Kavita Aur Shuddha Kavita
(0)
Author:
Ramdhari Singh DinkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
350
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Unavailable
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‘कविता और शुद्ध कविता’ ‘दिनकर’ के साहित्यिक निबन्धों का ही संग्रह नहीं है, बल्कि इसके सभी निबन्ध एक ही ग्रन्थ के विभिन्न अध्याय हैं और वे विभिन्न दिशाओं से एक ही विषय पर प्रकाश डालते हैं।</p> <p>पुस्तक हमें बताती है कि कविता की चर्चा केवल कविता की चर्चा नहीं है, वह समस्त जीवन की चर्चा है। ईश्वर, कविता और क्रान्ति—इन्हें जीवन के समुच्चय में प्रवेश किए बिना नहीं समझा जा सकता। कविता अगर यह व्रत ले ले कि वह केवल शुद्ध होकर जिएगी, तो उस व्रत का प्रभाव कविता के अर्थ पर भी पड़ेगा, कवि की सामाजिक स्थिति पर भी पड़ेगा, साहित्य के प्रयोजन पर भी पड़ेगा।</p> <p>नई कविता का आन्दोलन यूरोप में वर्षों से चल रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि वह अब भी पुराना नहीं पड़ा है। उसके भीतर से बराबर नए आयाम प्रकट होते जा रहे हैं। रोमांटिक युग तक कविता किसी निश्चित चौखटे में जड़ी देखी जा सकती थी; किन्तु उसके बाद से वह दिनों-दिन हर प्रकार के चौखटे से घृणा करती आई है। आज अन्तरराष्ट्रीय काव्य जहाँ खड़ा है, वहाँ केवल आसमान ही आसमान है, कहीं कोई क्षितिज दिखाई नहीं देता। इसीलिए पुराने आलोचकों को नई कविता को छूने में अप्रियता और कुछ संकोच का भी अनुभव होता है।</p> <p>नए कलेवर में प्रस्तुत यह पुस्तक सभी कविता-प्रेमियों के लिए एक सुखद अनुभव लेकर आएगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
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‘कविता और शुद्ध कविता’ ‘दिनकर’ के साहित्यिक निबन्धों का ही संग्रह नहीं है, बल्कि इसके सभी निबन्ध एक ही ग्रन्थ के विभिन्न अध्याय हैं और वे विभिन्न दिशाओं से एक ही विषय पर प्रकाश डालते हैं।</p>
<p>पुस्तक हमें बताती है कि कविता की चर्चा केवल कविता की चर्चा नहीं है, वह समस्त जीवन की चर्चा है। ईश्वर, कविता और क्रान्ति—इन्हें जीवन के समुच्चय में प्रवेश किए बिना नहीं समझा जा सकता। कविता अगर यह व्रत ले ले कि वह केवल शुद्ध होकर जिएगी, तो उस व्रत का प्रभाव कविता के अर्थ पर भी पड़ेगा, कवि की सामाजिक स्थिति पर भी पड़ेगा, साहित्य के प्रयोजन पर भी पड़ेगा।</p>
<p>नई कविता का आन्दोलन यूरोप में वर्षों से चल रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि वह अब भी पुराना नहीं पड़ा है। उसके भीतर से बराबर नए आयाम प्रकट होते जा रहे हैं। रोमांटिक युग तक कविता किसी निश्चित चौखटे में जड़ी देखी जा सकती थी; किन्तु उसके बाद से वह दिनों-दिन हर प्रकार के चौखटे से घृणा करती आई है। आज अन्तरराष्ट्रीय काव्य जहाँ खड़ा है, वहाँ केवल आसमान ही आसमान है, कहीं कोई क्षितिज दिखाई नहीं देता। इसीलिए पुराने आलोचकों को नई कविता को छूने में अप्रियता और कुछ संकोच का भी अनुभव होता है।</p>
