Sahaj Sadhna
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Author:
Hazariprasad DwivediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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पिछले पाँच दशकों में शैक्षणिक-विकास की दिशा में काफ़ी कुछ घटित हुआ है। सकारात्मक भी और नकारात्मक भी। जहाँ शिक्षा के प्रति हमारी सामाजिक रुचि में इज़ाफ़ा हुआ है, वहीं यह भी सत्य है कि शिक्षा और शिक्षण-पद्धतियों की गुणवत्ता में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं आया है। साक्षरता का प्रतिशत बढ़ रहा है, लेकिन निरक्षरों की संख्या में भी कोई कमी नहीं आई है। हमारे शिक्षा-तंत्र का ढाँचा आज भी शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक बालक को भविष्य का कोई नक़्शा और एक सुदृढ़ व्यक्तित्व की गारंटी देने में असमर्थ है। जो शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, उनमें उनकी अपनी और स्कूलों की सम्पन्नता-विपन्नता से वर्ग-भेद की खाई भी कम नहीं हो पा रही है और जो शिक्षा के क्षेत्र से बाहर हैं, उन्हें इस तरफ़ आकर्षित करने के लिए जिस लगन, कर्मठता और संवेदनशीलता की आवश्यकता है, वह भी कहीं देखने में नहीं आती—न सरकारी प्रयासों में और न व्यक्तिगत या संस्थागत स्तर पर। इस पुस्तक में समाहित आलेखों की प्रमुख चिन्ता यही है।</p> <p>लेखकद्वय ने प्राथमिक शिक्षा को अपने चिन्तन का केन्द्रीय बिन्दु बनाते हुए शिक्षा के पूरे परिदृश्य को समझने और विश्लेषित करने का प्रयास किया है। इन आलेखों के सम्बन्ध में सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इनकी रचना शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक स्तर पर काम करते हुए हुई; विभिन्न शिक्षाविदों, शिक्षकों तथा दूसरे सहयोगियों के साथ काम करते हुए जो अनुभव और सबक़ हासिल हुए, लेखकद्वय ने उन्हीं को इन आलेखों में पिरोने की कोशिश की है।
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पिछले पाँच दशकों में शैक्षणिक-विकास की दिशा में काफ़ी कुछ घटित हुआ है। सकारात्मक भी और नकारात्मक भी। जहाँ शिक्षा के प्रति हमारी सामाजिक रुचि में इज़ाफ़ा हुआ है, वहीं यह भी सत्य है कि शिक्षा और शिक्षण-पद्धतियों की गुणवत्ता में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं आया है। साक्षरता का प्रतिशत बढ़ रहा है, लेकिन निरक्षरों की संख्या में भी कोई कमी नहीं आई है। हमारे शिक्षा-तंत्र का ढाँचा आज भी शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक बालक को भविष्य का कोई नक़्शा और एक सुदृढ़ व्यक्तित्व की गारंटी देने में असमर्थ है। जो शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, उनमें उनकी अपनी और स्कूलों की सम्पन्नता-विपन्नता से वर्ग-भेद की खाई भी कम नहीं हो पा रही है और जो शिक्षा के क्षेत्र से बाहर हैं, उन्हें इस तरफ़ आकर्षित करने के लिए जिस लगन, कर्मठता और संवेदनशीलता की आवश्यकता है, वह भी कहीं देखने में नहीं आती—न सरकारी प्रयासों में और न व्यक्तिगत या संस्थागत स्तर पर। इस पुस्तक में समाहित आलेखों की प्रमुख चिन्ता यही है।</p>
<p>लेखकद्वय ने प्राथमिक शिक्षा को अपने चिन्तन का केन्द्रीय बिन्दु बनाते हुए शिक्षा के पूरे परिदृश्य को समझने और विश्लेषित करने का प्रयास किया है। इन आलेखों के सम्बन्ध में सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इनकी रचना शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक स्तर पर काम करते हुए हुई; विभिन्न शिक्षाविदों, शिक्षकों तथा दूसरे सहयोगियों के साथ काम करते हुए जो अनुभव और सबक़ हासिल हुए, लेखकद्वय ने उन्हीं को इन आलेखों में पिरोने की कोशिश की है।
