Aadhunik Hindi Upanyaas : Vol. 1
Author:
Bhisham SahniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 796
₹
995
Available
प्रेमचन्द ने पहली बार इस सत्य को पहचाना कि उपन्यास सोद्देश्य होने चाहिए अर्थात् उपन्यास या कोई भी साहित्यिक विधा मनोरंजन के लिए नहीं होती वरन् वह मानव-जीवन को शक्ति और सुन्दरता प्रदान करनेवाली सोद्देश्य रचना होती है।</p>
<p>प्रेमचन्द में यथार्थ के जिन दो आयामों (सामाजिक और मनोवैज्ञानिक) का उद्घाटन हुआ, वे प्रेमचन्द के बाद अलग-अलग धाराओं में बँटकर तथा अपनी-अपनी धारा की अन्य अनेक सूक्ष्म बातों में संश्लिष्ट होकर बहुत तीव्र और विशिष्ट रूप में विकसित होते गए। एक ओर मनोविज्ञान की धारा बही, दूसरी ओर समाजवाद की।</p>
<p>प्रेमचन्दोत्तर सामाजिक उपन्यासों में मार्क्सवाद का स्वर प्रधान न भी रहा हो, किन्तु उसका प्रभाव निश्चय ही अन्तर्निहित रहा है। उसके प्रभाव के कारण ही निर्मम भाव से सामाजिक विसंगतियों को उद्घाटित किया गया। आंचलिक उपन्यासों की भी जन-चेतना उन्हें प्रेमचन्द से जोड़ती है, किन्तु अपने स्वरूप और दृष्टि में ये बहुत भिन्न हैं। इन्हें उपन्यास की एक नई विधा के रूप में ही स्वीकारना चाहिए।</p>
<p>यह आकस्मिक नहीं है कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद उपन्यास तो बहुत सारे लिखे गए किन्तु उपलब्धि के शिखरों को वे ही छू सके जो सामाजिक जीवन के अनुभवों के प्रति समर्पित रहे, जिनकी दृष्टि की आधुनिकता एक मुद्रा या तेवर की तरह टँगी नहीं रही, बल्कि सघन जीवन-यथार्थ के अनुभवों के बीच एक रचनात्मक शक्ति बनकर व्याप्त रही।</p>
<p>'आधुनिक हिन्दी उपन्यास' के सफ़र पर केन्द्रित यह पुस्तक 'गोदान' से लेकर आठवें दशक तक के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों तक आती है। उल्लेखनीय है कि चालीस से अधिक जो उपन्यास इस चर्चा के केन्द्र में हैं; उनमें से अधिकांश हिन्दी के 'क्लासिक्स' के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यह पुस्तक केवल समीक्षा-संकलन नहीं है; सन्दर्भित उपन्यासों के रचनाकारों के आत्मकथ्य इसे एक रचनात्मक आयाम भी देते हैं जिनसे हमें इन उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया का पता चलता है।
ISBN: 9788126718641
Pages: 49
Avg Reading Time: 2 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ नामक निबन्ध में कहते हैं - ‘‘लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने में ब्रह्म की आनंद-कला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचण्डता में भी गहरी आद्रता साथ लगी रहती है---यदि किसी ओर उन्मुख ज्वलंत रोष है तो दूसरी ओर करुण दृष्टि फैली दिखायी पड़ती है। यदि किसी ओर ध्वंस और हाहाकार है तो और सब ओर उसका सहगामी रक्षा और कल्याण है।’’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ के उपरोक्त कथन के आधार पर यह तथ्य, सत्य हो जाते हैं कि काव्य को रसनीय मात्र वे भाव ही नहीं बनाते हैं, जो मधुर और कोमल होते हैं। ध्वंस और अत्याचार के वातावरण में प्रतिकार का जो स्वर मुखर होता है, उसकी गति करुणा से उत्पन्न होकर रक्षा और कल्याण की ओर जाती है, जिसके भीतर प्राणी की हर क्रिया, प्रतिक्रिया या अनुक्रिया अधर्म के प्रति असहमति की ऊर्जा बनकर आक्रोश का रूप धारण करती है। आहत मन के भीतर जब ‘आक्रोश’ स्थायित्व ग्रहण करता है तो इस स्थायी भाव का अनुभावन ‘विरोध’ के रूप में सामने आता है। ‘विरोध’ को एक नये रस के रूप में प्रस्तुत करना माना एक नये अनुभव से गुजरना है। लेकिन यह कार्य अटपटा या अतार्किक इसलिए नहीं है क्योंकि ‘‘केवल परम्परागत स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त हो सकते हों, ऐसी बात नहीं है, तथाकथित संचारी भी रसत्व को प्राप्त हो सकते हैं। रुद्रट, उद्भट, आनंदवर्धन आदि अनेक आचार्यों ने इस बात को स्वीकार किया था। आचार्य भोज ने एक और कदम आगे बढ़ाया और कहा कि उनचास भावों के अतिरिक्त भी जो कुछ रसनीय है या बनने की सामर्थ्य रखता है, उसे रस कहा जा सकता है। इसी आधार पर उन्होंने रसों की संख्या का विस्तार भी किया।’’ [रस-सिद्धांत , डा.ऋषि कुमार चतुर्वेदी, पृष्ठ 119-120] अस्तु! नये काव्यरस ‘विरोध’ का रस-रूप वर्तमान यथार्थोंन्मुखी काव्य में अनेक रूप व प्रकारों में दृष्टिगोचर होता है।