<p>नए कलेवर में प्रस्तुत यह पुस्तक सभी कविता-प्रेमियों के लिए एक सुखद अनुभव लेकर आएगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Book Details
-
ISBN9788180313257
-
Pages271
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सम्पूर्ण भक्ति कविता को एक ही आँख से देखने और एक ही तराजू में तौलनेवालों की भारी भीड़ है। इस भीड़ के सदस्य भक्ति कविता के प्रगतिशील तत्त्वों और यथास्थितिवादी तत्त्वों को अलगाने का विरोध करते हैं। ऐसे लोग यह देखने में असमर्थ हैं कि भक्ति कविता के क्रान्तिकारी तत्त्वों का विरोध करनेवाली सामाजिक शक्तियों की संख्या बहुत बड़ी है।
मुक्तिबोध संगी नामवर सिंह इस पूरी राजनीति के गुब्बारे में सुई चुभोते हैं और भक्ति कविता की दूसरी परम्परा के पक्ष में प्रभावी ढंग से खड़े होते हैं।
बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक और इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने भक्ति, भक्ति आन्दोलन और कबीर पर पुनः-पुनः विचार किया। वे बताते हैं कि भक्ति आन्दोलन के साथ ही आधुनिक भाषाओं ने पहली बार साहित्यिक जीवन प्राप्त किया। भक्ति ने कविता की भाषा को क्रान्तिकारी ढंग से बदला। भक्ति-कविता ने काव्यभाषा का जनतांत्रीकरण ही नहीं किया, उसे रचनात्मक नवाचारों से गूँथ दिया।
कबीर की क्रान्तिकारी विरासत को अक्सर आधुनिक यथास्थितिवादियों व सुधारवादियों ने एक खास तरह से संकुचित किया। हिन्दू-मुसलमान एकता का लक्ष्य रखनेवाले विचारकों और नेताओं ने एक खास तरह से उन्हें समन्वयवाद में सीमित करने की कोशिश की। नामवर जी कबीर के रास्ते को अन्य मार्गों से अलग निरूपित करते हुए कबीर की क्रान्तिकारिता को इस प्रकरण में भी पुनः स्थापित करने की कोशिश करते हैं।
आधुनिक साम्प्रदायिकता के विकास ने भक्ति कविता की प्रासंगिकता में एक नया आयाम जोड़ा है और उसके मानवीय आदर्शों के मूल्य को कई गुना बढ़ा दिया है। इस संदर्भ में भी नामवर जी के भक्ति-कविता संबंधी विचारों को वापस देखने की जरूरत है।
इस पुस्तक में उनके भक्ति कविता और कबीर सम्बन्धी आलेखों, व्याख्यानों और साक्षात्कार-अंशों को संकलित किया गया है।
Soordas 'Harbans Lal Sharma'
- Author Name:
Harbans Lal Sharma
- Book Type:

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यदि युग-सापेक्ष दृष्टि से तात्कालिक समाज को केन्द्र-बिन्दु बनाकर सूर-साहित्य का आकलन किया जाए तो स्पष्ट लक्षित होगा कि सूर ने बाह्य प्रपंच से मुक्त होकर अन्तर्लीन दशा में काव्य-सृष्टि की थी, किन्तु इसका यह अर्थ न समझ लिया जाए कि युग की सापेक्षता से सूर और उनका साहित्य सर्वथा बचा रहा। सूर ने भक्ति को माधुर्य-मंडित करके प्रस्तुत करने का ध्येय बनाया हुआ था। यही उस युग की सबसे बड़ी माँग थी।
चैतन्य के शिष्य रूप और सनातन गोस्वामी ने शास्त्रीय मर्यादा में देववाणी द्वारा भक्ति का माधुर्य पक्ष स्थिर किया था; किन्तु जनमानस से उसका सीधा लगाव न उस युग में हुआ और न बाद में ही वह सम्भव हो सका।
हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और आचार्यों ने समय-समय पर सूरदास के साहित्य और उनके साहित्येतर पहलुओं पर जो चिन्तन-मनन किया है, उसका एक प्रतिनिधि संकलन यहाँ पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है। सूर-साहित्य के जिज्ञासुओं, पाठकों और हिन्दी साहित्य के सभी छात्रों के लिए विचार-कोश की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली पुस्तक।
Kavi Aur Kavita
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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‘कवि और कविता’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के छब्बीस विचारोत्तेजक निबन्धों का पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय संकलन है।
इस संग्रह में ‘मैथिल कोकिल विद्यापति’, ‘विद्यापति और ब्रजबुलि’, ‘कबीर साहब से भेंट’, ‘गुप्त जी : कवि के रूप में’, ‘महादेवी जी की वेदना’, ‘कविवर मधुर’, ‘रवीन्द्र-जयन्ती के दिन’, ‘कला के अर्धनारीश्वर’, ‘महर्षि अरविन्द की साहित्य-साधना’, ‘रजत और आलोक की कविता’, ‘मराठी के कवि केशवसुत और समकालीन हिन्दी कविता’, ‘शेक्सपियर’, ‘इलियट का हिन्दी अनुवाद’ जैसे शाश्वत विषयों के अलावा ‘कविता में परिवेश और मूल्य’, ‘कविता’, ‘राजनीति और विज्ञान’, ‘युद्ध और कविता’, ‘कविता का भविष्य’, ‘महाकाव्य की वेला’, ‘हिन्दी-साहित्य में निगम-धारा’, ‘निर्गुण पंथ की सामाजिक पृष्ठभूमि’, ‘सगुणोपासना’, ‘हिन्दी कविता में एकता का प्रवाह’, ‘सर्वभाषा कवि-सम्मेलन’, ‘नई कविता के उत्थान की रेखाएँ’, ‘चार काव्य-संग्रह’, ‘डोगरी की कविताएँ’ जैसे ज्वलन्त प्रश्नों पर राष्ट्रकवि दिनकर का मौलिक चिन्तन शामिल है, जो आज भी उतना ही सार्थक और उपादेय है।
सरल-सुबोध भाषा-शैली तथा नए कलेवर में सजाई, सँवारी गई कविवर-विचारक दिनकर की यह एक अनुपम कृति है।
Nirgun Santon Ke Swapana
- Author Name:
David N. Lorenzen
- Book Type:

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साहित्यिक बिरादरी से बाहर निकलकर व्यापक भारतीय समाज को देखें तो कबीर, तुकाराम, तुलसी, मीरा, अखा, नरसी मेहता आज भी समकालीन हैं। भक्त कवि हिन्दी समाज के रोज़मर्रा के जीवन में किसी भी अन्य कवि से अधिक उपस्थित हैं। ‘निरक्षर’ हिन्दीभाषी भी कबीर के चार-छह दोहों और तुलसी की दो-चार चौपाइयों से तो वाक़िफ़ हैं ही। हिन्दी समाज नियतिबद्ध है—भक्त कवियों से सतत संवाद करने के लिए। सवाल यह है कि क्या हिन्दी की समकालीन साहित्यिक चिन्ताओं में यह नियति प्रतिबिम्बित होती है?
भारत और अन्य समाजों की देशज आधुनिकता और उसमें औपनिवेशिक आधुनिकता द्वारा उत्पन्न किए गए व्यवधान को समझना अतीत, वर्तमान और भविष्य का सच्चा बोध प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है। साहित्य को इतिहास-लेखन का स्रोत मात्र (सो भी दूसरे दर्जे का!) और किसी विचारधारात्मक प्रस्ताव का भोंपू मानकर नहीं, बल्कि उसकी स्वायत्तता का सम्मान करते हुए पढ़ने की पद्धति पर चलते हुए भक्ति-काव्य को पढ़ें तो कैसे नतीजे हासिल होते हैं?