Book Details
-
ISBN9789360866211
-
Pages130
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी साहित्येतिहास के उद्भट विद्वान् थे, चार चर्चित उपन्यासों और अनेक निबन्धों की रचना करके उन्होंने स्वयं को एक संवेदनशील रचनाकार के रूप में भी सिद्ध किया, इसके साथ ही भाषा-व्यवहार और विज्ञान पर भी उन्होंने बराबर कार्य किया जिसका प्रमाण यह ग्रन्थ है। आचार्य द्विवेदी का अभी तक अप्रकाशित यह ग्रन्थ व्याकरण पर उनकी एक दीर्घ कार्य-योजना का हिस्सा है। उनकी यह अध्ययन-परियोजना चार खंडों में पूरी हुई थी, लेकिन दुर्भाग्यवश इस खंड के अलावा बाकी तीन खंड फ़िलहाल उपलब्ध नहीं हैं जिनकी खोज जारी है। इस ग्रन्थ में आचार्य द्विवेदी ने संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण की सोदाहरण व्याख्या करते हुए उनका वर्गीकरण किया है। विभिन्न कालखंडों के कवियों-रचनाकारों द्वारा किए गए प्रयोगों को उद्धृत करते हुए उन्होंने इस ग्रन्थ में सम्बन्धित विषय को अत्यन्त ग्राह्य शैली में प्रस्तुत किया है। शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और जिज्ञासु पाठकों के लिए एक आवश्यक ग्रन्थ।
Charu Chandralekh
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
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चारु चन्द्रलेख आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की कलम से निकली हुई एक गहन संवेद्य कृति है। इसमें 12वीं-13वीं सदी के भारत का व्यक्ति और समाज बारीकी से व्यक्त हुआ है।
समय के उस दौर में देश के लिए विदेशी आक्रमण का प्रतिरोध एक बड़ी चुनौती का दायित्व था लेकिन देश की समूची आध्यात्मिक तथा इतर शक्तियाँ पुरातन अन्धविश्वास के रास्ते नष्ट हो रही थीं। ऐसे में समाज के पुनर्गठन का काम पूरी तरह से उपेक्षित था और नए मूल्यों के सृजन की जरूरत की अनदेखी हो रही थी।
Anamdas ka Potha
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उन विरल रचनाकारों में थे, जिनकी कृतियाँ उनके जीवन-काल में ही क्लासिक बन गईं। अपनी जन्मजात प्रतिभा के साथ उन्होंने शास्त्रों का अनुशीलन और जीवन को सम्पूर्ण भाव से जीने की साधना करके वह पारदर्शी दृष्टि प्राप्त की, जो किसी कथा को आर्ष-वाणी की प्रतिष्ठा देने में समर्थ होती है। ‘अनामदास का पोथा’ अथ रैक्व-आख्यान आचार्य द्विवेदी की आर्ष-वाणी का अपूर्व उद्घोष है। संसार के दु:ख-दैन्य ने राजपुत्र गौतम को गृहत्यागी, विरक्त बनाया था, लेकिन तापस कुमार रैक्व को यही दु:ख-दैन्य विरक्ति से संसक्ति की ओर प्रवृत्त करते हैं। समाधि उनसे सध नहीं पाती, और वे उद्विग्न की भाँति उठकर कहते हैं : ‘‘माँ, आज समाधि नहीं लग पा रही है। आँखों के सामने केवल भूखे-नंगे बच्चे और कातर दृष्टिवाली माताएँ दिख रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, माँ?’’ और माँ रैक्व को बताती हैं : ‘‘अकेले में आत्माराम या प्राणाराम होना भी एक प्रकार का स्वार्थ ही है।’’ यही वह वाक्य है जो रैक्व की जीवन-धारा बदल देता है और वे समाधि छोडक़र कूद पड़ते हैं जीवन-संग्राम में। ‘अनामदास का पोथा’ अथ रैक्व-आख्यान जिजीविषा की कहानी है। ‘‘जिजीविषा है तो जीवन रहेगा, जीवन रहेगा तो अनन्त सम्भावनाएँ भी रहेंगी। वे जो बच्चे हैं, किसी की टाँग सूख गई है, किसी का पेट फूल गया है, किसी की आँख सूज गई है—ये जी जाएँ तो इनमें बड़े-बड़े ज्ञानी और उद्यमी बनने की सम्भावना है।’’ तापस कुमार रैक्व उन्हीं सम्भावनाओं को उजागर करने के लिए व्याकुल हैं, और उसके लिए वे विरक्ति का नहीं, प्रवृत्ति का मार्ग अपनाते हैं।
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