Kavita Ka Janpad
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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Description:
इस संचयन में कविता के समाज के साथ अन्तर्सम्बन्ध, उसका आत्म-संघर्ष, अमानवीयीकरण, मध्यवर्गीय चेतना, एशियाई अस्मिता, शब्दप्रयोग, बिम्ब आदि पर विचार है। इसके अतिरिक्त अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध, त्रिलोचन, कुँवर नारायण, विजय देव नारायण साही, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, धूमिल, कमलेश और विनोद कुमार शुक्ल की कविता का विश्लेषण है।
हमारा विश्वास है कि यह सामग्री और इसके लेखक पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में जो गम्भीर और विचारोत्तेजक हुआ है, उसमें शामिल हैं। उनके माध्यम से हमारी कविता की समझ और कवियों के संघर्ष की हमारी पहचान और परख गहरी होती है। हम उन अकारथ हो रहे पदों और अवधारणाओं से मुक्त होकर, जिनसे आज की ज़्यादातर आलोचना ग्रस्त है, नई ताज़गी और विचारोत्तेजना से अपने समय की मूल्यवान कविता, उसकी अपने समाज में जगह और शब्द के विराट् अवमूल्यन के इस क्रूर समय में कविता की भाषा के अनेकार्थी और बहु-स्तरीय जीवट और संघर्ष को समझ सकते हैं। यह आलोचना कविता के साथ है...उससे युगपत है। जैसे हमारी कविता में जीवन, अनुभव और भाषा को समझने और विन्यस्त करने के अनेक स्तर और प्रक्रियाएँ हैं, हमारी आलोचना में भी कविता और उसके माध्यम से अपने समय और उसकी उलझनों तक पहुँचने और उन्हें परिप्रेक्ष्य देने के अनेक स्तर और दृष्टियाँ सक्रिय हैं। जैसे कि कविता में वैसे ही, सौभाग्य से, आलोचना में रुचि और दृष्टि का प्रजातंत्र है।
हम इस प्रसन्न विश्वास के साथ यह संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं कि यहाँ एकत्र आलोचना कवितादर्शी और जीवनदर्शी है : अख़बारी सतहीपन और सनसनीखेजी, वैचारिक एकरसता के आत्मतुष्ट समय में वह हमें अपनी सूक्ष्मता और जटिलता से विचलित कर कविता की अर्थसमृद्ध और गहरी समझ की ओर ले जाने में समर्थ आलोचना है।
—भमिका से
Sahitya, Samaj Aur Jivan
- Author Name:
Ravinandan Singh
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Description:
‘साहित्य, समाज और जीवन’ रविनन्दन सिंह का दूसरा निबन्ध-संग्रह है। इसमें अधिकतर निबन्ध साहित्यिक हैं। लगभग एक दर्जन निबन्ध समाज के विविध पहलुओं तथा सामाजिक विसंगतियों पर केन्द्रित हैं। कुछ निबन्ध मनुष्य की जीवन शैली तथा जीवन-दर्शन से सम्बन्धित हैं।
रविनन्दन सिंह जब कोई विषय चुनते हैं तो उस विषय की गहन पड़ताल करते हैं एवं उस विषय की परतों को खोलकर रख देते हैं। वे विषय का विश्लेषण तथा मूल्यांकन बिना किसी आग्रह के, निरपेक्ष होकर करते हैं। उनके निबन्धों को पढ़ने से उस विषय की तस्वीर बिलकुल स्पष्ट हो जाती है। वे विषय को उलझाते नहीं बल्कि उलझे हुए विषय को भी सुलझाकर प्रस्तुत करते हैं। उनके निबन्धों की भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहपूर्ण है। उनके निबन्ध अत्यन्त सारगर्भित एवं बोधगम्य हैं। भाषा एवं संवेदना से समृद्ध इन निबन्धों से गुज़रना एक रोचक अनुभव की तरह है। स्नातक, स्नातकोत्तर के विद्यार्थियों एवं शोध-छात्रों के लिए ये निबन्ध अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होंगे।
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