भक्ति साहित्य के विख्यात अध्येता पुरुषोत्तम अग्रवाल के सम्पादन में नियोजित ‘भक्ति मीमांसा’ पुस्तक-शृंखला ऐसी ही पढ़त की दिशा में एक कोशिश है। विभिन्न भक्त कवियों, रचनाओं और प्रवृत्तियों के अध्ययन इसमें प्रकाशित किए जाएँगे।
इस शृंखला की यह पहली पुस्तक अग्रणी इतिहासकार डेविड लॉरेंजन के निबन्धों का संकलन है। पिछले दो दशकों में प्रकाशित इन शोध-निबन्धों में ‘निर्गुण सन्तों के स्वप्न’ और उनकी परिणतियों के अनेक पहलू अत्यन्त विचारोत्तेजक और प्रमाणपुष्ट ढंग से पाठक के सामने आते हैं। ‘गोरखनाथ और कबीर की धार्मिक अस्मिता’ निबन्ध अंग्रेज़ी में प्रकाशित होने के पहले ही इस संकलन के ज़रिए हिन्दी पाठकों के सामने आ रहा है। डेविड लॉरेंजन द्वारा प्रस्तावित ‘जाति-निरपेक्ष’ या अवर्णाश्रमधर्मी’ हिन्दी परम्परा की अवधारणा से गुज़रते हुए, पाठक को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह का ‘लोकधर्म’ विषयक विचार-विमर्श स्वाभाविक रूप से याद आएगा।
कबीरपंथ के सांस्कृतिक इतिहास और स्वरूप में निहित सामाजिक प्रतिरोध का विवेचन करते हुए डेविड कबीरपंथ के सामाजिक आधार की व्यापकता रेखांकित करते हैं। वे बताते हैं कि कबीरपंथी ‘भगत’ कबीरपंथ को आदिवासी समुदायों तक भी ले गए; और इस तरह उन्होंने ब्राह्मण वर्चस्व से स्वायत्त समुदाय की रचना में योगदान किया।
इन निबन्धों में निहित अन्तर्दृष्टियों से निर्गुणपंथी परम्परा के बारे में ही नहीं, भारतीय इतिहास मात्र के बारे में भी आगे शोध के लिए प्रस्थानबिन्दु प्राप्त होते हैं।
Main Aryaputra Hoon
- Author Name:
Manoj Singh
- Book Type:

- Description: ‘‘हे आर्य! कोई बाहरी आक्रमणकारी जब किसी अन्य देश में प्रवेश करता है तो बाहर से भीतर आता है या भीतर से बाहर जाता है?’’ ‘‘यह कैसा प्रश्न हुआ, आर्या! स्वाभाविक रूप से बाहर से भीतर आता है।’’ ‘‘और इसी स्वाभाविक तर्क के आधार पर ही मैं भी एक प्रश्न पूछना चाहूँगी। अगर यह मान लिया जाए कि हम आर्य बाहर से आए थे तो पश्चिम दिशा से प्रवेश करने पर सर्वप्रथम सिंधु के तट पर बसना चाहिए था और फिर पूरब दिशा की ओर बढ़ना चाहिए था। लेकिन वेद और पुरातत्त्व के प्रमाण कहते हैं कि हम आर्य पहले सरस्वती के तट पर बसे थे, फिर सिंधु की ओर बढ़े। यही नहीं, सरस्वती काल से भी पहले हम आर्यों का इतिहास विश्व की प्राचीनतम नगरी शिव की काशी और मनु की अयोध्या से संबंधित रहा है। और ये दोनों नगर भारत भूखंड के भीतर सरस्वती नदी की पूरब दिशा में हैं अर्थात् हम आर्य पूरब से पश्चिम दिशा की ओर बढ़े थे।...तो फिर ये कैसे बाहरी (?) आर्य थे जो भीतर से बाहर (!!) की ओर बढ़े थे।...झूठ के पाँव नहीं होते हैं आर्य, ये झूठे इतिहासकार आपके प्रामाणिक प्रश्नों के उत्तर क्या ही देंगे, जब ये मेरे इस सरल तर्क और सामान्य तथ्य पर बात नहीं कर सकते।’’ ‘‘असाधारण तर्क आर्या!’’
