालोचना का एक श्रेष्ठ उपहार है। उन पर लिखे आलोचनात्मक निबन्धों का यह चयन दो खंडों में है : ‘अन्वय’ और ‘अन्विति’। ‘अन्वय’ के इस खंड में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर लिखे आलेख समाहित हैं। ‘अन्विति’ उनकी कृतियों को केन्द्र में रखकर लिखे निबन्धों का चयन है। आशा है, कुँवर नारायण के साहित्य और व्यक्तित्व में रुचि रखनेवाले सभी पाठकों के लिए ये दोनों खंड मूल्यवान साबित होंगे।
Samay Aur Sahitya
- Author Name:
Vijay Mohan Singh
- Book Type:

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Description:
हर लेखक अपनी रचनात्मकता, अपनी समझ और अपनी सहमति-असहमति के
माध्यम से अपने समय के साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक प्रवाह में हस्तक्षेप भी करता है।
रचनाकार किसी भी विधा का हो, उसका यह पक्ष अपने दौर में उसकी स्थिति को समझाने-रेखांकित
करने में सहायक होता है।
विजयमोहन सिंह हमारे समय के सजग कथाकार और आलोचक हैं; इस पुस्तक में उनकी उन गद्य
रचनाओं को शामिल किया गया है जो बीच-बीच में उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं और संगोष्ठी-सेमिनारों
आदि के लिए लिखी थीं। इनमें कुछ निबन्ध हैं, कुछ पुस्तक-समीक्षाएँ हैं, कुछ समसामयिक विषयों
पर टिप्पणियाँ हैं; और कुछ श्रद्धांजलियाँ भी। ऐसा करने के पीछे एक उद्देश्य यह भी रहा है कि
सामान्य साहित्यिक संकलनों की तरह यह पुस्तक एकरस न लगे।
विजयमोहन सिंह के वैचारिक लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अतिरिक्त और ओढ़ी हुई
गम्भीरता से पाठक को आतंकित नहीं करते। वे अपना मन्तव्य सहज भाव से व्यक्त करते हैं, लेकिन
बहुत ‘कन्विंसिंग’ ढंग से। बकौल उनके, ‘‘ये अपने समय तथा साहित्य के प्रति प्रतिक्रियाएँ हैं।’’
Tulsi Kavya Mimansa
- Author Name:
Uday Bhanu Singh
- Book Type:

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Description:
तुलसीदास महाकवि थे। काव्यस्रष्टा और जीवनद्रष्टा थे। वे धर्मनिष्ठ समाज-सुधारक थे। अपने साहित्य में उन्होंने समाज का आदर्श प्रस्तुत किया, ऐसा महाकाव्य रचा जो हिन्दी-भाषी जनता का धर्मशास्त्र भी बन गया। तुलसी गगनविहारी कवि नहीं थे, उनकी लोकदृष्टि अलौकिक थी। उन्होंने आदर्श की संकल्पना को यथार्थ जीवन में उतारा। उनके द्वारा रचे गए गौरव-ग्रन्थ हिन्दी साहित्य के रत्न हैं। सौन्दर्य और मंगल का, प्रेय और श्रेय का, कवित्व और दर्शन का असाधारण सामंजस्य उनके साहित्य की महती विशेषता है।
यह तुलसी-साहित्य की विराटता ही है कि उसकी सबसे अधिक टीकाएँ रची गई हैं। सबसे अधिक आलोचना-ग्रन्थ भी तुलसीदास पर ही लिखे गए हैं। सबसे अधिक शोध-प्रबन्धों का प्रणयन भी तुलसी पर ही हुआ है। ‘तुलसी-काव्य-मीमांसा’ भी उसी अटूट शृंखला की एक कड़ी है। इसमें तुलसीदास के दर्शन और काव्य का एक नया विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इसके विवेच्य विषय
हैं : अध्ययन-सामग्री, तुलसीकृत रचनाओं की प्रामाणिकता, तुलसीदास का जीवनचरित, उनकी आत्मकहानी, परिस्थितियों का प्रभाव एवं उनके साहित्य में युग की अभिव्यक्ति, उनके काव्य-सिद्धान्त, काव्य का भावपक्ष अर्थात् प्रतिपाद्य विषय, उनका कलापक्ष और उनके गौरवग्रन्थ, जिनमें यहाँ ‘रामचरितमानस', ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली' तथा ‘कवितावली' को लिया गया है।निस्सन्देह, तुलसीदास के अध्येताओं और जिज्ञासु पाठकों के लिए यह ग्रन्थ उपादेय होगा।
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