Sahitya Ki Pahachan
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

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नामवर सिंह का आलोचक समाज में बातचीत करते हुए, वाद-विवाद-संवाद करते, प्रश्न-प्रतिप्रश्न करते सक्रिय रहता है और विचार, तर्क और संवाद की उस प्रक्रिया से गुज़रता है जो आलोचना की बुनियादी भूमि है। आलोचना लिखित हो या वाचिक—उसके पीछे बुनियादी प्रक्रिया है पढ़ना, विवेचना, विचारना। तर्क और संवाद। नामवर जी के व्याख्यानों और उनकी वाचिक टिप्पणियों में इसका व्यापक समावेश है। उनकी वाचिक आलोचना मूल्यांकन की ऊपरी सीढ़ी तक पहुँचती है। निकष बनाती है। प्रतिमानों पर बहस करती है। उसमें ‘लिखित’ की तरह की ‘कौंध’ मौजूद होती है।
‘साहित्य की पहचान’ मुख्यतः कविता और कहानी केन्द्रित व्याख्यानों और वाचिक टीपों का संग्रह है। व्याख्यान ज़्यादा हैं, वाचिक टीपें कम। इनमें भी कविता से जुड़े व्याख्यान संख्या की दृष्टि से अधिक हैं।
पहले खंड में कविता केन्द्रित व्याख्यान हैं। ज़्यादातर व्याख्यान आधुनिक कवियों पर केन्द्रित हैं। निराला पर तीन स्वतंत्र व्याख्यान इस पुस्तक की उपलब्धि कहे जा सकते हैं। तीनों ही निराला की उत्तरवर्ती कविताओं पर केन्द्रित हैं और प्रायः इन पर एक नए कोण से विचार किया गया है। तीनों व्याख्यानों में एक आन्तरिक एकता है। सुमित्रानन्दन पन्त और महादेवी पर केन्द्रित व्याख्यानों से भी इनकी एक संगति बैठती है। ‘स्वच्छन्दतावाद और छायावाद’ तथा ‘रोमांटिक बनाम आधुनिक’ शीर्षक व्याख्यान इन पाँच व्याख्यानों की वैचारिक भूमि स्पष्ट करते हैं। हरिवंश राय बच्चन, दिनकर, भारतभूषण अग्रवाल पर केन्द्रित छोटे व्याख्यान यहाँ संकलित हैं। समकालीन कविता के अनेक महत्त्वपूर्ण पक्षों को ‘इधर की कविता’ व्याख्यान में नामवर जी पहचानते और व्याख्यायित करते हैं।
दूसरे खंड में उपन्यास और कहानी पर केन्द्रित अनेक व्याख्यान और वाचिक टिप्पणियाँ हैं। हिन्दी में कहानी के विश्लेषण की प्रविधियों का पहला महत्त्वपूर्ण आविष्कार करनेवाली पुस्तक ‘कहानी नयी कहानी’ के लेखक नामवर सिंह की समकालीन कहानी से सम्बन्धित अनेक चिन्ताएँ यहाँ मुखरित हैं।
Kavita Ka Prati Sansar
- Author Name:
Nirmala Jain
- Book Type:

- Description: रचना, आलोचना का अनिवार्य संदर्भ भी होती हैं और उसके लिए चुनौती भी । दोनो के बीच सम्बन्ध स्थित्यात्मक न होकर गत्यात्मक होता है । पूर्ववर्ती और सहवर्ती साहित्य प्रतिमानों के निर्धारण के लिए आलोचना को आमंत्रित करता है और अनुवर्ती साहित्य अक्सर पूर्वनिर्मित प्रतिमानों की अपर्याप्तता का बोध जगाता है । हर महत्वपूर्ण रचना मूल्यांकन के प्रतिमानों की उपलब्ध व्यवस्था के बीच से अपने लिए प्रासंगिक प्रतिमानों की तलाश ही नहीं कर लेती, बल्कि नए प्रतिमानों के लिए आधार भी प्रस्ता- वित करती है । प्रतिमानों के सस र में शाश्वत कुछ नहीं होता । इस वास्तविकता का अहसास आलो- चना को परमुखापेक्षी होने से बचाता है । 'कविता का प्रति संसार' रचनात्मक साहित्य वो संदर्भ की अनिवार्यता के अहसास से प्रेरित ऐसे ही आलोचनात्मक लेखों का सग्रह है । 'समय-समय' पर लिखे गए इन लेखों में निर्मला जैन ने गहरे सरो- कार के साथ प्रखर शैली में प्रतिमानों का प्रश्न भी उठाया हए और रचनाओं का विश्लेषण भी किया हैं । इन लेखों में वे मुद्दे उठाए गए हैं जो प्रतिमानों कं संदर्भ में अक्सर सामने आते हैं । साथ ही आधु- निक हिंदी कविता की विशिष्ट उपलब्धियों को सर्वथा मौलिक दृष्टि से देखा-परखा गया है । इस संकलन का प्रमुख आकर्षण विषय का विस्तार और प्रतिमानों की विविधता है । यह पुस्तक रचना और आलोचना की सही पहचान कराती है ।
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